आज का पंचांग : परमात्मा सबके साथ है, पर हम उसके साथ कितने हैं?

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।

कार्तिक कृष्ण पक्ष दशमी, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, आश्विन |

आज दशमी तिथि 10:35 AM तक उपरांत एकादशी | नक्षत्र आश्लेषा 12:42 PM तक उपरांत मघा | शुभ योग 02:10 AM तक, उसके बाद शुक्ल योग | करण विष्टि 10:36 AM तक, बाद बव 10:50 PM तक, बाद बालव | आज राहु काल का समय 01:38 PM – 03:00 PM है | आज 12:42 PM तक चन्द्रमा कर्क उपरांत सिंह राशि पर संचार करेगा |

परमात्मा सबके साथ है, पर हम उसके साथ कितने हैं?

परमात्मा सबके भीतर विराजित है। फर्क यह है कि परमात्मा तो सबके साथ है, लेकिन हम परमात्मा के साथ कितने हैं? जो अच्छे होते हैं, वे परमात्मा के साथ होते हैं। और जो बुरे होते हैं, परमात्मा तो उनके साथ होता है, पर वो परमात्मा के साथ नहीं होते।

परमात्मा का एहसास करने के लिए जो सरल तरीका अच्छे लोग अपनाते हैं, वो है अपनी आत्मा तक जाना परमात्मा से जुड़ने और आत्मा तक जाने के जो भी तरीके हैं, उनमें से एक है- ईश्वर की कथा सुनते रहिए। आपके श्रवण का जो भी ढंग हो, पर चौबीस घंटे में कुछ ना कुछ भगवान का नाम सुनिए, कथा सुनिए।

तुलसीदास जी ने लिखा है- ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।। जिन्हें रघुनाथ जी की कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्मा की हत्या करने वाले हैं। जरूरी नहीं कि पण्डाल में बैठकर किसी महात्मा की कथा ही सुनें। ईश्वर की कथा सुनने का अर्थ है जीवन में पॉजिटिविटी लाना। वो जिस तरीके से जीवन में आए, कर जाइए।

आज का विचार

सिहं अगर चट्टान पर बैठ जाए तो वह चट्टान भी सिंहासन कहलाती है। इसीलिए सिंहासन का मोह ना रखते हुए खुद सिंह बनो आप जहां पर बैठेंगे, वहां सिहांसन खुद बन जाएगा.

आज का भगवद् चिन्तन
समर्थ बनें-विनम्र रहें

जीवन में सामर्थ्य आती है तो व्यक्ति के भीतर सम्मान प्राप्ति का भाव भी जागृत हो जाता है। निःसंदेह सामर्थ्य के साथ सहजता का आ जाना ही तो जीवन की महानता है क्योंकि जहाँ समर्थता होती है, वहाँ प्रायः विनम्रता का अभाव ही देखा जाता है। सहनशीलता ही मानव जीवन की सबसे बड़ी सामर्थ्य है। सामर्थ्य का अर्थ यह नहीं कि आप दूसरों को कितना झुका सकते हो अपितु यह है, कि आप स्वयं कितना झुक सकते हो।

सदैव इस बात के लिए प्रयासरत रहें कि हम सम्मान पाने की लालसा रखने वाले नहीं, सम्मान देने वाले बन सकें। बल का उपयोग स्वयं सम्मान प्राप्त करने के लिए नहीं अपितु दूसरों के सम्मान की रक्षा के लिए करना ही जीवन की श्रेष्ठता है। झुक कर जीना सीखो ताकि दूसरों के आशीर्वाद भरे हाथ सहजता से आपके सिर तक पहुँच सकें। यह बात भी स्मरण रहे कि जीवन में अकड़ने से विवाद और झुकने से आशीर्वाद स्वतः प्राप्त हो जाते हैं।

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