कुशोत्पाटिनी अमावस्या आज : कुशा के बिना की गई पूजा होती है निष्फल

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पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।

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आज भाद्रपद मास की अमावस्या है, इसे कुशग्रहणी और पिठोरा अमावस्या भी कहते हैं। इस तिथि पर धर्म-कर्म में इस्तेमाल होने वाली कुश घास सालभर के लिए इकट्ठा करने की परंपरा है। कुश घास का धर्म-कर्म में काफी अधिक महत्व है। इस घास के साथ पूजा-पाठ करने से भक्तों की मनोकामनाएं जल्दी पूरी होती हैं, ऐसी मान्यता है। श्राद्ध, तर्पण जैसे पितरों से जुड़े कामों में भी कुश घास की अंगूठी बनाकर पहनी जाती है। इसके बाद पितरों के लिए धर्म-कर्म किए जाते हैं। भाद्रपद अमावस्या पर कुश घास का संग्रहण किया जाता है, इस कारण इसे कुशग्रहणी अमावस्या कहते हैं।

कुशग्रहणी अमावस्या पर कुश घास को उखाड़ा जाता है। इस घास को हाथ से ही उखाड़ना चाहिए, इसके लिए किसी उपकरण का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। कुश का आगे वाला भाग हरा, पत्तियां पूर्ण होनी चाहिए। पूजा-कर्म में कुश हाथ में न हो तो पूजा अधूरी मानी जाती है। अनामिका (रिंग फिंगर) उंगली में कुश की अंगूठी पहनी जाती है। पूजा करते समय कुश के आसन पर बैठना चाहिए। ऐसा करने से शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा बनी रहती है, यदि जमीन पर सीधे बैठें तो ऊर्जा बनी रहती है, यदि जमीन पर सीधे बैठें तो पूजा-पाठ से मिलने वाली सकारात्मक ऊर्जा हम ग्रहण नहीं कर पाते हैं।कुश को ऊर्जा का कुचालक कहा जाता है। इसका इस्तेमाल आसन के रूप में करने से ऊर्जा शरीर में स्थिर रहती है, ये एक तरह से सकारात्मक ऊर्जा को जमीन से जाने से रोकने का कार्य करता है। वेदों में कुश को तत्काल फल देने वाला, आयु बढ़ाने वाला, वातावरण को शुद्ध करने वाला माना जाता है।

कुश से जुड़ी पौराणिक मान्यताएंमत्स्य पुराण की कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध कर के पृथ्वी को स्थापित किया। उसके बाद अपने शरीर पर लगे पानी को झाड़ा तब उनके शरीर से बाल पृथ्वी पर गिरे और कुशा के रूप में बदल गए। इसके बाद कुशा को पवित्र माना जाता है।महाभारत के अनुसार, जब गरुड़देव स्वर्ग से अमृत कलश लेकर आए तो उन्होंने वह कलश थोड़ी देर के लिए कुशा पर रख दिया। कुशा पर अमृत कलश रखे जाने से कुशा को पवित्र माना जाने लगा।

महाभारत के अनुसार, जब गरुड़देव स्वर्ग से अमृत कलश लेकर आए तो उन्होंने वह कलश थोड़ी देर के लिए कुशा पर रख दिया। कुशा पर अमृत कलश रखे जाने से कुशा को पवित्र माना जाने लगा।

महाभारत के आदि पर्व के अनुसार राहु की महादशा में कुशा वाले पानी से नहाना चाहिए। इससे राहु के अशुभ प्रभाव से राहत मिलती है। इसी ग्रंथ में बताया गया है कि कर्ण न जब अपने पितरों का श्राद्ध में कुश का उपयोग किया था। इसलिए कहा गया है कि कुश पहनकर किया गया श्राद्ध पितरों को तृप्त करता है।

कुशग्रहणी अमावस्या पर करें ये शुभ काम

अमावस्या पर पितर देवताओं के लिए श्राद्ध कर्म, तर्पण और धूप-ध्यान जरूर करना चाहिए। अमावस्या की दोपहर गाय के गोबर से बने कंडे जलाएं और अंगारों पर गुड़-घी डालकर पितरों का ध्यान करें। हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर से पितरों को अर्पित करें। इस दिन परिवार के मृत सदस्यों के लिए पिंडदान भी किया जा सकता है। माना जाता है कि अमावस्या पर किए गए इन शुभ कामों से पितर देवता तृप्त होते हैं।

अमावस्या की दोपहर गाय के गोबर से बने कंडे जलाएं और अंगारों पर गुड़-घी डालकर पितरों का ध्यान करें। हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर से पितरों को अर्पित करें। इस दिन परिवार के मृत सदस्यों के लिए पिंडदान भी किया जा सकता है। माना जाता है कि अमावस्या पर किए गए इन शुभ कामों से पितर देवता तृप्त होते हैं।

पुरानी परंपरा है कि अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान-दान करना चाहिए। अगर हमारे शहर के आसपास पवित्र नदी नहीं है तो हम घर पर ही पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। स्नान करते समय पवित्र नदियों का ध्यान करना चाहिए। स्नान के बाद घर के आसपास ही जरूरतमंद लोगों को दान-पुण्य करें।

भाद्रपद कृष्ण पक्ष अमावस्या, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, श्रावण | आज है पिठौरी अमावस्या and अमावस्या

आज अमावस्या तिथि 11:36 AM तक उपरांत प्रतिपदा | नक्षत्र मघा 12:54 AM तक उपरांत पूर्व फाल्गुनी | परिघ योग 01:19 PM तक, उसके बाद शिव योग | करण नाग 11:36 AM तक, बाद किस्तुघन 11:38 PM तक, बाद बव | आज राहु काल का समय 09:10 AM – 10:34 AM है | आज चन्द्रमा सिंह राशि पर संचार करेगा

  1. विक्रम संवत – 2082, सिद्धार्थ
  2. शक सम्वत – 1947, विश्वावसु
  3. पूर्णिमांत – भाद्रपद
  4. अमांत – श्रावण

तिथि

  1. कृष्ण पक्ष अमावस्या   – Aug 22 11:56 AM – Aug 23 11:36 AM
  2. शुक्ल पक्ष प्रतिपदा   – Aug 23 11:36 AM – Aug 24 11:48 AM

नक्षत्र

  1. मघा – Aug 23 12:16 AM – Aug 24 12:54 AM
  2. पूर्व फाल्गुनी – Aug 24 12:54 AM – Aug 25 02:05 AM
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