पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर‘ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है
माघ शुक्ल पक्ष पंचमी, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, माघ | आज है बसंत पंचमी|
आज पंचमी तिथि 01:46 AM तक उपरांत षष्ठी | नक्षत्र पूर्वभाद्रपदा 02:32 PM तक उपरांत उत्तरभाद्रपदा | परिघ योग 03:58 PM तक, उसके बाद शिव योग | करण बव 02:10 PM तक, बाद बालव 01:46 AM तक, बाद कौलव | आज राहु काल का समय 11:17 AM – 12:38 PM है | आज 08:33 AM तक चन्द्रमा कुंभ उपरांत मीन राशि पर संचार करेगा |
देवी सरस्वती का स्वरूप निर्मल चांद के समान है और मुख पर कांति व्याप्त है। माता स्वेत और पीत वस्त्रों को धारण करती हैं। मां दुर्गा के द्वितीय स्वरूप ब्रह्मचारिणी माता को देवी सरस्वती का ही रूप माना जाता है। ब्रह्मचारिणी माता के रूप में देवी सरस्वती पीत वस्त्र धारण करती हैं। वैसे आमतौर पर माता सरस्वती को स्वेत वस्त्रों को धारण किेए ही हर प्रतिमा और तस्वीरों में दिखाया जाता है।
माता कमल पर और हंस पर विराजमान होती हैं। और अपने चतुर्भुज रूप को धारण कर वीणा की मधुर ध्वनि झंकृत करती हैं। माता की वीणा की इसी ध्वनि से सृष्टि में सभी जीव जंतुओं पर प्रकृति में स्वर गूंजता है।
देवी सरस्वती के हाथों में पुस्तक का रहस्य
देवी सरस्वती ज्ञान की देवी हैं और पुस्तक ज्ञान का भंडार है। कहते हैं सृष्टि का संपूर्ण ज्ञान वेदों में छिपा है बस उसे समझने की जरूरत है। देवी सरस्वती ज्ञान की उसी प्रतिमूर्ति वेदों को अपने हाथों में धारण करती हैं। वेद माता की हाथों की शोभा हैं। इसलिए सरस्वती पूजा के दिन बच्चे उन पुस्तकों को माता सरस्वती के समीप रखते हैं और उनकी पूजा करते हैं जो उन्हें कठिन जान पड़ता है। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि माता सरस्वती की कृपा होने से कठिन विषय भी समझना सरल हो जाता है।
सरस्वती के हाथों में वीणा का रहस्य
माता सरस्वती के प्राकट्य को लेकर कथा है कि सृष्टि में देवी सरस्वती के आगमन से पहले सृष्टि में कोई ध्वनि नहीं थी। पूरी सृष्टि निःशब्द और स्वर विहीन थी। देव सरस्वती वीणा लेकर प्रकट हुई थीं। इन्होंने अपनी वाणी के तारों को झंकृत किया तो नदियों और पक्षियों में स्वर गूंजने लगे। मूक सृष्टि में स्वर लहरी बहने लगी। देवी की वाणी प्राण का प्रतीक है, वाणी का प्रतीक है। देवी सरस्वती बताती हैं कि केवल किताबी ज्ञान ही नहीं कला का ज्ञान भी संसार के लिए आवश्यक है। क्योंकि कला विहीन सृष्टि में प्राण का स्पंदन नहीं हो सकता है। इसलिए देवी सरस्वती हाथों में वीणा धारण करती हैं
आज का भगवद् चिंतन
ईश्वर को भीतर भी खोजें
हृदय की पावनता मन को ही मंदिर बना देती है। यदि ईश्वर तुम्हारे भीतर नहीं तो फिर दुनिया में अन्यत्र कहीं भी नहीं है। और यदि ईश्वर तुम्हारे भीतर भी है तो समझो वो ब्रह्माण्ड में सर्वत्र व्याप्त है। हृदय की पावनता में ही ईश्वरीय सत्ता का उद्भव होता है। जब तक स्वयं के भीतर ईश्वर की अनुभूति न हो तब तक बाहर की खोज भी व्यर्थ ही है और हृदय की मलीनता तुम्हें केवल खोजना सिखायेगी, पाना नहीं।
जहाँ दिव्यता है-वहाँ देव हैं, जहाँ भाव है-वहाँ भगवान हैं, जहाँ प्रेम है-वहाँ परमेश्वर हैं, जहाँ शुद्धि है-वहाँ शांति है एवं जहाँ संतोष है-वहाँ सुख भी है। स्वयं के भीतर ईश्वरीय सत्ता के जागरण के अभाव में सर्वत्र ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति कदापि संभव नहीं। जिनका हृदय पवित्र है उन्हें ईश्वर को खोजने की भी आवश्यकता नहीं है, ईश्वर स्वयं उनको खोज लेता है।