डॉ. शिशिर पण्डित
वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और पर्यावरणविद्
धरती का तापमान आज काफी तीव्र गति से बढ़ रहा है और इसमें प्रतिदिन वृद्धि हो रही है तथा आशंका है कि इसमें और वृद्धि होगी, धरती के तापमान में वृद्धि को देखते हुए इसके कारणों पर गंभीरता से सोचना आज परम आवश्यक हो जाता है, यदि तापमान पर नियंत्रण नहीं हुआ तो वह दिन दूर नही कि वसुंधरा पर पूरी मानवजाति का ही अस्तित्व बचाना दूभर हो जाएगा।
बढ़ते तापमान के कारणों पर पर्यावरण विशेषयों व चिंतकों सहित मेरा मानना भी यही है कि इसका प्रमुख कारण वनों की अंधाधुंध कटाई होना है, पेड़-पोधों की संख्या में कमी के कारण ही आज धरती का तापमान बढ़ रहा है तथा प्रतिकूल परिस्थितियां निर्मित हो रही है. वनों की कटाई से धरती का तापमान बढ़ रहा हैं, क्योंकि पेड़-पौधे जो वातावरण को ऑक्सीजन प्रदान करते है, तथा वायुमंडल की कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करते है यह क्रिया प्राकृतिक रूप से स्वतः ही चलती रहती है, वातावरण में एक निश्चित अनुपात की उक्त गैसें बनी रहे इसमें पेड़ पौधे भी नियंत्रक का कार्य करते हैं पर जब वनों की कटाई अत्यधिक हो रही है तथा पेड़-पौधे नष्ट हो रहे है, ऐसे में वातावरण में मौजूद कार्बन डाय आक्साइड गैस की मात्रा बढ़ रही है, क्योंकि पेड-पौधों की कमी के कारण इनका अवशोषण नहीं हो पाता है इस कार्बन डाय आक्साइड में यह विशेषता होती है कि यह गर्मी को अपने अदर सोख लेती है, अवशोषण न होने की स्थिति में यह वातावरण में ही रहती है, जिससे धरती का तापमान बढ़ रहा है, इसी तरह पोधे हमारे वातावरण को आक्सीजन भी प्रदान करते हैं जो हमारे लिए प्राणवायु है पर पेड़-पौधों की कटाई से इसमें भी कमी आयी हैं, साथ ही यह ओजोन परत के निर्माण में भी सहायक होती हैं, क्योंकि ऑक्सीजन का ही एक रूप ओजोन हैं, यह ओजोन परत सूर्य की रोशनी जिसमें पराबैंगनी किरणें होती हैं, धरती पर आने से रोकती है तथा हम सभी की रक्षा करती हैं, हम यह कह सकते हैं कि ऑक्सीजन हमारी जीवन रेखा तथा ओजोन परत हमारा सुरक्षा कवच हैं।
धरती के तापमान में वृद्धि का एक और प्रमुख कारण है ग्रीन हाउस प्रभाव इस प्रभाव के कारण वातावरण में अचानक परिवर्तन, मौसम में बदलाव अर्थात् अत्यधिक गर्मी, सूखा, पानी की कमी तथा बर्फीली चोटियों के पिघलने से समुद्र तल का ऊंचा उठ जाना आदि कई स्थितियां निर्मित हो रही हैं, जिज्ञासा होती है कि ग्रीन हाउस प्रभाव होता क्या है? ग्रीन हाउस एक प्रकार का घर होता है जो हरे प्लास्टिक या कांच से बनाया जाता है, पारदर्शी होने के कारण सूर्य की किरणें इन घरो में प्रवेश करती हैं तथा अंदर का वातावरण गर्म हो जाता है, इस तापमान को हरा प्लास्टिक या कांच बाहर नहीं निकलने देता, साथ ही वातावरण के अत्यधिक गर्म होने पर इसके अंदर के तापमान को नियंत्रित भी किया जा सकता हैं, जो कार्य कांच या प्लास्टिक का ग्रीन हाउस करता है वही कार्य हमारी पृथ्वी के लिए वायुमंडल में एक परत के रूप में करती है, इस परत में विभिन्न तरह की गैसे विद्यमान रहती हैं ये परतें धरती से 16 से 50 कि.मी. की ऊँचाई पर स्थित है।
पृथ्वी के चारों ओर फैले वायुमंडल में मुख्यतः 78 प्रतिशत नाइट्रोजन, 21 प्रतिशत ऑक्सीजन, अल्प मात्रा में कार्बन डाइ आक्साइड व अन्य गैंसे रहती हैं. यह आवरण सूर्य तथा आंतरिक पिण्डों में आने वाली किरणों पर नियंत्रण रखता है वहीं फैली ओजोन परत जीवित जगत को नुकसान पहुँचाने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर उपस्थित कार्बन डाय आक्साइड प्रकाश को छोड़कर उष्मीण अवरक्ता को अवशोषित कर गर्म हो जाती है तथा हमें ऊष्मा का उत्सर्जन भी होता रहता हैं, वायुनंडल में जो कार्बन डाय आक्साइड होती है वह कुछ ऊष्मा तोपृथ्वी को वापस दे देती है तथा कुछ अंतरिक्ष में छोड़ देती है इस तरह दिन व रात्रि के समय जब तापमान कम या ज्यादा हो जाता है तब उक्त