पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष सप्तमी, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, मार्गशीर्ष |
आज सप्तमी तिथि 12:30 AM तक उपरांत अष्टमी | नक्षत्र धनिष्ठा 02:32 AM तक उपरांत शतभिषा | ध्रुव योग 12:09 PM तक, उसके बाद व्याघात योग | करण गर 12:21 PM तक, बाद वणिज 12:30 AM तक, बाद विष्टि | आज राहु काल का समय 01:34 PM – 02:55 PM है | आज 02:07 PM तक चन्द्रमा मकर उपरांत कुंभ राशि पर संचार करेगा |
आज का भगवद् चिन्तन
भूल जाना भी कला है
तीव्र स्मरण शक्ति यदि जीवन का वरदान है तो कुछ बातों को विस्मृत करना भी जीवन की एक श्रेष्ठ कला है। जीवन को सब कुछ याद रखकर ही आनंदपूर्ण नहीं बनाया जाता अपितु जीवन को आनंदमय बनाने के लिए बहुत कुछ विस्मृत भी करना पड़ता है। हम बच्चों को बहुत सारी बातें सिखाते हैं, लेकिन उनसे कुछ नहीं सीख पाते। बच्चों से भूलने की कला भी हमको सीखनी चाहिए।
हम बच्चों पर गुस्सा करते हैं, उन्हें डांटते भी है, लेकिन बच्चे थोड़ी देर बाद उस बुरे अनुभव को भूल जाते हैं। इसी तरह जो बुरा है, जो गलत है, जो कड़वा है, जो स्मृतियाँ हमारे जीवन आनंद में विघ्न उपस्थित करने वाली हैं, उसे भूल जाना भी जीवन की एक श्रेष्ठ कला है। जो जितना बुरी स्मृतियों को पकड़ा रहता है, वो उतना ही दुःखों से जकड़ा रहता है। मधुर स्मृतियाँ भी जीवन को मधुरता प्रदान करती हैं।
मानव सेवा ही सच्ची शांति देती है
स्वामी विवेकानंद से जुड़ा किस्सा है। एक दिन विवेकानंद जी के पास एक युवक पहुंचा। उसके चेहरे पर थकान, भ्रम और आंखों में बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। उसने स्वामी जी से कहा कि मैं कई-संतों से मिल चुका हूं। लेकिन जो मैं चाहता हूं, वह मुझे आज तक नहीं मिला।
स्वामी जी ने उससे पूछा कि तुम चाहते क्या हो?
युवक बोला कि मैं शांति चाहता हूं। शांति के लिए बहुत प्रयास किए, लेकिन जितना प्रयास करता हूं, उतना अधिक अशांत हो जाता हूं। क्या आप कोई समाधान बता सकते हैं?
स्वामी विवेकानंद बोले कि सबसे पहले एक काम करो। अपने उस एकांत कमरे के सारे दरवाजे खोल दो। फिर अपने घर के भी दरवाजे खोलो और बाहर निकलो। बाहर जाकर उन लोगों को देखो जो दुखी हैं, गरीब हैं, बीमार हैं और अपनी परिस्थितियों से लाचार हैं। ऐसे लोग तुम्हें मंदिरों या आश्रमों में नहीं, बल्कि बाहर ही मिलेंगे। उनकी सेवा करो। यदि धन से सेवा नहीं कर सकते तो तन से करो- किसी भूखे को भोजन दो, किसी अनपढ़ बच्चे को पढ़ाओ, किसी दुखी व्यक्ति का मन हल्का कर दो। ये एक महीना करो और फिर मेरे पास आना।
युवक स्वामी जी की बात सुनकर वहां से लौट गया और इसके बाद उसने वैसा ही किया, जैसा स्वामी जी ने कहा था। उसने पहली बार दूसरों के दुखों को नजदीक से देखा। किसी को दवा पहुंचाई, किसी को खाना खिलाया, किसी के बच्चों की पढ़ाई में मदद की। धीरे-धीरे उसके भीतर ऐसी शांति आने लगी, जो किसी ध्यान, किसी शास्त्र से नहीं मिली थी।
एक महीने बाद वह स्वामी जी के पास लौटा। उसने कहा कि सेवा ने मेरे भीतर का शून्य भर दिया। मैं अब खुद को हल्का और संतुष्ट महसूस करता हूं।
स्वामी जी बोले कि अब तुम ध्यान भी करो, शास्त्र भी पढ़ो, लेकिन सेवा को जीवन का हिस्सा बना लो। मानव सेवा ही सच्ची शांति देती है।
प्रेरक प्रसंग की सीख
समस्या से ध्यान हटाकर सेवा कार्य करो
अक्सर हम अपनी चिंताओं में इतने उलझ जाते हैं कि मन और भारी हो जाता है। जब हम दूसरों की सेवा करते हैं, हमारा ध्यान समस्याओं से हटकर समाधान पर आ जाता है। ये मानसिक संतुलन देता है।
सेवा आत्म विकास का सबसे सरल मार्ग है
सेवा करते हुए व्यक्ति के भीतर सहानुभूति, धैर्य, विनम्रता और कृतज्ञता जैसे गुण विकसित होते हैं, जो किसी भी लाइफ मैनेजमेंट सिस्टम का मजबूत आधार हैं।
ज्ञान तभी उपयोगी है जब कर्म से जुड़ा हो
केवल किताबें पढ़ना, प्रवचन सुनना या ध्यान लगाना तब तक पूर्ण नहीं होता, जब तक हम उन्हें जीवन में लागू न करें। सेवा ज्ञान को कर्म में बदलती है।
भावनाओं को संतुलित रखें
जब हम दूसरों की मदद करते हैं, हमारा मन कमी के बजाय योगदान की भावना पर ध्यान देता है। ये भावनात्मक संतुलन तनाव कम करता है और आत्मविश्वास बढ़ाता है।
छोटे काम भी बड़े परिणाम देते हैं
किसी को मुस्कान देना, किसी की बात ध्यान से सुनना, किसी असहाय को थोड़ा सा समय देना, ये छोटे-छोटे कार्य भी मन को अत्यधिक शांति और संतोष देते हैं। ऐसे छोटे-छोटे काम भी बड़े लाभ देते हैं।