
देहरादून: वंचित समुदायों के वे बच्चे, जो कभी स्कूल जाने का सपना भी नहीं देख पाते थे, अब पढ़ाई कर रहे हैं। उनके हाथों में अब कापी और कलम है, और उनकी आँखों में एक नई उम्मीद जग चुकी है। यह बदलाव मनीष के निरंतर प्रयासों से संभव हो पाया है। वे जोश वेलफेयर सोसाइटी के साथ मिलकर इन बच्चों तक शिक्षा पहुँचाने का काम शांति और समर्पण के साथ कर रहे हैं।
मनीष का बचपन संघर्षों से भरा हुआ था। लेकिन परिजनों के सहयोग से उन्होंने उच्च शिक्षा हालिस कर ली। उनकी जीवन यात्रा ने उन्हें सिखाया कि शिक्षा ही सबसे सशक्त हथियार है, जिससे न केवल गरीबी का मुकाबला किया जा सकता है, बल्कि अपने मानवाधिकारो की भी रक्षा की जा सकती है।
वंचित बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए मनीष ने जोश वेलफेयर सोसाइटी के साथ जुड़कर प्रोजेक्ट रेनबो के अंतर्गत काम करने का निर्णय लिया. इसके लिए उन्होंने देहरादून के राजीव नगर में संचालित परियोजना में कार्य करने का मन बनाया। सुप्रिया चौहान के नेतृत्व में कार्य करते हुए मनीष ने इन बच्चों को न केवल बुनियादी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं, बल्कि उन्हें उनके अधिकारों के प्रति भी जागरूक कर रहे हैं विशेष रूप से शिक्षा का अधिकार और बच्चों के मानवाधिकार जैसे कि सुरक्षा, गरिमा और अवसर की समानता।
जोश वेलफेयर सोसाइटी, सुप्रिया चौहान के मार्गदर्शन में, न केवल बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाने में मदद करती है, बल्कि उनके माता-पिता को भी यह समझाने का प्रयास करती करती है कि शिक्षा बच्चों का मौलिक अधिकार है। संस्था आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को किताबें, स्टेशनरी, स्कूल ड्रेस, और फीस की सहायता प्रदान करती है ताकि कोई बच्चा सिर्फ अभाव के कारण शिक्षा से वंचित न रह जाए। अब तक जोश वेलफेयर सोसाइटी में 400 से अधिक बच्चे पढ़ चुके हैं, जो इस पहल की गहराई और प्रभाव को दर्शाता है।
आज मनीष स्वयं 35 से 40 बच्चों को नियमित रूप से बुनियादी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं- गणित, भाषा और सामान्य ज्ञान जैसे विषयों में। उनका यह कार्य पूर्णतः निःस्वार्थ है और वे इसे एक कर्तव्य मानते हैं। मनीष कहते हैं कि जिस समाज और संस्था ने उन्हें आज इस मुकाम तक पहुँचाया, आज वह उसी समाज को कुछ लौटाने का प्रयास कर रहे हैं।
वे इस अवसर का श्रेय पूरी तरह से सुप्रिया चौहान को देते हैं, जिन्होंने न केवल उन्हें मंच प्रदान किया, बल्कि उनका मार्गदर्शन करते हुए उनमें यह विश्वास भी जगाया कि वे भी बदलाव के वाहक बन सकते हैं। जोश वेलफेयर सोसाइटी की सुप्रिया का यह दृष्टिकोण रहा है कि हर युवा जो किसी समय वंचित रहा हो, यदि उसे अवसर मिले तो वह दूसरों के जीवन में भी रोशनी ला सकता है।
जोश वेलफेयर सोसाइटी में मनीष का योगदान केवल एक स्वयंसेवक तक सीमित नहीं रहा- वे बच्चों की पढ़ाई की योजना बनाने, माता-पिता से संवाद स्थापित करने, और सामुदायिक कक्षाओं के संचालन में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि जब मार्गदर्शन और संकल्प मिल जाए, तो एक छात्र भी समाज को दिशा दे सकता है।
मनीष और जोश वेलफेयर सोसाइटी की यह साझी पहल आज न जाने कितने बच्चों के सपनों में रंग भर रही है। यह केवल शिक्षा नहीं, बल्कि मानव गरिमा और अधिकारों की पुनःस्थापना का यज्ञ है-जिसमें मनीष जैसे युवा अग्रदूत की भूमिका निभा रहे हैं।