चुनें अपना प्रतिनिधि

चुनें अपना प्रतिनिधि
‘ देश में अरबों खर्च होंगे और लोग अपने लिए, सबसे कम हानिकारक सरकार व प्रतिनिधि चुनेंगे। अंधों में कानों की खोज होगी क्योंकि दोनों आंखों वाली प्रजाति को पहचानने- समझने की दृष्टि, देश का आम नागरिक, खो चुका है।
सत्ता किस प्रकार हासिल करें और फिर उस पर किस प्रकार, ज्यादा से ज्यादा समय, काबिज रहें, यह वे दो प्रश्न हैं जिनके इर्द-गिर्द, सभी राजनैतिक दलों का चिंतन-मनन बना रहता है। राजनीतिक दल के नेताओं और उन पर पलने वाले, छोटे- बड़े कार्यकर्ताओं को दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि वे यही प्राप्त करने तो घर से निकले थे। लेकिन आम नागरिक, जब अपना हित भूल कर, किसी राजनीतिक दल के हितों को ही अपना हित मान बैठता है और उन्हीं को केंद्र में रख कर सोच-विचार करने लगता है, पार्टियों की हार को अपनी हार और पार्टियों की जीत को अपनी जीत मानने लगता है तो उन पर, हँसी भी आती है और दुःख भी होता है। आजादी के बाद से ही हम लगभग सभी पार्टीयों का राज, देख चुके हैं, कभी किसी राजनीतिक दल ने अपने हित से ऊपर, नागरिकों का हित नहीं रखा, अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए, तरह-तरह की समाज विरोधी नीतियों को देश पर लागू किया, फिर भी जब चुनावी ढोल बजते हैं, तो आम लोग, नाचने के लिए दौड़ पड़ते हैं। सभी को तो दिहाड़ी भी नहीं मिलती फिर भी, दिल लगा कर, दौड़ते- भागते- नाचते हैं। या तो ये हमारी उत्सवप्रियता है या फिर ये भी हो सकता है कि राजनीतिक दलों द्वारा निर्मित, अव्यवस्था और शोषण के माहौल में, आज का मानव, इतना विकसित ही नहीं हो पाया कि अपने हितार्थ, गम्भीर चिंतन कर सके। ‘ अतः अब समय ऐसा है कि हमें अपना स्वार्थ नहीं देश या क्षेत्र का हित चिंतन करना होगा, मानव जीवन क्षणभंगुर है जो आया है अवश्य जाएगा आज नहीं तो कल, फिर छल, कपट से क्या लाभ? यदि हम किसी का हक मार कर कुछ अर्जित कर भी लेते हैं तो क्या वह नश्वर है? नहीं न! चुनाव जीतने के अनेक ढंग हो सकते हैं पर अच्छा ईमानदार कर्मठ व ऐसा व्यक्तित्व हो जो अपने लिए कम व समाज के लिए अधिक सोचे। इसी पर मन्थन कर चुनाव करना होगा।’

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