सेवा और समर्पण की मिसाल हैं मनमोहन सिंह बिष्ट, रिटायर होने पर भी जारी है प्रकृति की सेवा

नई टिहरी : कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता है। एक पत्थर तो तबियत… इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है कि सेवानिवृत्त वन अधिकारी मनमोहन सिंह बिष्ट ने। बिष्ट उन चुनिंदा अधिकारियों में रहे, जिन्होंने अपनी ड्यूटी को केवल नौकरी नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम समझकर निभाया। उन्होंने वह कर दिखाया जो अक्सर केवल आदेशों के दायरे में सीमित रहने वाला अधिकारी नहीं कर पाता। बिना किसी सरकारी या बाहरी वित्तीय सहायकता के क्षेत्र के लोगों को साथ लेकर उन्होने जंगल और जल संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए।

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मनमोहन सिंह बिष्ट विगत 21 वर्षों से अपने राजकीय कार्य ड्यूटी के निर्वहन के बाद जब भी समय मिलता पर्यावरण संरक्षण के लिए क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर पर्यावरण संरक्षण, संवर्धन व सुरक्षा के लिए शासकीय एवं अर्द्धशासकीय शिक्षण संस्थाओं के छात्र-छात्राओं, सरकारी कर्मचारी, ग्रामवासियों एवं गैर सरकारी संस्थाओं के सहयोग, जन जागरूकता कार्यक्रम चलाकर स्थानीय समुदाय को पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी की भावना बढ़ सके। बिना किसी संस्था के वित्तीय सहयोग से विभिन्न जल स्त्रोतों का उपचार, वनों का संरक्षण एवं संवर्धन कार्य सर्व सम्मति से बनाकर विभिन्न क्षेत्रों में कई रचनात्मक एवं अभिनव कार्य से आदर्श कार्य माडल के रूप मे विकसित किया।

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मनमोहन सिंह बिष्ट ने बताया कि उन्होंने टिहरी जनपद के ग्राम अलमस टिहरी जनपद के ग्राम अलमस के समीप लगभग 365 हैक्टेयर व सुवाखोली-साटागाड 17 कि०मी० पथ वृक्षारोपण, भजनगढ़ 2 हैक्टेयर, आराखाल 5 है०, ढाणा 2 है० आदि क्षेत्रों में प्रकृति संरक्षण व संवर्धन कार्य समाज के विभिन्न वर्गों, संस्थाओं एवं छात्र-छात्राओं के सहयोग से कार्य किया। उनका मानना है कि हमारा राजकीय दायित्वों के अलावा सामाजिक के अलावा सामाजिक दायित्व भी है, जिसे हमें ईमानदारी से करना चाहिए।

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बुरांश पौध का किया रोपण

बुरांश वृक्ष उत्तराखण्ड राज्य का वृक्ष व संकटग्रस्त एक प्रजाति है। मनमोहन सिंह बिष्ट ने बताया की उन्होंने बुरांश वृक्ष प्रजाति संरक्षण संवर्धन के लिए अभिनव प्रयास के रूप में धनोल्टी, मगरा, अलमस, ढाणा आदि पौधशालाओं में बुरांश के दस हजार से अधिक पौध तैयार कर बुरांसखण्डा नामक स्थान पर 5000 बुरांश पौध का रोपण व आस पास के क्षेत्रों में 1000 से अधिक बुरांश का पौध का रोपण व विकसित किया।

मुनिकीरेती से चम्बा तक लगभग 65 कि०मी० राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों ओर राजमार्ग निर्माण के मलबे से दब जाने के कारण बहुमूल्य प्राकृतिक वृक्ष पौध की प्रजातियाँ नष्ट हो रही थी। इन बहुमुल्य औषधीय वृक्ष झाड़ी प्रजातियों के संरक्षण के लिए रचनात्मक कार्य प्रयास के रूप में विभिन्न संस्थाओं व स्थानीय ग्रामवासियों विभागीय कर्मचारियों व स्कूल-कालेज के छात्र/छात्राओं के सहयोग से कई चरणों में 45 दिनों तक निरन्तर सामूहिक प्रयास से गेठी, केसिया, सामिया, बकैन, सादण, केसिया गलूका, जामून आदि की 45000 हजार से अधिक बहुमुल्य प्रजातियों के सरंक्षण का कार्य सामूहिक सहभागिता से मिलजुल कर सफलता पूर्वक किया गया। इन क्षेत्र में विभिन्न सरंक्षण कर गतिविधियों को अपनाने से स्थानीय वृक्ष, झाड़ी के संरक्षण, सुरक्षा में सहायता मिली है। क्षेत्र में परिस्थिति की सुरक्षा एवं पुर्नजनन में सहायता मिली है। इस प्रकार यह क्षेत्र आज भी सभी के लिए एक आर्दश एवं उदाहरण बना हुआ है।

