आज का पंचांग : माँ कात्यायनी नमोऽस्‍तुते

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है। आज (28 सितंबर) नवरात्रि का सातवां दिन है, लेकिन तिथि है आश्विन शुक्ल षष्ठी। इस तिथि पर देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है। जो भक्त मनचाहा जीवन साथी पाना चाहते हैं, उन्हें देवी कात्यायनी की पूजा करनी चाहिए। मान्यता है कि द्वापर युग में श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए गोकुल-वृंदावन की गोपियों ने देवी के इसी स्वरूप की पूजा की थी। देवी लाल, हरे, पीले वस्त्र धारण करती हैं। पूजा में देवी को शहद, माल्पुवा का भोग लगाना चाहिए।

आश्विन शुक्ल पक्ष षष्ठी, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, आश्विन |

आज षष्ठी तिथि 02:27 PM तक उपरांत सप्तमी | नक्षत्र ज्येष्ठा 03:54 AM तक उपरांत मूल | आयुष्मान योग 12:31 AM तक, उसके बाद सौभाग्य योग | करण तैतिल 02:27 PM तक, बाद गर 03:33 AM तक, बाद वणिज | आज राहु काल का समय 04:44 PM – 06:13 PM है | आज 03:54 AM तक चन्द्रमा वृश्चिक उपरांत धनु राशि पर संचार करेगा |

देवी कात्यायनी की कथा

देवी के इस स्वरूप से जुड़ी दो कथाएं हैं।

पहली कथा

महिषासुर का वध करने के लिए ब्रह्म, विष्णु और महेश ने अपनी शक्तियों से देवी दुर्गा को प्रकट किया था।

उस समय ऋषि कात्यायन ने देवी दुर्गा की सबसे पहली पूजा की थी। इस कारण मां दुर्गा कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुईं। इस पूजा के बाद देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था।

दूसरी कथा

पुराने समय में कत नाम के एक ऋषि थे, इनके पुत्र थे कात्य और कात्य ऋषि के पुत्र थे कात्यायन। कात्यायन ऋषि देवी दुर्गा को पुत्री रूप में पाना चाहते थे। इसके लिए कात्यायन ने देवी दुर्गा को प्रसन्न करने की कामना से कठोर तप किया।

ऋषि की तपस्या से देवी दुर्गा प्रसन्न हो गईं और मनचाहा वरदान दिया। कुछ समय बाद देवी ने कात्यायन की पुत्री के रूप में जन्म लिया। कात्यायन की पुत्री होने की वजह से देवी का नाम कात्यायनी पड़ा।

देवी का संदेश

देवी ने अपने परम भक्त कात्यायन ऋषि की इच्छा का मान रखा और उनके यहां पुत्री रूप में जन्म लिया। ठीक इसी तरह जो लोग हमें मान-सम्मान देते हैं, हमारे शुभचिंतक हैं, हमें उनका और उनकी इच्छाओं का मान रखना चाहिए।

आज का विचार

क्या हम यह नहीं जानते कि आत्म सम्मान, आत्म निर्भरता के साथ आता है? आप ईश्वर में तब तक विश्वास नहीं कर पाएंगे जब तक आप अपने आप में विश्वास नहीं करते.!

आज का भगवद् चिन्तन

माँ कात्यायनी नमोऽस्‍तुते

माँ दुर्गा द्वारा अपने भक्तों के व लोकमंगल के लिए विभिन्न चरित्र किए जाते हैं। माँ की प्रत्येक लीला मानव जीवन को कुछ विशेष संदेश प्रदान करती हुई अपने भक्तों के कल्याण के लिए ही होती हैं। ऐसे ही माँ दुर्गा द्वारा रक्तबीज असुर का जिस तरह से नाश किया जाता है, वह बड़ा ही प्रतीकात्मक व संदेशप्रद है।

यह रक्तबीज कुछ और नहीं हमारी कामनाएँ ही हैं, जो एक के बाद एक जन्म लेती रहती हैं। एक इच्छा पूर्ण हुई कि दूसरी और तीसरी अपने आप जन्म ले लेती हैं। हम निरंतर इनसे संघर्ष भी करते रहते हैं, लेकिन निराशा ही हाथ लगती है क्योंकि हमारे अधिकतर प्रयास इच्छापूर्ति की दिशा में होते हैं, इच्छा दमन की दिशा में नहीं।

रक्तबीज तब तक नहीं मरता जब तक उसके रक्त की एक भी बूँद शेष रहती है। ऐसे ही हमें भी हमारी अकारण की इच्छाओं और कामनाओं को पी जाना होगा जो व्यर्थ में दुःखी और व्यथित करती रहती हैं। कामनाओं को पी जाना अर्थात उन्हें विवेकपूर्ण नियंत्रित करना है। नवरात्रि के छठवें दिवस में माँ कात्यायनी का पूजन किया जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *