हिमशिखर धर्म डेस्क
डॉ. किशोर दास स्वामी ‘विद्यावारिधिः’
श्रीमद्भागवत् महापुराण में कई स्तुतियां हैं. सबकी अपनी विशेषता है. यह स्तुति आर्त भक्त की है. श्रीकृष्ण ने गीता में जब चार प्रकार के भक्तों का जिक्र किया तो आर्त को सर्वप्रथम रखा-‘आर्तो जिज्ञासु अर्थार्थी ज्ञानी.’ इस श्रेणी के भक्तों की संख्या ज्यादा है. ‘दुःख में सुमिरन सब करें.’

…तो गजराज जब फंस गया, लगा कि अब प्राण गए, तो याद किया श्री नारायण को, जो पालक हैं प्राणिमात्र के. ध्यान रहे, परमात्मा का स्मरण भी जीव को तभी आता है, जब उसमें प्रभु स्मरण का संस्कार हो. नहीं तो वह संसार में ही आश्रय ढूंढता है. वह नहीं मिलता तो स्वयं आत्मघात कर लेता है. गजराज को विपत्ति में अपना पूर्वजन्म स्मरण हो आया. उसे वह स्तुति याद आयी, जिसे वह गाया करता था. सरोवर से कमल का पुष्प तोड़ा और डूब गया स्तुति के शब्दों में से होते हुए परमभाव में.
यहां गज शब्द को समझना भी जरूरी है. दो अक्षर हैं इसमें. ‘ग’ का अर्थ है जो चल रहा है. और ‘ज’ का संकेत है, जो जन्म लेता है. गज शब्द को यदि उलट दें तो संकेत और भी स्पष्ट हो जाता हैै. तब अक्षर निकलकर आता है जग अर्थात् जगत्. जीव भी इसका संकेतार्थ है. इस तरह हम सभी गज की श्रेणी में आते हैं.
इस स्तुति की विशेषता है श्री नारायण के सगुण-निर्गुण का वर्णन. इस तरह यह नारायण के रूप और स्वरूप दोनों का बखान करती है. ब्रह्म और ईश्वर दोनों का प्रतिपादन है इसमें. इसमें कारण और कार्य ब्रह्म दोनों ही समाहित हैं. इसीलिए इसमें संसार के समस्त ऐश्वर्य को प्रदान करने का जहां सामर्थ्य है, वहीं परम सम्पत्ति रूप मुक्ति की परम अवस्था में स्थित करने की भी क्षमता है.
यह स्तुति इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि इसकी शुरुआत उस पीड़ा से होती है, जो प्रत्यक्ष है. ग्राह ने गज के पैर में अपने नुकीले दांत गडाए हुए हैं. अत्यन्त पीडा है. मौत सामने खड़ी है. उससे मुक्त होना चाहता है. लेकिन फिर इस चिंतन की दिशा में बदलाव आया. गजेंद्र ने सोचा, यदि अभी बच भी गया, तो समस्या का समाधान कहां हुआ. जन्म-मरण का चक्र तो कटा नहीं. इसलिए स्तुति ने मोड़ लिया. अब गजेंन्द्र हमेशा के लिए इस चक्र से मुक्त होना चाहता है.
यह स्तुति समस्त बंधनों को काट फेंकती है. जो श्रद्घापूर्वक इसका नित्यपाठ करता है वह अंत समय में सहज रूप से श्रीनारायण का स्मरण करता है, जिससे उसे सद्गति प्राप्त होती है. विष्णु भक्त वैष्णव को चाहिए कि वह नित्य इस पावन स्तुति का गान करे, इस पर चिंतन करे. भुक्ति और मुक्ति का परम साधनरूप है यह गजेन्द्रमोक्ष नामक स्तवन. श्रीमद्भागवत नामक महापुराण के अष्टम स्कंध के दूसरे अध्याय में है यह दिव्य कथा.
गजेन्द्रमोक्ष स्तवन पढ़ें-
श्रीशुक उवाच
” एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो ह्रदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राक्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥ ” १ ॥
गजेन्द्र उवाच
” ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभीधीमहि ॥ ” २ ॥
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्दे स्वयंभुवम् ॥ ३ ॥
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितम् ।
क्वचिद्विभांतं क्व च तत्तिरोहितम् ।।
अविद्धदृक् साक्ष्युभयम तदीक्षते ।।।
सआत्ममूलोऽवतु मां परात्पतरः ।। ४ ।।
कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो ।
लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।।
तमस्तदा ऽ ऽ सीद् गहनं गभीरम् ।।।
यस्तस्य पारे ऽ भिविराजते विभुः ॥ ५ ॥
न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुः ।
जन्तुः पुनः कोऽर्हति गंतुमीरितुम् ।।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो ।।।
दुरत्ययानुक्रमणः स माऽवतु ॥ ६ ॥
दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम् ।
विमुक्तसंगा मुनयः सुसाधवः ।।
चरंत्यलोकव्रतमव्रणं वने ।।
भूतात्मभूतः सुह्रदः स मे गतिः ॥ ७ ॥
न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा ।
न नामरुपे गुणदोष एव वा ।।
तथापि लोकाप्ययसंभवाय यः ।।।
स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥ ८ ॥
तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
अरुपायोरुरुपाय नम आश्र्चर्य कर्मणे ॥ ९ ॥
नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥ १० ॥
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्र्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ ११ ॥
नमः शांताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