स्मृति शेष : भगवती देवी की पर्यावरणीय विरासत

चम्बा : कहावत है कि प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे किसी नारी का हाथ होता है. नारी में अपार ऊर्जा का सागर हिलोरें मारता है. वह यदि सकारात्मक शक्ति के रूप कार्य करे पुरुष के महान प्रेरणा का स्रोत बन जाती है. वृक्ष मानव विश्वेश्वर दत्त सकलानी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. महात्मा गांधी के सिद्धान्तों और उनकी कार्यशैली के प्रति निष्ठा तो इनमें थी ही, उस चिंगारी को सूर्य-सा प्रकाश और आभा प्रदान करने में भगवती देवी ने, जिनके साथ सकलानी जी का विवाह हुआ था, महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

प्रत्येक सामाजिक सरोकारों में वह हमेशा साथ रहीं, सैद्धान्तिक रूप में ही नहीं, उसे कार्यरूप देने में भी उन्होंने अपने पति के कन्धे से कन्धा मिला कर साथ दिया.

परिजनों के अनुसार, वही इनकी अनुपस्थिति में समस्त कार्यकलापों को देखतीं थीं.
वृक्ष मानव विश्वेश्वर दत्त सकलानी के संघर्षों में भगवती देवी का भी पूरा योगदान रहा। पुत्र संतोष सकलानी के अनुसार, उनकी माता आत्मबल की धनी थी. जब पहाड़, पेड़ और जंगलों की दुर्दशा पर विचार रखते थे तो उनकी पीड़ा उनकी आवाज में स्‍पष्‍ट सुनाई देती थी. बेहद सहजता से बोलते हुए कई बार लगता था कि ये सिर्फ वृक्ष मित्र नहीं हैं बल्कि मनुष्‍य मित्र भी हैं. उनके यही संस्‍कार उनके परिवार में भी देखने को मिले. खासतौर पर उनकी पत्‍नी भगवती देवी जो उनकी इस सहजता को और भी बढ़ाती रही.

राजभवन में प्रोटोकॉल अधिकारी संतोष सकलानी अपनी माता के पुराने संस्मरण साझा करते हुए बताते हैं कि
दुनिया भर से आये प्रकृति प्रेमियों को वो बहुत प्रफुल्लित होकर सेवा करती थी, सुंदर लाल बहुगुणा जी एवं अन्य पर्यावरण विद अक्सर उनके घर पर आते थे जिन्हें वे विभिन्न प्रकार के पहाड़ी व्यंजन बनती थी, उनकी बनाई हुई झगोरे की खीर की बहुगुणा बहुत तारीफ करते थे और भोजन में सिर्फ उनके हाथ की बनी हुई झगोरे की खीर उन्हें बहुत ही पसंद थी।