आज का पंचांग : सेवा की श्रेष्ठता

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर‘ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।

माघ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, माघ | आज है रविदास जयंती,  सत्य व्रत, पूर्णिमा व्रत, पूर्णिमा और सत्य व्रत|

आज पूर्णिमा तिथि 03:39 AM तक उपरांत प्रतिपदा | नक्षत्र पुष्य 11:57 PM तक उपरांत आश्लेषा | प्रीति योग 10:18 AM तक, उसके बाद आयुष्मान योग | करण विष्टि 04:43 PM तक, बाद बव 03:39 AM तक, बाद बालव | आज राहु काल का समय 04:47 PM – 06:09 PM है | आज चन्द्रमा कर्क राशि पर संचार करेगा |

अच्छी आदतों के परिणाम वर्तमान में मिलते हैं और बुरी आदतों के नतीजे भविष्य में छुपे रहते हैं। मनुष्य के जीवन में कुछ तो नियम होते हैं और कुछ आदतें होती हैं। अगर आदतें अच्छी हों तो नियम पालना आसान होता है। बुरी आदत वाले को नियम तोड़ने में ही मजा आता है।

भ्रष्ट आचरण न किया जाए, यह एक राजकीय नियम है। लेकिन कितने ही अच्छे लोग सत्ता में बैठ जाएं, लगता है देश से भ्रष्टाचार जा नहीं रहा। एक अधिकारी ने भ्रष्टाचार की व्याख्या करते हुए मुझे बताया था कि चार पशुओं का उदाहरण लेकर नौकरशाहों के भ्रष्टाचार को देखा जा सकता है।

पहला, पैसा अपने आप आता है- जैसे मछली पानी में रहकर पानी पी लेती है, पता नहीं लगता। दूसरी श्रेणी के लोग गाय जैसे होते हैं, मांगकर लेते हैं। तीसरे छीनकर लेते हैं, यानी बंदर की श्रेणी। और चौथे शेर जैसे लूट ही लेते हैं। लेकिन योग को आदत बना लें तो धीरे-धीरे वह अपने आप स्वभाव में बदल जाएगा। नतीजे में अच्छी आदत अपने आप उतरेगी।

आज का चिंतन

हमारे शब्दों का चयन ही हमारे व्यक्तित्व को दर्शाता है। आइए उन लोगों का आभार मानें जो हमें खुश रखते हैं। ये वो मन मोहक माली हैं जो हमारी आत्मा को खिलने देते हैं। इन फ़रिश्तों को संबंध कहते हैं।

आज का भगवद् चिन्तन
सेवा की श्रेष्ठता

अपेक्षारहित अथवा निस्वार्थ सेवा भी ईश्वर की आराधना का ही एक रूप है। यदि जीवन में सेवा का सौभाग्य मिलता हो तो सेवा सभी की करना लेकिन आशा किसी से भी मत रखना क्योंकि सेवा का वास्तविक मूल्य भगवान दे सकते हैं, इंसान नहीं। जगत से अपेक्षा रखकर कोई सेवा की गई है तो वो एक न एक दिन निराशा का कारण अवश्य बनेगी।

श्रेष्ठ तो यही है कि अपेक्षा रहित होकर सभी की सेवा की जाए। यदि सेवा का मूल्य ये दुनिया अदा कर दे, तो समझ जाना वो सेवा नहीं हो सकती। सेवा कोई वस्तु भी नहीं है, जिसे खरीदा और बेचा जा सके। सेवा पुण्य कमाने का साधन है, प्रसिद्धि कमाने का नहीं। दुनिया की नजरों में सम्मानित होना बड़ी बात नहीं, गोविन्द की नजरों में सम्मानित होना बड़ी बात है।

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