सेहत के लिए जरुरी है प्रकृति से सामंजस्य

डॉ शिशिर पंडित

वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी (भारत सरकार) और पर्यावरणविद्

यदि हम प्रकृति के साथ सांमजस्य बनाये रखेगें तो ही हम अपनी सेहत को स्वस्थ रख सकेगें वरना, हमारा सभी का जीवन दूभर ही नही असम्भव हो जायेगा। प्रकृति और जीवन एक दूसरे से सिक्के के दो रुपों जैसे जुड़े है। प्रकृति हमारे लिए और हम प्रकृति के लिए है। यह सदैव सोचकर आगे बढ़ना होगा।

प्रकृति ने सभी प्राणिमात्र को उसकी जीवन की आवश्यकता अनुसार सुविधा दे रखी और यदि वह इन सुविधाओं का भरपूर और सही उपयोग करता रहे तो उसे कठिनाइयों का कम सामना करना पड़ेगा। जैसे ऊँट अधिकांश रेतिले भागों की यात्रा के लिए सुगम होते हैं और इन स्थानो पर पानी दूर दूर तक दिखाई नही देता इरालिए ऊँट के पेट में प्रकृति ने पानी की थैली दे रखी है जिरारो वह अपनी क्षुधा शमन कर सकता है। ऊँट की गर्दन भी लम्बी होती है जिससे वह रेगिस्तान में अपनी गर्दन से वृक्षों की पत्तियों को खा सके। प्रायः यह देखा गया है कि कई पौधों की पत्तियों मोटी होती है और इनमें पानी की मात्रा काफी होती है इनसे उनकी वृद्धि की गति बढ़ती रहती है। इसी प्रकार भेड़, भालू और रीछ के शरीर पर घने कम्बल के समान बालों का आवरण दे रखा है जिससे वे शीतकाल में अपने शरीर को बचा कर रखे। हिंसक जीव अस्त्र शस्त्र चलाना नही जानते इसीलिए उनको नाखूनों और जबड़ो के बढ़े बढ़े दाँतों से अपनी रक्षा एवं शिकार करने की छूट प्रकृति ने दे रखी है।

प्रकृति ने समस्त प्राणीमात्र के लिए अनुपन उपहारों की उपलब्धता बनाये रखी है। यदि हम अपने सारे कार्य प्रकृति के अनुरुप एवं उससे सामर्जस्य बनाये रख करे तो हम जीवन को सुचारु रुप से चलाकर खुद जीये और दूसरों को भी जीने दे सकते हैं। सूर्य से सभी को ऊर्जा प्राप्त होती है अतः सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए सूर्य उदय के समय हमे अति सक्रिय रहना आवश्यक है। यदि हम अपने दैनिक जीवन के अति महत्वपूर्ण कार्य प्रातः ही सूर्य की ऊर्जा की उपस्थिति में ही पूर्ण कर ले जैसे स्वस्थ्य जीवन के लिए योग. प्राणायाम, व्यायाम आदि अति आवश्यक है। अतः हम इन्हें सूर्य की प्रथम ऊर्जा के साथ ही सम्पन्न कर लेना चाहिए। इससे दिनभर आप प्रसन्न, स्वस्थ्य एवं तरोताजा बने रहेंगे। व्यायाम करने से रोग, आलस्य, अपाच्य की निवृति हो, बुद्धि में निर्मलता और पवित्रता का संचार हो कर विशुद्ध ज्ञान प्रकाशित होता है। इसलिए व्यायाम करना आवश्यक है। दाँतों की सफाई की ओर भी विशेष ध्यान रखना चाहिए किसी शुद्ध वृक्ष बबूल या नीम की दॉतोन अथवा मंजन से दाँतों को नित्य प्रति साफ करे जिससे दाँतों और मुख में दुर्गन्ध न आवे और दाँत भी सुदृढ़ रहे बुढ़ापे में दुख न देवे। इसके पश्चात नदी तालाब, कूप या नल के शुद्ध जल से स्नान करे स्नान पश्चात स्वच्छ कपड़े से अंग प्रत्यंग को भली भाँति पोछ कर निर्मल स्वच्छ वस्त्र धारण करे।

विद्यार्थी वर्ग को यह आवश्यक हो जाता है कि उन्हें परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए और अपनी स्मरण शक्ति को बनाये रखने के लिए सूर्य उदय के प्रातःकाल में ही अपना पाठ एवं अध्ययन भी पूर्ण करने का प्रयास करना चाहिए। नाश्ता एवं भोजन को भी बढ़े इत्गिानान एवं चबा-चबा कर करना चाहिए। वर्तमान में अधिकांश लोग दाँतों का काम आंतो से ले रहे है। भोजन को जल्दी में बिना चबाये ही खाते और खाने में समय और सामग्री का भी ध्यान नही रखते। इसीलिए अस्पताल की आवश्यकता पड रही है। अधिकाश बीमारियाँ खाने के गलत ढंग से होती है।

