आज का पंचांग : जानिए राजा परीक्षित की पूर्ण कथा

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है

राजा परीक्षित की पूर्ण कथा

कुरुक्षेत्र के महान युद्ध के बाद जब धूल-धक्कड़ शांत हो गई, तब समूचा भारतवर्ष शोक और वीर रक्त से सराबोर था। पांडवों की विजय हुई थी, परंतु उनके पाँचों पुत्र, अभिमन्यु, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, द्रुपद, विराट आदि लगभग सारे वीर मारे जा चुके थे।

युधिष्ठिर सिंहासन पर बैठे तो उनका मन अत्यंत उदास था। उन्होंने राज्यभार ग्रहण किया, लेकिन शीघ्र ही महाराज परीक्षित को युवराज घोषित कर दिया। परीक्षित उसी गर्भ थे जिसे अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र से जलाने की कोशिश की थी। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने चरणों की छाया से उस गर्भ की रक्षा की थी। जन्म के समय जब बच्चा मृत दिखा, तब कृष्ण ने उसे स्पर्श कर जीवित किया और कहा था — “यह मेरे समान तेजस्वी होगा।” अतः इसका नाम परीक्षित रखा गया, क्योंकि यह संसार की परीक्षा लेने वाला था।

परीक्षित का बचपन और राज्याभिषेक

परीक्षित का लालन-पालन बड़े ही स्नेह और सतर्कता से हुआ। अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और युधिष्ठिर उसे अत्यंत प्यार करते थे। कृष्ण भी प्रायः आते और उसे गोद में लेकर खेलते। परीक्षित बचपन से ही पराक्रमी, बुद्धिमान और धर्मात्मा था।

जब वह युवा हुआ, युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया और उसके बाद वनवास की तैयारी करने लगे। उन्होंने परीक्षित को हस्तिनापुर का राजा बना दिया। परीक्षित का राज्याभिषेक बड़े ही धूमधाम से हुआ। चारों ओर से राजा-महाराजा आए। सूत, वैश्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय सबने आशीर्वाद दिया।

परीक्षित ने न्यायपूर्ण शासन प्रारंभ किया। वे प्रजा की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते थे। चोर-डाकू, अन्यायी और दुष्टों को वे कठोर दंड देते थे। उनके राज्य में “धर्म” की जय-जयकार थी। किसान सुखी थे, व्यापारी निडर थे, ब्राह्मण निर्भय थे। परीक्षित स्वयं प्रतिदिन प्रजा की समस्याएँ सुनते और उनका निवारण करते।

दुर्भाग्यपूर्ण शिकार-यात्रा

एक दिन राजा परीक्षित वन में शिकार करने गए। सारा दिन घूमने के बाद वे अत्यंत थक गए और प्यास से व्याकुल हो उठे। घोड़े भी थक चुके थे। उन्होंने चारों ओर पानी की खोज की। दूर एक आश्रम दिखाई दिया। यह महर्षि शमीक का आश्रम था।

परीक्षित आश्रम के द्वार पर पहुँचे और बोले, “मुनिवर, मुझे प्यास लगी है। थोड़ा जल दीजिए।”

उस समय शमीक ऋषि गहरी समाधि में लीन थे। उनकी आँखें बंद थीं और वे कुछ सुन नहीं रहे थे। परीक्षित ने कई बार पुकारा, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। राजा का धैर्य टूट गया। वे थके और क्रोधित थे। पास पड़ा एक मरा हुआ साँप उन्होंने उठाया, धनुष की डोरी में पिरोया और ऋषि की गर्दन पर डाल दिया। फिर वे वहाँ से चले गए।

कुछ समय बाद शमीक ऋषि समाधि से बाहर आए। उन्होंने गर्दन पर मृत सर्प देखा। उनके मन में कोई क्रोध नहीं आया। उन्होंने शिष्यों से कहा, “कोई राजा आया होगा, जो थका-माँदा था। उसने यह किया होगा। इसे हटा दो।”

शृंगी ऋषि का शाप

शमीक के पुत्र शृंगी बालक थे, लेकिन तपस्या के कारण अत्यंत तेजस्वी और क्रोधी थे। जब उन्हें पिता की यह दशा दिखाई गई तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने जल भरा कमंडल उठाया और कहा:

“जिसने मेरे पिता का यह अपमान किया है, वह सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से मृत्यु को प्राप्त होगा!”

