पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है
पौष कृष्ण पक्ष सप्तमी, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, मार्गशीर्ष | आज है कालाष्टमी|
आज सप्तमी तिथि 01:57 PM तक उपरांत अष्टमी | नक्षत्र पूर्व फाल्गुनी 03:55 AM तक उपरांत उत्तर फाल्गुनी | विष्कुम्भ योग 11:39 AM तक, उसके बाद प्रीति योग | करण बव 01:57 PM तक, बाद बालव 02:21 AM तक, बाद कौलव | आज राहु काल का समय 01:39 PM – 02:59 PM है | आज चन्द्रमा सिंह राशि पर संचार करेगा
आज का विचार
व्यक्तित्व एक ऐसी छवि होती है, जो कलम या जीभ के इस्तेमाल के बिना भी लोगों को प्रभावित कर सकती है.!!
आज का भगवद् चिंतन
संस्कारों का सिंचन
बच्चों को आज हमारे द्वारा दिये गये श्रेष्ठ संस्कार ही भविष्य में हमारे घर-परिवार की खुशी का कारण बनने वाले हैं। हमारा पूरा जीवन संस्कारों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है। यदि जीवन में खुशियाँ हैं तो निश्चित ही हमने अच्छे संस्कारों की फसल बोयी है और यदि जीवन में कष्ट, कलह और अशांति है तो उसका सीधा सा अर्थ यह भी है कि हम कहीं न कहीं श्रेष्ठ संस्कारों की संगति से दूर रहे हैं।
महापुरुषों का कथन है, कि यदि हमारी वृद्धावस्था, वृद्धाश्रम में कट रही है तो उसका कारण केवल हमारे बच्चे नहीं अपितु उन बच्चों को हमारे द्वारा दिये गये संस्कार भी हैं। जैसे संस्कारों के बीज आज हम अपने बच्चों में डालेंगे, समय आने पर वैसा ही फल हमें प्राप्त होने वाला है। श्रेष्ठ संगति ही श्रेष्ठ संस्कारों को जन्म देती है। इसलिए स्वयं श्रेष्ठ संगति में रहें और अपने बच्चों को श्रेष्ठ संस्कार प्रदान करें, यही हमारे खुशहाल जीवन एवं सुखमय वृद्धावस्था का आधार है।
अच्छे कर्म करने के फायदे उठाइए
हम सब सफल होना चाहते हैं और सारे प्रयास उसी के लिए करते हैं। जरा-सी असफलता मिल जाए, मनुष्य निराश हो जाता है। अब इसमें एक विचार करके देखें कि सफलता की खुशी उसके प्राप्त होने में है या प्रयास करने में है? अधिकांश लोग कहते हैं कि जब सफलता प्राप्त होती है, तभी खुशी मिलती है। लेकिन असफल हुए तो? तो जब भी कोई कर्म हाथ में लें, अपने को मानसिक रूप से तैयार करें कि हमारे प्रयास में भी हम उसी खुशी को महसूस करेंगे, जो अंत में सफलता प्राप्त करने पर मिलेगी।
हमें कर्म करने का अवसर मिला, यही सबसे बड़ी सफलता है। यही जीत है। यही प्रसन्नता है। जो होगा, वो अपनी जगह होगा। लेकिन हम परिणाम के प्रति अत्यधिक आशान्वित, शंकित और भयभीत हो जाते हैं। और याद रखिए, आत्मविश्वास, दूरदर्शिता और शिक्षा-भय के कारण बंद मुट्ठी की अंगुलियों से भी रिस जाते हैं। निर्भय होकर प्रयास करें, क्योंकि परिणाम और प्रयास दोनों में आनंद उठाना हम जानते हैं- यही बात श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कही थी।