उत्तराखण्ड राज्य के चीड़ बाहुल्य क्षेत्रों में चीड़, पिरूल वनाग्नि का मुख्य स्त्रोत है। जिसके कारण पिछले कई दशकों में बहुमुल्य जीव-जन्तु औषधीय वृक्ष पौधों को काफी क्षति पहुंची है। इसे देखते हुए बिष्ट ने पर्यावरणीय क्षति के निराकरण के लिए चीड़ पिरूल से जैविक चैकडाम, जैविक खाद, पाईन पिट एवं मशरूम के उत्पादन साधन के रूप में चीड़ पिरूल को स्थानीय ग्रामवासियों के लिए रोजगार एवं आय अर्जन का साधन बनाने का अभिनव प्रयास किया। पर्यावरण संरक्षण एवं पारीस्थितिकी संरक्षण व रोजगारपरक कार्य टिहरी गढ़वाल क्षेत्र के फेकवापानी (रानीचौरी) में 65 वृक्षों का उच्चगुणवत्ता अखरोट मदर ब्लॉक व प्रेमनगर देहरादून में सेन्टर ऑफ एक्सलेस की स्थापना कर प्रदेश में, अखरोट ग्राम तैयार करने के उदेश्य से तकनीकी जानकारी, प्रचार-प्रसार एवं उन्नत किस्म की पौध उपलब्ध कराने के साथ-साथ कई स्थानों पर अखरोट ग्राफिटिंग प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाकर स्थानीय ग्रामवासियों को उनकी आय वृद्धि एवं आय का अतिरिक्त साधन उपलब्ध कराने के सफल प्रयास किए गए है। वर्ष 2024-2025 में इसी प्रयास में ग्राम पापड़ा में 30 वृक्ष, ग्राम कटर खेत में 100 वृक्ष (टिहरी जनपद) धौनिक, क्कील मदोली, कोटी, ग्राम क्लसर व चकराता (देहरादून) में 200 वृक्षों का ग्राम पाली, टिहरी गढ़वाल में 500 अखरोट वृक्ष का अखरोट ग्राम तैयार कराने में तकनीकी जानकारी सलाहकार सेवा प्रदान कर तैयार किए गए है।

पर्यावरण संरक्षण एवं पर्यायवरण शिक्षा के लिए स्थानीय संस्थाओं / संस्थानों के छात्र-छात्राओं, गैरसरकारी संस्थाओं एवं विभागीय कर्मचारियों के सहयोग से वनों की सुरक्षा पर्यावरण शिक्षा / पर्यावरण संरक्षण के प्रति जारूकता उत्पन्न करने के लिए विभिन्न स्थानों पर 28 संख्या सीडबॉल कार्यक्रम 7 सं० बर्डवाचिंग कार्यक्रम 21 सं० नुक्कड़ नाटक, 111 सं० अपनी प्रकृति को जाने (KNOW YOUR NATURE) कार्यक्रम एवं 167 सं० पर्यावरण शिक्षा / पर्यावरण सरंक्षण कार्यक्रम अलमस, थत्यूड़, थान, भवान, बुरांशखण्डा, रोतू की वेली, धनोल्टी, मुनिकीरेती ऋषिकेश (टि०ग०), राजकीय महिला बी.एड. कालेज, सब्बावाला, जूनियर हाई स्कूल देहरादून आदि क्षेत्रों में जागरूकता उत्पन्न करने व प्रकृति को समीप से जानने व इसकी उपयोगिता को समझाने के लिए प्रयास किए गए।

पर्यावरण संरक्षण गतिविधियों का प्रभाव है कि अब स्थानीय ग्रामवासी अवैध लौपिंग व पातन नहीं करते हैं तथा वनाग्नि की घटना पर तत्काल वनाग्नि पर नियंत्रण करने व रोकथाम करने का प्रयास करते हैं।पर्यावरण / प्रकृति संरक्षण सम्बन्धी प्रेरक कार्यक्रम व प्रयासों का सामूहिक प्रभाव व केवल पर्यावरण को सुधारने में सहायक रहा बल्कि संरक्षण प्रथाओं के प्रति जागरूकता और भागीदारी की भावना विकसित हुई है।

ग्रामवासियों का कहना है कि क्षेत्र के प्राकृतिक जल स्रोत्र उपचार गतिविधियों से ढाणा, मगरा, रोतू-की-वेली, अलमस, ज्वारना, लब्बाखाला, गंजरवाला, स्यूड गाड आदि जल सोत्रों में पानी की मात्रा में वृद्धि एवं पानी का प्रवाह अधिक समय तक बना रहता है. जिससे ग्रामवासियों व उनके पालतू पशुओं, वन्यजीवों व पक्षियों को आसानी से पीने का पानी उपलब्ध हुआ है। पर्यावरणीय गतिविधियों जन जागरूकता कार्यक्रमों का क्षेत्र के ग्रामवासियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। अब वे पर्यावरण के महत्व व आवश्यकता को समझने लगे हैं, तथा उन में सहयोग एकता सहभागिता की भावना जागृत हुई है। अब सभी लोग सामाजिक कार्यों को सहभागिता से मिल-जुलकर करने लगे है।

क्षेत्र में विगत कई वर्षों से किए गए संरक्षणकार्यों के परिणाम स्वरूप अब आप-पास के वन क्षेत्र अपने पुराने स्वरूप में आ गए है। क्षेत्र एक संघन आर्दशवन क्षेत्र का रूप ले चुका है, जो आस पास के सभी लोगों को आकृषित एवं प्रेरित स्वरूप करता है।गाँव के आस पास कई सघन चारागाह विकास क्षेत्र विकसित हुए है। जिसके कारण अब ग्रामवासियों को अपने पालतू पशुओं के लिए प्रर्याप्त मात्रा में चारा घास व ईंधन उपलब्ध हो रहा है। ग्रामवासियों द्वारा सामूहिक सहभागिता से क्षेत्र में किये गये संरक्षण कार्यों का व्यापक व सकारात्त्मक प्रभाव हुआ है। जिसको देखने के लिए प्रदेश एवं दूसरे प्रदेशों केविभिन्न वानिकी, कृषि प्रशिक्षण संस्थान, उच्च शिक्षण संस्थाओं के छात्र-छात्राएँ, शोधकर्ताओं द्वारा समय समय पर अध्ययन भ्रमण के लिए क्षेत्र में आते रहते है, व ग्रामवासियों से व्यक्तिगत संवाद बनाते हैं। कार्य एवं तकनीक प्रयासों को जानने का प्रयास करते है।

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