शमीक ऋषि ने पुत्र को बहुत समझाया — “बेटा, राजा थके थे, उन्हें क्रोध आ गया। क्षमा कर दो। शाप मत दो।” लेकिन शृंगी का क्रोध शांत नहीं हुआ।

शमीक ने अपने प्रिय शिष्य गौरमुख को परीक्षित के पास भेजा और कहा, “जाकर राजा को सच बता दो, ताकि वे सावधान हो सकें।”

राजा को शाप की सूचना

गौरमुख हस्तिनापुर पहुँचे और परीक्षित को सारी घटना बताई। राजा परीक्षित सुनकर स्तब्ध रह गए। वे तुरंत सिंहासन से उठे और बोले, “मैंने अज्ञानवश महर्षि का अपमान किया। अब मुझे इसका फल भोगना ही होगा।”

उन्होंने तुरंत पुत्र जनमेजय को युवराज बनाया और राज्य-भार सौंप दिया। स्वयं उन्होंने एक ऊँचे, मजबूत स्तंभ (मंच) का निर्माण करवाया। उस मंच को लोहे की जाली, विष-नाशक जड़ी-बूटियों, मंत्र-शक्ति और सुरक्षा-कवच से घेर दिया गया।

राजा परीक्षित ने कहा, “मैं सात दिन तक यहीं रहूँगा। यदि मृत्यु आनी है तो आए। लेकिन मृत्यु से पहले मैं भगवान का नाम लेना चाहता हूँ।”

भागवत कथा का श्रवण

परीक्षित ने घोषणा की — “जो कोई मुझे श्रीमद् भागवत महापुराण सुनाएगा, उसे मैं भरपूर दक्षिणा दूँगा।”

सूतजी (उग्रश्रवा) नामक महान सूत वहाँ पहुँचे। वे व्यास पुत्र शुकदेव जी के शिष्य थे। सूतजी ने परीक्षित को श्रीमद् भागवत सुनाना प्रारंभ किया।

सात दिनों तक राजा परीक्षित उस मंच पर बैठे रहे। उन्होंने न खाया, न पिया, न सोया। केवल भगवान की कथा सुनते रहे —

  • भगवान की अवतार कथाएँ
  • दशावतार
  • कृष्ण लीला
  • गोपी-प्रेम
  • रासलीला
  • कंस-वध
  • महाभारत की पृष्ठभूमि

राजा परीक्षित का मन पूरी तरह भगवान में लीन हो गया। वे भय, चिंता और मृत्यु को भूल गए।

सातवाँ दिन — तक्षक का आगमन

सातवें दिन तक्षक नाग ब्राह्मण का रूप धारण करके आया। उसने परीक्षित को फल भेंट किए। उन फलों में एक फल में छिपा हुआ तक्षक था। राजा ने फल खाया। जैसे ही फल का टुकड़ा मुँह में गया, वह कीड़ा तक्षक नाग बन गया और राजा की गर्दन पर डस लिया।

परीक्षित ने तुरंत भगवान का नाम लिया — “हे कृष्ण! हे नारायण!” और अपने प्राण त्याग दिए। उनकी मृत्यु अत्यंत शांत और भक्ति-पूर्ण हुई।

जनमेजय का सर्प-सत्र

परीक्षित की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जनमेजय ने राज्य संभाला। उन्होंने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्प-सत्र (नाग-यज्ञ) प्रारंभ किया। यज्ञ में लाखों सर्पों को आहुति दी जा रही थी। तक्षक भी यज्ञ की अग्नि में खींचा जा रहा था।

तक्षक इंद्र की शरण में गया। इंद्र उसे बचाने आए, लेकिन यज्ञ की शक्ति इतनी प्रबल थी कि तक्षक भी खिंचने लगा।

उसी समय आस्तीक नामक ब्राह्मण (जो नाग-कुल और ब्राह्मण-कुल दोनों से संबंधित था) वहाँ पहुँचा। उसने जनमेजय से यज्ञ रोकने की प्रार्थना की। जनमेजय ने आस्तीक की बात मान ली और यज्ञ समाप्त कर दिया। तक्षक बच गया।

आस्तीक की माता मनसा नाग-कुल की थीं, इसलिए आस्तीक ने दोनों पक्षों का हित किया।

कथा का सार

राजा परीक्षित की कथा हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षा देती है:

