पूर्व सचिव भारत सरकार भाई कमलानंद ने 79वें स्वतंत्रता दिवस पर राज्यवासियों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि 15 अगस्त का दिन हर भारतीय के दिल में गर्व और आत्मसम्मान का भाव जगाता है।
कहा कि इस अवसर पर हम वैदिक उद्घोष का जीवन में आह्वान करें—
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
अर्थात— हम सब संगठित होकर चलें, हमारे मन, वचन और कर्म में एकरूपता हो; हमारी आकांक्षाएँ, भावनाएँ और लक्ष्य एक हों। यही भावना राष्ट्र की सामूहिक चेतना को दृढ़ और अक्षुण्ण बनाती है।
वैदिक वाङ्मय हमें आत्मा की सर्वव्यापकता का साक्षात्कार कराता है, और भारतभूमि अनादिकाल से लोकमंगल की भावनाओं, सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांतों एवं सह-अस्तित्व के उदात्त आदर्शों की संवाहिका रही है। हमारी सांस्कृतिक चेतना ने कभी भौतिक संसाधनों के अंध-संग्रह, उपनिवेशवादी विस्तार या शक्ति-प्रदर्शन को अपना ध्येय नहीं बनाया, अपितु हमारे ऋषि-मनीषियों ने “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे लोककल्याणकारी सूत्रों को ही धर्म का मर्म माना—जहाँ आत्म-कल्याण के साथ-साथ समष्टि के उत्थान की पवित्र भावना अंतर्निहित है।
हमारे लिए भारत केवल भूभाग नहीं, यह हमारी जननी है—
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
वेदों में निहित यह उद्घोष मातृभूमि के प्रति हमारी निष्ठा, समर्पण और अटूट प्रेम को प्रकट करता है।
भारतीय संस्कृति ने सम्पूर्ण विश्व को योग, ध्यान, आयुर्वेद जैसे अमूल्य उपहार दिए हैं, जो केवल स्वास्थ्य और साधना के मार्ग नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व, करुणा और विश्वबंधुत्व के जीवन-मूल्य भी हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का स्वर भारत की आत्मा में अनादि काल से गुंजित है।
आज जब मानवता भोगवाद, उपभोक्तावाद और संकीर्ण स्वार्थों के मार्ग पर दौड़ रही है, भारत की यह जीवन-दृष्टि सम्पूर्ण विश्व के लिए एक प्रकाश-स्तम्भ बन सकती है। एक सशक्त राष्ट्र, आदर्श समाज और सार्थक जीवन का निर्माण तभी संभव है जब हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर आत्मोन्नति के साथ-साथ समाजोत्थान की पवित्र भावना को अपनाएँ।
आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम संकल्प लें कि “राष्ट्रं मम देवता, सेवा मम साधना, और लोकमंगल मम परम लक्ष्य बने “ !
सनातन संस्कृति-संस्कार, उच्चतम मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक आलोक से सम्पन्न शस्य-श्यामला देवभूमि भारत अखण्ड-अक्षुण्ण रहें।