आज का पंचांग : 2026 में अपनाएं रामायण-महाभारत की सीख

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है

पौष शुक्ल पक्ष त्रयोदशी, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, पौष |आज है प्रदोष व्रत और रोहिणी व्रत|

आज त्रयोदशी तिथि 10:22 PM तक उपरांत चतुर्दशी | नक्षत्र रोहिणी 10:48 PM तक उपरांत म्रृगशीर्षा | शुभ योग 05:12 PM तक, उसके बाद शुक्ल योग | करण कौलव 12:06 PM तक, बाद तैतिल 10:22 PM तक, बाद गर | आज राहु काल का समय 01:49 PM – 03:09 PM है | आज चन्द्रमा वृषभ राशि पर संचार करेगा |

आज 2026 का पहला दिन है। नए साल में सोच सकारात्मक और धैर्य बनाए रखने का संकल्प लेंगे, तो मुश्किल समय में शांत और सुखी रहेंगे। रामायण और महाभारत के किस्सों से जानिए असफलता का सामना कैसे कर सकते हैं…

हर स्थिति में आत्मविश्वास बनाए रखें

देवी सीता की खोज करते-करते वानर सेना दक्षिण दिशा में संपाति के पहुंच गई थी। संपाति गिद्दराज जटायु के भाई थी। संपाति ने हनुमान, जामवंत, अंगद और अन्य वानरों को बताया कि देवी सीता समुद्र पार स्थित रावण की लंका में हैं।

इसके बाद वानरों ने ये तय किया किसी लंका जाकर देवी सीता की खोज करनी चाहिए, लेकिन इसके लिए समुद्र पार करना था। ये काम बहुत मुश्किल था। सबसे पहले अंगद ने इस काम के लिए असर्मथता जताई, जामवंत ने भी मना कर दिया। इसके बाद जामवंत ने हनुमान जी से कहा ये काम आपको करना चाहिए और आप ये काम कर सकते हैं।

जामवंत ने हनुमान को उनकी शक्तियों का स्मरण कराया। आत्मविश्वास जागते ही हनुमान जी ने समुद्र लांघने का संकल्प लिया। रास्ते में सुरसा, सिंहिका जैसी बाधाएं भी आईं, लेकिन उन्होंने बुद्धि और साहस से समाधान निकाला और लंका पहुंच गए।

हनुमान जी की सीख

अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखें, आत्मसंदेह प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है।

बड़े लक्ष्यों को पाने के लिए धैर्य और योजना आवश्यक है।

समस्याओं का समाधान बल से नहीं, बुद्धि से करें।

नए साल में अपने अंदर की संभावनाओं को पहचानें।

सही समय पर सही कदम उठाना सफलता की कुंजी है।

मुश्किल समय में भी धैर्य और भगवान पर भरोसा बनाए रखें

महाभारत में पांडव युधिष्ठिर द्युत क्रीडा में दुर्योधन से सब कुछ हार गए थे। वे अपने भाइयों और द्रौपदी को भी हार गए थे। इसके बाद भरी सभा में द्रौपदी का अपमान हुआ। दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहण किया, उस मुश्किल समय में द्रौपदी की किसी ने मदद नहीं की। ऐसे मुश्किल समय में भी द्रौपदी ने धैर्य और श्रीकृष्ण पर भरोसा बनाए रखा। जब सभी रास्ते बंद दिखे, तब उन्होंने श्रीकृष्ण को याद किया। श्रीकृष्ण की कृपा से द्रौपदी की लाज बची। इसके बाद द्रौपदी ने इस अपमान का बदला लेने का संकल्प लिया और अधर्म के विरुद्ध मजबूती से खड़ी रहीं। बाद में महाभारत युद्ध में कौरवों की हार हुई।

द्रौपदी की सीख

हालात कितने भी मुश्किल हों, धैर्य न छोड़ें।

हर स्थिति में भगवान पर आस्था बनाए रखें।

योग्य व्यक्ति से मदद मांगने में संकोच न करें।

भगवान अपने सच्चे भक्त की मदद जरूर करते हैं।

अधर्म के विरुद्ध मजबूती से खड़े रहना चाहिए।

युधिष्ठिर की सीख

परिस्थितियां कितनी भी कठिन हों, सत्य और धर्म न छोड़ें। युधिष्ठिर ने युद्ध जैसे कठिन समय में भी असत्य नहीं बोला।

आधा सत्य भी न छिपाएं। युधिष्ठिर ने अश्वत्थामा मारा गया के साथ ये भी कहा था कि वह हाथी था, यानी सत्य को पूरा कहना चाहिए।

जीवन में रणनीति आवश्यक है, लेकिन हर व्यक्ति की भूमिका अलग होती है। श्रीकृष्ण ने रणनीति संभाली और युधिष्ठिर ने नैतिकता, दोनों ने अपना-अपना कर्म किया।

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