  1. क्रोध पर नियंत्रण — छोटी-सी असावधानी और क्रोध से कितना बड़ा संकट आ सकता है।
  2. भक्ति की शक्ति — मृत्यु के समय भी यदि भगवान का नाम लिया जाए तो मृत्यु भी विजय बन जाती है।
  3. कर्म और भाग्य — शाप अवश्य पूरा होता है, लेकिन भक्ति से उसका स्वरूप बदल जाता है।
  4. ज्ञान का महत्व — परीक्षित ने अंतिम सात दिन ज्ञान और भक्ति में बिताए, जिससे वे अमर हो गए।

आज भी श्रीमद् भागवत का श्रवण परीक्षित की कथा से शुरू होता है। सूतजी ने कहा था — “जो मनुष्य परीक्षित की भाँति भागवत सुनता है, वह भी मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।”


आज का पंचांग

सूर्योदय एवं चन्द्रोदय
सूर्योदय05:46 ए एमसूर्यास्त07:12 पी एम
चन्द्रोदय02:32 ए एम, मई 12चन्द्रास्त01:31 पी एम
पञ्चाङ्ग
तिथिनवमी – 03:24 पी एम तकनक्षत्रशतभिषा – 01:28 ए एम, मई 12 तक
दशमीपूर्व भाद्रपद
योगइन्द्र – 01:04 ए एम, मई 12 तककरणगर – 03:24 पी एम तक
वैधृतिवणिज – 03:14 ए एम, मई 12 तक
वारसोमवारविष्टि
पक्षकृष्ण पक्ष  
चन्द्र मास, सम्वत एवं बृहस्पति संवत्सर विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल
विक्रम सम्वत2083 सिद्धार्थीबृहस्पति संवत्सरसिद्धार्थी – 03:53 पी एम, अप्रैल 21, 2026 तक
शक सम्वत1948 पराभवरौद्र
गुजराती सम्वत2082 पिङ्गलचन्द्रमासज्येष्ठ – पूर्णिमान्त
प्रविष्टे/गते28वैशाख – अमान्त
राजागुरु – शासन व्यवस्था के स्वामीसेनाधिपतिचन्द्र – रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
मन्त्रीमंगल – नीतियों एवं प्रशासन के स्वामीधान्याधिपतिबुध – रबी की फसलों के स्वामी
सस्याधिपतिगुरु – खरीफ की फसलों के स्वामीमेघाधिपतिचन्द्र – मेघ एवं वर्षा के स्वामी
धनाधिपतिगुरु – धन एवं कोष के स्वामीनीरसाधिपतिगुरु – धातु, खनिज आदि के स्वामी
रसाधिपतिशनि – रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामीफलाधिपतिचन्द्र – फल-पुष्पादि के स्वामी
राशि तथा नक्षत्र
चन्द्र राशिकुम्भनक्षत्र पदशतभिषा – 07:04 ए एम तक
सूर्य राशिमेषशतभिषा – 01:15 पी एम तक
सूर्य नक्षत्रभरणी – 07:38 पी एम तकशतभिषा – 07:23 पी एम तक
कृत्तिकाशतभिषा – 01:28 ए एम, मई 12 तक
सूर्य नक्षत्र पदभरणी – 07:38 पी एम तकपूर्व भाद्रपद
कृत्तिका  
ऋतु तथा अयन
द्रिक ऋतुग्रीष्मदिनमान13 घण्टे 26 मिनट्स 08 सेकण्ड्स
वैदिक ऋतुवसन्तरात्रिमान10 घण्टे 33 मिनट्स 13 सेकण्ड्स
द्रिक अयनउत्तरायणमध्याह्न12:29 पी एम
वैदिक अयनउत्तरायण  
शुभ समय
ब्रह्म मुहूर्त04:21 ए एम से 05:03 ए एमप्रातः सन्ध्या04:42 ए एम से 05:46 ए एम
अभिजित मुहूर्त12:02 पी एम से 12:56 पी एमविजय मुहूर्त02:43 पी एम से 03:37 पी एम
गोधूलि मुहूर्त07:10 पी एम से 07:32 पी एमसायाह्न सन्ध्या07:12 पी एम से 08:15 पी एम
अमृत काल06:05 पी एम से 07:43 पी एमनिशिता मुहूर्त12:07 ए एम, मई 12 से 12:49 ए एम, मई 12

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