पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस बार ये व्रतआज 6 जुलाई को है। इस तिथि से भगवान विष्णु विश्राम करते हैं। अब विष्णु जी देवउठनी एकादशी (1 नवंबर) तक विश्राम करेंगे। इन चार महीनों में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे संस्कारों के लिए शुभ मुहूर्त नहीं रहते हैं। विष्णु जी के विश्राम के समय को चातुर्मास कहा जाता है, इन दिनों में पूजा-पाठ के साथ ही मंत्र जप और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है। चातुर्मास में ग्रंथों का पाठ करना चाहिए और प्रवचन भी सुनने चाहिए।
मान्यताओं के अनुसार, एकादशी तिथि स्वयं भगवान श्री विष्णु की परम प्रिय तिथि है। एकादशी भगवान विष्णु से प्रकट देवी का स्वरूप है, जिन्होंने मुर नामक राक्षस का वध किया था। देवशयनी एकादशी के दिन सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के पालनकर्ता श्री हरि विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इस दिन यानि आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी, देवशयनी एकादशी से लेकर कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तक, कुल चार महीनों की यह अवधि चातुर्मास कहलाती है, जिसमें भगवान विष्णु विश्राम की अवस्था में रहते हैं।
एकादशी व्रत है सभी व्रतों में श्रेष्ठ
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, एकादशी व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है। जो व्यक्ति एकादशी का व्रत करता है, उन्हें विष्णु जी की कृपा मिलती है। एक साल में कुल 24 एकादशियां आती हैं, जिस साल में अधिकमास रहता है, तब एकादशियों की संख्या 26 हो जाती है।
ऐसे कर सकते हैं एकादशी व्रत
एकादशी व्रत की शुरुआत एक दिन पहले यानी दशमी (5 जुलाई) की शाम से हो जाती है। दशमी की शाम को संतुलित आहार करें और भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करें।
एकादशी की सुबह ब्रह्म मुहूर्त यानी सूर्योदय से पहले जागें और स्नान के बाद उगते सूर्य को जल चढ़ाएं।
घर के मंदिर में विष्णु पूजन करें। विष्णु जी के सामने एकादशी व्रत करने का संकल्प लें।
इसके बाद दिनभर निराहार रहें और भगवान का ध्यान करें। मंत्र जप, ग्रंथों का पाठ करें। दान-पुण्य करें। गायों की देखभाल करें। गौशाला में धन का दान करें।
जो लोग भूखे नहीं रह पाते हैं, उन्हें एक समय फलाहार करना चाहिए। शाम को भी विष्णु पूजन करें। अगले दिन यानी द्वादशी (7 जुलाई) तिथि की सुबह पूजा-पाठ के बाद जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं और फिर खुद खाना खाएं। इस तरह एकादशी व्रत पूरा होता है।
देवशयनी एकादशी व्रत कथा
कथा के अनुसार एक बार की बात है। उस समय राजा मांधाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वी पर राज करते थे। वे अत्यंत धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और प्रजा के सुख के लिए समर्पित शासक थे। उनके राज्य में हर ओर खुशहाली थी। खेत हरे-भरे थे, नदियाँ लबालब बहती थीं और प्रजा संतुष्ट थी। एक बार राज्य में लगातार तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। धरती बंजर हो गई, जल के स्रोत सूख गए और धीरे-धीरे पूरे राज्य में भीषण अकाल फैल गया। भोजन का संकट गहराने लगा और प्रजा भूख-प्यास से त्रस्त हो उठी। प्रजा ने हर संभव उपाय किए। यज्ञ, व्रत, तप, हवन और दान आदि धार्मिक क्रियाएं कीं, लेकिन वर्षा नहीं हुई। हताश होकर वे राजा मांधाता के पास पहुँचे और अपनी व्यथा सुनाई।
