श्राद्ध से जुड़े सवाल: कौए, गाय, कुत्ते को पितृपक्ष में भोजन क्यों दिया जाता है, पिंड चावल के क्यों बनाए जाते हैं, श्राद्ध में चावल की खीर ही क्यों बनाई जाती है?

पितृ पक्ष शुरू हो चुका है। पितृ पक्ष के दिनों में पितरों के पिंडदान, श्राद्ध, तर्पण आदि कर्म किए जाते हैं। खासतौर पर कौए, गाय और कुत्ते को भोजन देने की, चावल के बने पिंड का दान करने की परंपरा है। श्राद्ध पक्ष के संबंध में कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। जानिए पंडित उदय शंकर भट्ट से पितृ पक्ष से जुड़े सवालों के जवाब….

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श्राद्ध में चावल की खीर ही क्यों बनाई जाती है?

पितृ पक्ष में पके हुआ अन्न दान का विशेष महत्व है। चावल को हविष्य अन्न यानी देवताओं का अन्न माना जाता है। इसलिए चावल की ही खीर बनाई जाती है। धान यानी चावल ऐसा अनाज है, जो पुराना होने पर भी खराब नहीं होता। जितना पुराना होता है, उतना ही अच्छा माना जाता है। चावल के इसी गुण के कारण इसे जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों में शामिल किया जाता है।

चावल, जौ और काले तिल से ही क्यों बनाए जाते हैं पिंड?

चावल को हविष्य अन्न माना गया है। हविष्य यानी हवन में इस्तेमाल होने वाला। देवताओं और पितरों को चावल प्रिय है। इसलिए यह पहला भोग होता है। अगर चावल न हो तो जौ के आटे के पिंड बना सकते हैं। ये भी न हो तो काले तिल से पिंड बनाकर पितरों को अर्पित कर सकते हैं। ये तीनों ही हवन में उपयोग होते हैं।

श्राद्ध में कौए-गाय को भोजन क्यों दिया जाता है?

सभी पितरों का वास पितृलोक और कुछ समय यमलोक भी रहता है। पितृ पक्ष में यम बलि और श्वान बलि देने का विधान है। यम बलि कौए को और श्वान बलि कुत्ते को भोजन के रूप में दी जाती है। कौए को यमराज का संदेश वाहक माना गया है। यमराज के पास दो श्वान यानी कुत्ते भी हैं। इन्हीं की वजह से कौए और कुत्तों को भोजन दिया जाता है। वहीं, गाय में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इस वजह से गाय को भी भोजन दिया जाता है।

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श्राद्ध करने के लिए दोपहर का समय ही श्रेष्ठ क्यों है?

मान्यता है पितृ पक्ष में दोपहर के समय किया गया श्राद्ध पितर देवता सूर्य के प्रकाश से ग्रहण करते हैं। दोपहर के समय सूर्य अपने पूरे प्रभाव में होता है। इस वजह से पितर अपना भोग अच्छी तरह ग्रहण कर पाते हैं। सूर्य को ही इस सृष्टि में एक मात्र प्रत्यक्ष देवता माना गया है जिसे हम देख और महसूस कर पाते हैं।

सूर्य को अग्नि का स्रोत भी माना गया है। देवताओं के भोजन देने के लिए यज्ञ किए जाते हैं। वैसे ही पितरों को भोजन देने के लिए सूर्य की किरणों को जरिया माना गया है।

श्राद्ध कर्म के समय अनामिका उंगली में कुशा क्यों पहनते हैं?

कुशा को पवित्री कहा जाता है। कुशा एक विशेष प्रकार की घास है। सिर्फ श्राद्ध कर्म में ही नहीं, अन्य सभी कर्मकांड में भी कुशा को अनामिका में धारण किया जाता है। इसे पहनने से हम पूजन कर्म के लिए पवित्र हो जाते हैं। कुशा में एक गुण होता है, जो दूर्वा में भी होता है। ये दोनों ही अमरता वाली औषधि हैं, ये शीतलता प्रदान करती हैं।

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आयुर्वेद में इन्हें एसिडिटी और अपच में उपयोगी माना गया है। चिकित्सा विज्ञान कहता है कि अनामिका उंगली का सीधा संबंध दिल से होता है। अनामिका यानि रिंग फिंगर में कुशा बांधने से हम पितरों के लिए श्राद्ध करते समय शांत और सहज रह सकते हैं, क्योंकि ये हमारे शरीर से लगकर हमें शीतलता प्रदान करती है।

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