परतें संतुलन बनाए रखती है। हमारे वायुमंडल में कार्बन की जितनी मात्रा उपलब्ध है उससे कहीं अधिक तीन गुना पृथ्वी पर पेड़-पौधे व जमीन में संग्रहित है अनुमान है कि लगभग दो लाख टन कार्बन डाय आक्साइड पेड़-पौधों में संग्रहित है, इस कार्बन तथा अन्य गैसों की मात्रा में थोडा सा भी परिवर्तन वायुमंडल की परतों को प्रभावित करता है तथा कार्बन डाय आक्साइड की मात्रा को भी बढ़ाता है यहां से समस्या उत्पन्न होती हैं, कार्बन डाय आक्साइड की अधिक मात्रा लौटने वाली सूर्य की अवरक किरणों को रोककर अवशोषित कर पृथ्वी पर ही रोक लेती है, जिसका परिणाम होता है धरती के तापमान में वृद्धि इसी क्रिया को ग्रीन हाउस प्रभाव कहा जाता है।जहां वृक्षों की कटाई व वन विनाश की बात है, सामान्य जनों को यही लगता है कि नए वन वृक्ष लगाने के लिए वृक्षारोपण भी तो किया जा रहा है तब भी यह स्थिति क्यों बन रही हैं, जहां तक पेड़-पौधे कट रहे हैं वहाँ वृक्षारोपण उस अनुापात में नही हो रहा है अर्थात् कटते वनों व वृक्षों की तुलना में लगने वाले वृक्षों की संख्या बिल्कुल नगण्य हैं, इसी कारण हमें यह परेशानी हो रही हैं।धरती का तापमान बढ़ने से कई तरह की समस्याएं निर्मित हो रही हैं तथा यदि इसी तरह बढ़ता रहा तो हमारा अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है, अभी तक हम सभी यही कहते रहे हैं कि हमारे यहां का मौसम तो अच्छा है हम क्यों चिंता करें पर ऐसा नहीं हर एक का कार्य पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है और यही स्थिति इसके प्रभावों की भी हैं, तापमान वृद्धि का प्रभाव किसी क्षेत्र विशेष की नहीं अपितु समस्त विश्व को प्रभावित कर रहा है, इसके बढ़ने के कारण हमारे ध्रुवीय क्षेत्रों में वर्फ पिघलने लगी है तथा यह इसी तरह तापमान बढ़ने के साथ पिघलती रही तो भविष्य में हमारा समुद्र तल ऊपर उठ जाएगा तथा हमारा भूभाग पानी में डूब जाएगा, जिससे हमारा देश भी प्रभावित होगा अत्यधिक गर्मी के कारण समुद्रीय सतह का भी तापमान बढ़ेगा, जिससे उष्णकटीय बंधीय चकवातों की आवृति व विकरालता में भी असामान्य वृद्धि होगी तापमान का असर हमारे स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा तथा विभिन्न प्रकार के त्वचा रोगों में वृद्धि होगी, साथ ही सूर्य की पराबैंगनी किरणें भी मानव शरीर व पेड़-पौधों को पीड़ित करेंगी, बढ़ते तापमान के कारण आज हमारा देश भी अत्यधिक वर्षा से बाढ़, अवर्षा से सूखे की भयानकता को स्वयं देख रहा हैं, इससे खाद्य पदार्थो व पानी की उपलब्धता में कमी आएगी, जनसख्या वृद्धि से नई बीमारियां पराबेगनी, तापमान में जो वृद्धि हो रही है उसको पुनः सामान्य स्थिति में लाना बड़ा मुश्किल कार्य हो जाएगा साथ ही हमारे वातावरण में कार्बन डाय आक्साइड व आक्सीजन को संतुलित करना भी कठिन हो जाएगा जो करना बहुत आवश्यक हैं।धरती के तापमान को नियंत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण तो यह होगा कि हम वनों का विनाश रोककरण पेड़-पौधों को कटने से रोकें, ज्यादा से ज्यादा वृक्षारोपण किया जाए दोहन व पोषण के सिद्धांत का पालन करते हुए प्राकृतिक सम्पदा के अनियंत्रित दोहन को नियंत्रित कर पोषण के कार्यों को भी प्राथमिकता देना होगा, जैव विविधता को भी बनाए रखने की व्यवस्था करनी होगीआधुनिकरण के नाम पर मशीनीकरण के परिणामस्वरूप वाहनों व कल कारखानों से निकलने वाले कार्बन तत्व मोनो आक्साइड, कार्बन डाय ऑक्साइड, नाइट्रोजन के आक्साइड, सल्फर, लैड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन आदि के उत्सर्जन को रोकें तथा नियंत्रित करने का उपाय करें, हम यह जाने कि धरती का बढ़ता तापमान हमारे लिए ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के अस्तित्व के लिए खतरा ऐसी स्थिति में इसके नियंत्रण के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक है अतः हम सब सामूहिक व व्यक्तिगत स्तर पर इसके लिए कार्य करें।