प्रकृति के साथ सामजस्य बनाकर दिनभर तरोताजा एवं प्रसन्नता को हासिल किया जा सकता है। प्रकृति ने प्राणि के शरीर की रचना नी अलौकिक ढंग से की है। यदि प्रकृति के सिद्धान्त को अपने जीवन में लागू कर गर्मी के मौसम में हग नीबू का शरबत या ठंडक पेय पदार्थों का सेवन करते है तो शरीर इसे ग्रहण कर लेगा। किन्तु ठंड में यही पेय शरीर को बर्दाश्त नहीं होगें। गर्मी में शरीर को अधिक से अधिक हवा लगने वाले ढीले ढाले कपड़ों के आवश्यकता होती है जो ठंड में गर्म और शरीर से चिपके रहने वाले कपड़ों की महत्ता हो जाती है। ग्रामीण परिवेश में रहने वाले निवासी प्रकृति के साथ अधिक नजदिकी एवं सामजस्य बनाकर जीते है अतः उन्हें अधिक समस्या नहीं आती जबकि कृत्रिम रूप से कूलर, पंखों की हवा में जीवन जीने वाले कई समस्याओं को जन्म दे देते है। प्रकृति की गोद में एवं खुले आसमान में विचरण करने वाले पक्षी कभी बीमार नहीं पड़ते किन्तु बडी-बड़ी अट्टालिका एवं पक्के मकानों में रहने वाले शुद्ध वातावरण एवं हवा से वंचित रहकर नाना प्रकार की बीमारियों एवं चिन्ताओं से ग्रसित रहते हैं।

शहरों में वाहनों कल कारखाना से निकलने वाला जहरीला घुओं एवं धूल के कणों में छिपी गन्दगी नाना प्रकार की बीमारियों को निमत्रण देकर हमारे जीवन को विषाक्त बना देती हैं। हमारी श्वास प्रक्रिया के लिए या यो कहा जाय कि अच्छी सेहत के लिए शुद्ध ऑक्सीजन की नितान्त आवश्यकता होती है। शुद्ध एवं ताजी हवा हमारे आसपास के वातावरण एवं वृक्षों से प्राप्त होती हैं। अतः इसके हेतु पर्यावरण का शुद्ध रहना और अधिक से अधिक वृक्षों का होना आवश्यक है किन्तु आज दोनो का ही अभाव है इसीलिए अधिक से अधिक बिमारियों मनुष्य को घेरे हुए है। प्रकृति यत्र तत्र वृक्षों को लगाया ताकि उनसे फल, औषधि, और शुद्ध वायु का सतत क्रम चलता रहे किन्तु इमारती और जलाउ लकड़ी के रुप में एवं रहवासी क्षेत्रों के विस्तार में हरे भरे अधिकांश वृक्षों को काट डाला है जिससे हरे वृक्षों की समस्या विकराल होती जा रही है। पौधे हमारे द्वारा छोड़ी गई कार्बन डाई आक्साइड ग्रहण कर बदले में आक्सीजन देते है अतः वृक्षों का हमारे जीवन में गहरा सम्बन्ध है। इस बात का ध्यान रखना नितान्त आवश्यक है। अतः इनकी पूर्ण सुरक्षा एवं अधिक से अधिक नीम, गुलमोहर के साथा फलदार पौधे रोपने की जिम्मेदारी का वहन हम सबको प्रसन्नता से करना चाहिए।

सामान्य जन तथा पाश्चात्य विश्व भौतिक उन्नति तथा शारिरीक तथा मानसिक अभिवृद्धि तक ही अपने जीवन की सार्थकता मानकर भौतिक उत्कर्ष में ही प्रयत्नशील रहता है किन्तु यह पहलु एकांकी और अधुरा ही है इसमें केवल कस्तूरी मृग जैसा वृथा भटकाव ही है। भौतिक सुविधा की दृष्टि से यदि हमारे पास विपुल धन सम्पदा, आवास और परिवहन के प्रचूर साधन हो, परिवार में पुत्र, पोत्र एवं बन्धु बान्धवों की फूलवारी भी महक रही हो तथा दीर्घ जीवन और आरोग्य की संजीवनी भी सुलभ हो तब भी हमारी मृगतृष्णा, महत्वाकांक्षी और अधिकाधिक संचय की लालसाएँ अपूर्ण ही सिद्ध होगी।

वर्तमान वैज्ञानिक युग में सुख-सुविधाजन्य भौतिक, उपकरणों के आकर्षण से मानव की महति शक्तिधनोपार्जन और सुख सुविधा के साधन की गतिविधि संकीर्ण स्वार्थ के केन्द्र बिन्दु पर ही घूम रही है। किन्तु इन पार्थिव प्रलोभनों, इच्छाओं और वासनाओं के पूर्ण कर लेने से ही हमें जीवन का सच्चा सुख, आनन्द और शान्ति सुलभ न हो सकेगी। दस प्रकार के भौतिक प्रपंच में तो मानव जीवन के दुर्लभ एवं शाश्वत सत्य से निरन्तर दूर ही दूर हटता जायगा।

विवेकशील प्रबृद्ध मानवीय दृष्टि से विचार और अनुभव करने से ज्ञात होगा कि मनुष्य के सामने समय-समय पर ऐसी अयाचित घटनाएँ घटित होती रहती है, जो जीवने के सन्तुलन और शान्ति को विक्षुब्ध कर देती है जब संसार का कोई सहारा और धन ऐश्वर्या का अवलम्ब कोई काम नहीं दे पाता। ऐसी विपन्न स्थिति में मनुष्य सतृष्णा आँखो से अपनी बांहे आकाश की ओर फैलाता है कि उबार कर आश्वस्त कर सकें। अतः विचारशील मानव सांसारिक नश्वर कामनाओं के झमेले में न फसकर आत्मबोध की गरिमा को सर्वोच्च मानकर आत्म विकास, आत्मोन्नति, आध्यात्मिक, उत्कर्ष तथा आत्म विकास को जागृत करे। अपनी सेहत का ध्यान रखे। यही मानव के जीवन हेतु श्रेयस्कर तथा कल्याणप्रद है।

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