आज का पंचांग : महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले भविष्य में आने वाले परिणाम का विचार जरूर करें

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, ‘हिमशिखर खबर‘ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, रोद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, ज्येष्ठ |आज है सत्य व्रत, पूर्णिमा व्रत, पूर्णिमा, सत्य व्रत, और देव स्नान पूर्णिमा|

आज पूर्णिमा तिथि 05:26 AM तक उपरांत प्रतिपदा | नक्षत्र मूल 04:03 AM तक उपरांत पूर्वाषाढ़ा | शुक्ल योग 02:25 PM तक, उसके बाद ब्रह्म योग | करण विष्टि 04:17 PM तक, बाद बव 05:26 AM तक, बाद बालव | आज राहु काल का समय 07:28 AM – 09:09 AM है | आज चन्द्रमा धनु राशि पर संचार करेगा |

महाभारत का प्रसंग है। कौरव-पांडवों के बीच युद्ध की स्थिति बन चुकी थी और दोनों पक्षों के बीच तनाव चरम पर था। शांति स्थापित करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण पांडवों की ओर से दूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचे थे।

श्रीकृष्ण का उद्देश्य स्पष्ट था- युद्ध को किसी भी तरह टालना और दोनों पक्षों के बीच समझौता कराना। उन्होंने हस्तिनापुर की राजसभा में दुर्योधन को समझाने का प्रयास किया कि यह युद्ध केवल विनाश लाएगा, इसलिए इसे रोका जाना चाहिए। श्रीकृष्ण ने धैर्यपूर्वक उसे बताया कि पांडव न्याय चाहते हैं, सत्ता नहीं और थोड़ी सी भूमि देकर भी शांति स्थापित की जा सकती है, लेकिन दुर्योधन अपने अहंकार और सत्ता के मोह में अंधा हो चुका था। उसने श्रीकृष्ण की सलाह को अस्वीकार कर दिया।

इस घटना से पहले दुर्योधन ने शिष्टाचार के रूप में श्रीकृष्ण को अपने महल में भोजन के लिए आमंत्रित किया था। यह एक राजसी और औपचारिक निमंत्रण था। श्रीकृष्ण ने इस आमंत्रण को विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। दुर्योधन आश्चर्यचकित हुआ और उसने पूछा कि जब सब कुछ सम्मान और वैभव के साथ दिया जा रहा है, तो आप हमारे यहां भोजन क्यों नहीं कर रहे हैं?

श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि दूत का धर्म है जब तक उसका कार्य पूरा न हो, वह किसी पक्ष का आतिथ्य स्वीकार नहीं करता, क्योंकि इससे निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसके बाद श्रीकृष्ण विदुर जी के घर गए। वहां न कोई भव्य व्यवस्था थी, न राजसी ठाठ-बाट, लेकिन वहां सच्चा प्रेम और आदर था। विदुर ने अत्यंत सादगी से भगवान को भोजन कराया और श्रीकृष्ण ने उसी को स्वीकार किया, क्योंकि वहां भावनात्मक शुद्धता और स्नेह था।

इस प्रसंग का संदेश स्पष्ट है कि बाहरी वैभव से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक भावना होती है। जहां प्रेम और सत्य होता है, वहां साधारण भोजन भी अमृत समान हो जाता है और जहां अहंकार, अधर्म और असत्य होता है, वहां का सबसे अच्छे व्यंजन भी स्वीकार नहीं करना चाहिए।

प्रसंग की सीख

सबसे पहली सीख यह है कि निर्णय भावनाओं और अहंकार से नहीं, बल्कि विवेक से लेना चाहिए। दुर्योधन ने अपने अहंकार के कारण शांति प्रस्ताव को ठुकरा दिया, जिससे अंत में विनाशकारी परिणाम सामने आए। जीवन में जब भी कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाए, तो उसका दीर्घकालिक प्रभाव अवश्य सोचना चाहिए।

दूसरी सीख यह है कि सच्चा सम्मान दिखावे से नहीं, व्यवहार से पहचाना जाता है। दुर्योधन ने भव्य भोजन और राजसी स्वागत किया, लेकिन उसके मन में प्रेम और स्वीकार्यता नहीं थी। इसके विपरीत विदुर के घर सादगी थी, लेकिन वहां सच्चा सम्मान और अपनापन था। जीवन में रिश्तों की गुणवत्ता दिखावे से नहीं, भावनाओं से तय होती है।

तीसरी सीख यह है कि सही समय पर सही निर्णय लेना जीवन को बदल सकता है। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के यहां भोजन न करके यह स्पष्ट किया कि परिस्थितियों के अनुसार व्यवहार करना भी एक कला है। जीवन में हर अवसर को बिना सोचे-समझे स्वीकार करना आवश्यक नहीं होता, कई बार ‘न’ कहना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना ‘हां’ कहना।

चौथी सीख यह है कि अहंकार सबसे बड़ा बाधक है। जब व्यक्ति अपने ज्ञान, शक्ति या धन पर अत्यधिक गर्व करता है, तो वह सही सलाह भी नहीं सुन पाता। यह प्रवृत्ति संबंधों और निर्णयों दोनों को खराब कर देती है।