राजा मांधाता को यह देखकर गहरा दुख हुआ। उन्होंने स्वयं से प्रश्न किया कि मैंने तो हमेशा धर्म का पालन किया, फिर ऐसा अकाल क्यों? क्या मुझसे कोई त्रुटि हो गई है, जिसके कारण राज्य को इतना बड़ा दंड झेलना पड़ रहा है? उनका हृदय व्याकुल हो उठा और उन्होंने तय किया कि जब तक समाधान नहीं मिलेगा, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे। राजा अपनी सेना और कुछ विश्वासी सेवकों के साथ जंगल की ओर प्रस्थान कर गए। कई दिन की यात्रा के बाद वे ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचे।
महर्षि अंगिरा ने राजा का स्नेहपूर्वक स्वागत किया और उनसे आने का कारण पूछा। राजा ने हाथ जोड़कर कहा, “हे ऋषिवर! मैंने सदा धर्म का पालन किया है, प्रजा की सेवा की है। फिर भी मेरे राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। कृपा करके इस संकट से उबरने का मार्ग बताइए।” महर्षि अंगिरा ने ध्यान लगाकर कहा, “हे राजन, यह सतयुग है। यहाँ तक कि छोटे से भी पाप का बड़ा दंड मिलता है। राज्य में कोई सूक्ष्म दोष या अधर्म का प्रभाव हो सकता है। इसका निवारण करने के लिए तुम आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत करो। यह एकादशी देवशयनी एकादशी कहलाती है। इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं। यदि तुम श्रद्धा से इस व्रत को करो और इसकी पवित्र कथा का पाठ करो, तो निश्चय ही वर्षा होगी।”
राजा मांधाता ने महर्षि की आज्ञा को सिर झुकाकर स्वीकार किया और आश्रम में ही देवशयनी एकादशी का व्रत रखा। उन्होंने विधिपूर्वक पूजा की, कथा का श्रवण किया और रात्रि को जागरण करते हुए भगवद्भक्ति में लीन हो गए। व्रत के प्रभाव से वही हुआ जिसकी आशा थी। अगले दिन आकाश में बादल घिर आए, बिजली चमकी और मूसलधार वर्षा होने लगी। पूरा राज्य जल से भर गया। नदियाँ बह चलीं, खेत लहलहा उठे और प्रजा के चेहरों पर फिर से मुस्कान लौट
आई। राजा ने महर्षि अंगिरा को कृतज्ञता पूर्वक प्रणाम किया और अपने राज्य लौटकर जनकल्याण में जुट गए।
इस कथा से स्पष्ट होता है कि देवशयनी एकादशी का व्रत केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि श्रद्धा, तप और ईश्वर पर विश्वास की परीक्षा है। इस दिन कथा का पाठ करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को विधिपूर्वक करता है, उसके समस्त कष्ट दूर होते हैं, पाप नष्ट होते हैं और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। जब भी आप देवशयनी एकादशी का व्रत करें, इस पवित्र कथा का श्रवण अवश्य करें। बिना कथा के व्रत अधूरा माना जाता है। यह व्रत केवल पुण्य ही नहीं देता, बल्कि जीवन में शांति, समृद्धि और भगवद् कृपा भी प्रदान करता है।
आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, आषाढ़ |आज है आषाढ़ी एकादशी
आज एकादशी तिथि 09:15 PM तक उपरांत द्वादशी | नक्षत्र विशाखा 10:41 PM तक उपरांत अनुराधा | साध्य योग 09:27 PM तक, उसके बाद शुभ योग | करण वणिज 08:09 AM तक, बाद विष्टि 09:15 PM तक, बाद बव | आज राहु काल का समय 04:32 PM – 06:12 PM है | आज 04:00 PM तक चन्द्रमा तुला उपरांत वृश्चिक राशि पर संचार करेगा
- विक्रम संवत – 2082, कालयुक्त
- शक सम्वत – 1947, विश्वावसु
- पूर्णिमांत – आषाढ़
- अमांत – आषाढ़
तिथि
- शुक्ल पक्ष एकादशी – Jul 05 06:59 PM – Jul 06 09:15 PM
- शुक्ल पक्ष द्वादशी – Jul 06 09:15 PM – Jul 07 11:10 PM
नक्षत्र
- विशाखा – Jul 05 07:51 PM – Jul 06 10:41 PM
- अनुराधा – Jul 06 10:41 PM – Jul 08 01:11 AM