आज का पंचांग : मन के केवल दो इलाज हैं- मौन और मेडिटेशन

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।

आज आश्विन शुक्ल पक्ष त्रयोदशी, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, आश्विन |

आज त्रयोदशी तिथि 03:04 PM तक उपरांत चतुर्दशी | नक्षत्र शतभिषा 08:01 AM तक उपरांत पूर्वभाद्रपदा 06:16 AM तक उपरांत उत्तरभाद्रपदा | गण्ड योग 04:34 PM तक, उसके बाद वृद्धि योग | करण तैतिल 03:04 PM तक, बाद गर 01:48 AM तक, बाद वणिज | आज राहु काल का समय 04:38 PM – 06:06 PM है | आज 12:45 AM तक चन्द्रमा कुंभ उपरांत मीन राशि पर संचार करेगा

  1. विक्रम संवत – 2082, सिद्धार्थ
  2. शक सम्वत – 1947, विश्वावसु
  3. पूर्णिमांत – आश्विन
  4. अमांत – आश्विन

तिथि

  1. शुक्ल पक्ष त्रयोदशी   – Oct 04 05:09 PM – Oct 05 03:04 PM
  2. शुक्ल पक्ष चतुर्दशी   – Oct 05 03:04 PM – Oct 06 12:24 PM

नक्षत्र

  1. शतभिषा – Oct 04 09:09 AM – Oct 05 08:01 AM
  2. पूर्वभाद्रपदा – Oct 05 08:01 AM – Oct 06 06:16 AM
  3. उत्तरभाद्रपदा – Oct 06 06:16 AM – Oct 07 04:01 AM

नाकामी की तलवार सब पर लटकती है। और इसके वार से बचने के लिए हमारे हाथ में भी तलवार और साथ में ढाल भी होनी चाहिए। हमारे हाथ की तलवार परिश्रम की हो और ढाल ईमानदारी की रहे। ऐसा करते समय आपको, आपके ही भीतर का मन कमजोर कर देगा। क्योंकि मन लगातार नकारात्मक पैंतरे चलता है।

अगर मन सक्रिय है तो हम भय और संदेह में गिरेंगे ही। तो जब भी कोई बड़ा काम करें, ‘माइंड साउंड’ को जरूर सुनें। इसका इलाज करिए। और मन के दो ही इलाज हैं- मौन और मेडिटेशन। आज हमारे देश में 50 प्रतिशत से अधिक लोग किसी ना किसी बीमारी का इलाज ले रहे हैं।

पैरासिटामॉल नाम की दवाई तो टॉफी की तरह खाई जा रही है। ऐसे समय, आप भी एक इलाज लीजिए और वो होगा मौन और मेडिटेशन का। क्योंकि नाकामी की तलवार लटकी रहे, यही ठीक है। कहीं उसने हम पर वार किया और हमारी तैयारी नहीं हुई तो फिर उदासी, अवसाद तो आना ही है।

आज का विचार

मनुष्य के चेहरे पर जो भाव उसकी आँखों के द्वारा प्रकट होते हैं, वे उसके मन की अनुकृति होते हैं। उन्हें देवता भी नहीं छुपा सकते.

आज का भगवद् चिन्तन
मन की अपूर्णता

मन को कितना भी मिल जाए, यह बार-बार अपूर्णता का ही अनुभव कराता रहेगा। जीवन में आनन्द साधन से नहीं अपितु साधना से प्राप्त होता है। केवल मानव जन्म मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है, हमें जीवन जीने की कला सीखनी भी आवश्यक है। पशु- पक्षी तो बिल्कुल भी संग्रह नहीं करते फिर भी उन्हें इस प्रकृति द्वारा जीवनोपयोगी सब कुछ समय पर और निःशुल्क प्राप्त हो जाता है।

जो अपने भीतर तृप्त हो गया उसे बाहर के अभाव कभी परेशान नहीं करते। जीवन तो बड़ा आनंदमय है, लेकिन हम अपनी इच्छाओं के कारण, अपनी वासनाओं के कारण इसे कष्टप्रद और क्लेशप्रद बनाते हैं। केवल संग्रह के लिए जीने की प्रवृत्ति ही जीवन को कष्टपूर्ण बनाती है। जिसे इच्छाओं को छोड़कर आवश्यकताओं में जीना आ गया, समझो उसे सुखमय जीवन का सूत्र भी समझ आ गया।

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