आज से चैत्र मास का प्रारम्भ हो रहा है, 14 मार्च की रात्रि 12/15 भगवान भास्कर मीन राशि में प्रवेश कर रहे हैं, संक्रांति आज 15 मार्च को है। आज की संक्रान्ति का पुण्य काल मध्याह्न तक है, आज पाप मोचनी एकादशी भी है। आज सूर्य संक्रमण काल है अतः आज से चैत्र मास प्रारम्भ हो जाएगा। हमारी ज्योतिषीय गणना व सूर्य संक्रमण के कारण सौरमास का अधिक महत्व है इसीलिए चैत्र मास की गिनती आज से मानी जाती है, और चान्द्र मास के अनुसार इस वर्ष चार मार्च से चैत्र मास प्रारम्भ हो गया है, (जहां चान्द्र मास को महत्व देते हैं वहां के लिए) परन्तु प्राचीन मनीषियों ने सौरमास के महत्व को मान कर ही ऋतुओं की गणना की है, आज से बसन्तोत्सव प्रारम्भ। (चैत्र चान्द्र मास अगले वर्ष 23 मार्च से प्रारम्भ होगा) ऋतु चक्र में परिवर्तन भी सूर्य के संक्रमण से आता है। अनेक विचार हैं जिससे भ्रमितता आ जाती है।
उत्तराखंड देवभूमि में जन-मानस का फूलों के प्रति प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण इस महीने के देहरी पूजन से मिलता है। अलग-अलग लोकाचार के कारण कहीं पूरे महीने, तो कहीं पन्द्रह दिन तो कहीं एक सप्ताह छोटी-छोटी बच्चियों के द्वारा देहरी पूजन फूलों से किया जाता है, कहीं कहीं बालक व बालिकाओं के द्वारा देहरी पूजन होता है, अलग अलग प्रचलित लोकाचार से समूचे उत्तराखंड में इस पर्व को मनाया जाता है। बालक बालिकाओं का समूह जंगलों से फ्यूली, बुरांश, शिलपाड़ा और अन्य अनेक प्रकार के फूलों को चुन चुन कर गांव भर की देहलीज की पूजा कर फूल चढ़ाते हैं और घर द्वार के सम्पन्न होने, घर भण्डार की पूर्णता की कामना परक गीत गाते हैं, इसके बदले बालक बालिकाओं को तिल, गुड़, पापड़ी और पैसों का उपहार दिया जाता है। फूलों के प्रति हमारा प्यार और दुलार अत्यधिक है और हम कामदेव व रति देवी की समृद्धि के लिए वसन्त ऋतु में अपने गांव घरों की देहलीज पर पुष्प अर्पित कर काम देव के पञ्च शरों ( अरविन्द, अशोक, आम, मल्लिका और इन्दीवर) की इच्छा पूर्ति भी करते हैं तथा कामदेव के पांच बाण ( सम्मोहन, उन्मादन, शोषण, तापन और मुमुर्षुमाण) इस देहरी पूजन से तृप्त होते हैं।
हमारे ऋषि- महर्षियों ने जीवन को आनन्द पूर्वक जीने के अनेक तरीके समझाने के लिए बहुत विचार पूर्वक पर्वो का निश्चय किया है। कौन सा महीना ऐसा है जिसमें कोई उत्सव नहीं मनाया जाता है फिर तीज और त्योहार हमारी भावी पीढ़ी को सजग करने के शिक्षण संस्थान भी हैं। क्यों होते थे पहले दरवाजे कम ऊंचाई के? बहुत विचारणीय प्रश्न है। जिससे हम विनम्रता का पाठ पढ़ सकें। आज परिस्थिति बदलती जा रही है, मानव अति बुद्धिमान बनता जा रहा है, शायद बुद्धिमान का आशय चतुरता ने ले लिया है। ऊंची आवाज में कह कर अपने आप को सर्व श्रेष्ठ साबित करना! लोकेषणा ही तो है, यह एक कटु सत्य है कि जब से हमने अपने पर्व व परम्पराओं को छोड़ा तब से हमारे अंदर असहिष्णुता बढ़ी है। चालीस पचास साल पहले इस चैत्र मास में बालक बालिकाओं का समूह फूलों से गांव भर की देहलीजों की पूजा करने उमड़ता था, कभी कभी तो कुछ परिवार कुछ चुनिंदा कन्याओं से ही देहरी पूजन करवाते थे और आज हमारे घर की कन्या तक इस पूजा से बचना चाहती है।
लगता है यह सलाह प्रदूषण है, और सलाह देने वाले हम जैसे व्यक्तियों की कमी नहीं है अधिकांश जनों के पास इस सन्देश को पढ़ने का समय भी नहीं होगा पर यह विचार तो है कि यदि दस बीस प्रतिशत लोगों ने भी मनन किया तो यह मुफ्त की सलाह हमारे समाज को प्रदूषणमुक्त अवश्य करेगी। और जो अपने मद में मस्त हैं एक न एक दिन भारतीय परम्परा को अपनाएंगे।
“‘ बहुत बड़ी विडम्बना है कि आज इस पर्व को मनाने के लिए देवियों की संख्या में भी कमी हो गई है। सामान्य जनमानस तो दबंगों के डर से अपने घर में कन्या की कामना भी नहीं करता है, शायद सुरक्षित रहने की संभावना नजर नहीं आती है, इस दुर्भावना का डट कर मुकाबला करने की शक्ति हमारे पास कम है या हर मानव की एक सोच कि मेरा क्या है?? इस भावना का मन से बहिष्कार आवश्यक है, आशा है देश व्यापी इस पीड़ा का आंकलन जरूरी समझा जा सकेगा? तो शक्ति को शक्ति अवश्य मिलेगी और हमारे पर्व फिर पूर्ववत् मनाए जा सकेंगे। मन की गहराइयों से फूलदेई संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाओं सहित आप सबको आज की फूलदेई (फुलिवारी) संक्रान्ति की हार्दिक वधाई । “‘
मधु मास की मधुमय प्रभात, आप सबके आंचल को सुमनों से भर दे ऐसी शुभकामना भी करता हूं। सुमन सबके मन को सु-मन बनाएं , ऐसी मां पुण्यासिणी से प्रार्थना है।
(हर्ष मणि बहुगुण)