पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।
कार्तिक कृष्ण पक्ष एकादशी, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, आश्विन |आज है गोवत्स द्वादशी, रमा एकादशी और तुला संक्रांति|
आज एकादशी तिथि 11:12 AM तक उपरांत द्वादशी | नक्षत्र मघा 01:57 PM तक उपरांत पूर्व फाल्गुनी | शुक्ल योग 01:48 AM तक, उसके बाद ब्रह्म योग | करण बालव 11:12 AM तक, बाद कौलव 11:42 PM तक, बाद तैतिल | आज राहु काल का समय 10:46 AM – 12:12 PM है | आज चन्द्रमा सिंह राशि पर संचार करेगा |
- विक्रम संवत – 2082, सिद्धार्थ
- शक सम्वत – 1947, विश्वावसु
- पूर्णिमांत – कार्तिक
- अमांत – आश्विन
तिथि
- कृष्ण पक्ष एकादशी – Oct 16 10:35 AM – Oct 17 11:12 AM
- कृष्ण पक्ष द्वादशी – Oct 17 11:12 AM – Oct 18 12:19 PM
नक्षत्र
- मघा – Oct 16 12:42 PM – Oct 17 01:57 PM
- पूर्व फाल्गुनी – Oct 17 01:57 PM – Oct 18 03:41 PM
आज का भगवद् चिन्तन
श्रेष्ठ सोचें-श्रेष्ठ पायें
छल नहीं अपितु ऊँची सोच ही व्यक्ति को महान बनाती है। विचारों की संकीर्णता जीवन की श्रेष्ठता के पथ में बाधक का कार्य करती हैं। बिना ऊँची सोच के ऊँचे लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं है क्योंकि हमारी सोच ही हमारे लक्ष्य का निर्धारण करती है। इसलिए श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विचारों की संकीर्णता का त्याग करते हुए हमारी सोच भी श्रेष्ठ होनी चाहिए।
संकीर्ण विचार गेहूँ के दानों में लगे उस घुन के समान हैं, जो बाहर से सामान्य दिखने के बावजूद भी किसी व्यक्ति को अंदर ही अंदर खोखला कर देते हैं। आकर्षक मीठे चालाकी भरे रवैये से आप लोगों की नजरों में तो आ सकते हैं पर लोगों के दिलों में नहीं। ऊँची सोच ही व्यक्ति को महान बनाती है, ऊँची सोच ही व्यक्ति को जीवन में श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति कराती है और ऊँची सोच से ही व्यक्ति किसी के दिल में जगह बना पाता है। पैर की मोच और छोटी सोच व्यक्ति को कभी भी आगे नहीं बढ़ने देती है।
रमा एकादशी व्रत कथा
एक बार महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे प्रभु, कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है? इस दिन व्रत करने से क्या फल प्राप्त होते हैं?”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे युधिष्ठिर! इस एकादशी को ‘रमा एकादशी’ कहा जाता है। इसका व्रत करने से न केवल इस जन्म के पाप मिटते हैं, बल्कि मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। इस व्रत की एक पवित्र कथा है जो बहुत प्रेरणादायक है।”
बहुत समय पहले की बात है, एक सत्यवादी और विष्णु भक्त राजा हुआ करते थे, जिनका नाम मुचुकुंद था। उनकी एक बेटी थी जिसका नाम चंद्रभागा था। चंद्रभागा का विवाह एक दूसरे राज्य के राजकुमार शोभन से हुआ था।
राजा मुचुकुंद के राज्य में एकादशी का बहुत सख्त नियम था — हर कोई इस दिन निर्जला व्रत करता था (बिना जल और अन्न के)। कोई भी भोजन नहीं करता था, न ही किसी घर में उस दिन खाना बनता था।
राजा की यह आज्ञा सभी के लिए समान थी, लेकिन चंद्रभागा के पति शोभन का शरीर बहुत कमजोर था। अगर वह भूखा-प्यासा रहा तो उसकी जान जा सकती थी। फिर भी, शोभन ने नियम और भक्ति दोनों का पालन करने का निश्चय किया और एकादशी व्रत का संकल्प ले लिया।
चंद्रभागा को चिंता थी कि उनके पति बिना कुछ खाए कैसे व्रत पूरा करेंगे, लेकिन उन्होंने भी भगवान पर भरोसा रखा। व्रत करते हुए जब द्वादशी (अगले दिन) आई, तो पारण से पहले ही भूख-प्यास से शोभन की मृत्यु हो गई। चंद्रभागा बहुत दुखी हो गई, लेकिन भगवान की लीला अलग ही थी।
चूंकि शोभन ने सच्ची श्रद्धा से रमा एकादशी का व्रत किया था, इसलिए भगवान विष्णु की कृपा से उसे अगले जन्म में मंदराचल पर्वत पर एक राज्य प्राप्त हुआ और वह वहाँ का राजा बना।
कुछ समय बाद राजा मुचुकुंद मंदराचल पर्वत पहुंचे और वहाँ उन्होंने अपने पूर्व दामाद शोभन को राजा के रूप में देखा। उन्होंने यह बात चंद्रभागा को बताई। जब चंद्रभागा को यह पता चला तो वह अत्यंत प्रसन्न हुई और उसने भी श्रद्धापूर्वक रमा एकादशी व्रत किया।
व्रत का फल उसे भी मिला और अंत में वह अपने पति शोभन के साथ रहने के लिए स्वर्ग चली गई।