फूलदेई प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन का लोकपर्व : भाई कमलानंद

सर्दी और गर्मी के बीच के खूबसूरत मौसम में मनाए जाने वाले फूलदेई त्योहार में मुस्कुराते बच्चे फ्योंली और बुरांश के पीले, लाल फूल घर की देहरी पर सजाते हैं। फूलदेई उत्तराखंड का विशेष लोक पर्व है। चैत महीने की शुरुआत हो गई है। चैत में प्रदेशभर में फूलों की चादर बिछी रहती है। बच्चे टोकरी में खेतों से फूल लेकर आते हैं और सुबह-सुबह घरों की देहरी पर रख जाते हैं। माना जाता है कि घर की देहरी पर फूल रखने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं। इस पर्व की झलक लोक गीतों में भी देखने को मिलती है।

भाई कमलानंद

पूर्व सचिव, भारत सरकार

फूल देई, छम्मा देई, देणी द्वार, भर भकार…जैसे मांगल गीतों के साथ प्रकृति देवी को आभार प्रकट करने का लोक पर्व है फूल संक्रांति। फूल देई बच्चों को प्रकृति प्रेम की शिक्षा बचपन से ही देने का एक आध्यात्मिक पर्व भी है। चैत की संक्रांति को उत्तराखंड में फूल संक्रांति के तौर पर मनाया जा रहा है। इस दिन घरों की देहरी को फूलों से सजाया जाता है। घर-मंदिर की चौखट का तिलक करते हुए ‘फूलदेई छम्मा देई’ कहकर मंगलकामना की जाती है। यह सब घर व आस-पड़ोस के बच्चे करते हैं। ये त्योहार बसंत ऋतु के आगमन का और नए फूल खिलने का संदेश भी देता है। माना यह जाता है कि फूलदेई का त्योहार बिना फ्योंली के फूल के अधूरा रह जाता है।

पहाड़ में हर मौसम का स्वागत त्यौहार की तरह किया जाता है। पहाड़ी लोक संस्कृति में फूलदेई बसंत के स्वागत का त्यौहार है। चैत के महीने की पहली गते यानी चैत्र माह की पहली तिथि को पहाड़ी फूलदेई का त्यौहार मनाते हैं। सौरपक्षीय पंचांग चलने के कारण उत्तराखंड में चैत महीने की शुरुआत संक्रान्ति के दिन से मानी जाती है। सुबह सवेरे बच्चे नहा-धोकर फूल तोड़ लाते हैं। इसके बाद फूल और चावल के दाने से गांव के हर घर की देहरी में ले जाकर उसका पूजन करते हुये गीत गाते हैं:

फ्योंली के पीले रंग के फूल खिलना बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। आजकल पहाड़ों में बुरांश और फ्योंली के फूल खिले हुए हैं। फूलदेई त्योहार आमतौर पर छोटे बच्चों का पर्व है। सर्दियों का मौसम जब निकल जाता है, तो उत्तराखंड के पहाड़ पीले फूल से लकदक हो जाते हैं। इस फूल का नाम है “फ्योंली”। सुख-समृद्धि का प्रतीक फूलदेई त्योहार उत्तराखंड की गढ़ कुंमाऊ संस्कृति की पहचान है। बसंत का मौसम आते ही सभी को इस त्योहार का इंतजार रहता है। चैत्र संक्रांति के दिन प्रकृति संरक्षण को समर्पित फूलदेई का पर्व मनाए जाने की परम्परा है। जिसका मुख्य उद्देश्य निश्चित रूप से मानव को प्रकृति के साथ आत्मीयता बढ़ाकर उसका संरक्षण करना है।

पूर्व में चैत्रमास शुरू होते ही गांवों में फूलदेई उत्सव एवं वसंत का आगमन बड़े धूमधाम से होता था, लेकिन अब शहर- गांवों में बच्चों में इसका क्रेज कम हुआ है। अब इस त्यौहार को मनाने का ढ़ंग पहले जैसा नहीं रहा है। इस त्योहार के संरक्षण के लिए सभी को आगे आने की जरूरत है। जिससे भावी पीढी भी इससे रूबरू हो सके।
खास बात यह है कि सूर्य उगने से पहले फूल लाने की परंपरा है। इसके पीछे वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, क्योंकि सूर्य निकलने पर भंवरे फूलों पर मंडराने लगते हैं, जिसके बाद परागण एक फूल से दूसरे फूल में पहुंच जाते हैं ।

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