धराली में तबाही कैसे आई, बादल फटना नहीं… यह था कारण!, जानिए साइंटिस्ट ने क्या बताया

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विनोद चमोली

उत्तरकाशी के धराली गांव में आई विनाशकारी बाढ का कारण खीर नदी के ऊपरी कैचमेंट क्षेत्र में स्थित ग्लेशियर का टूटना या ग्लेशियर झील का फटना हो सकता है। ये संभावना जताई है स्वामी रामतीर्थ परिसर के भूगर्भ वैज्ञानिक प्रोफेसर डीएस बागड़ी ने। उन्होंने कहा कि ग्लेशियर के टूटने से भारी मात्रा में पानी, मलबे ने तेज गति से निचले इलाकों में मकान, होटल, दुकानों समेत गांव को तबाह कर दिया है।

उत्तरकाशी के धराली गांव में आई विनाशकारी बाढ़ के कारणों में वैज्ञानिकों में अलग-अलग मत हैं। खीर गंगा का उद्गम हैंगिग ग्लेशियरों से होता है, और ये ग्लेशियर 2013 की आपदा के दौरान भी संवेदनशील थे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बाढ़ खीर नदी के कैचमेंट पर किसी ग्लेशियर के टूटने या ग्लेशियर झील के फटने से आई होगी। जिससे मलबे के साथ भारी मात्रा में पानी तेजी से बह निकला, जिसके बहाव ने बोल्डर सहित भारी मात्रा में मलबा भी बहाकर नीचे के गांव धराली में तबाही मचा दी।

एचएनबी केंद्रीय विवि के स्वामी रामतीर्थ परिसर के भूगर्भ वैज्ञानिक प्रो डीएस बागड़ी के अनुसार हर्षिल में मंगलवार को 9 मिमी तथा भटवाड़ी मे 11मिमी वर्षा हुई, जो कि मौसम विज्ञान विभाग का डेटा है, इतनी बर्षा होन पर बादल फटने की संभावना बहुत कम है। उन्होंने कहा कि खीर गाड़ धारा के ठीक ऊपर ग्लेशियर झील के फटने या ग्लेशियर के टूटने से अचानक पानी निकलने से तेज बाढ़ आई है। प्रोफेसर बागड़ी के अनुसार अभी यह बताना मुश्किल है कि यह बाढ हिमानी जनित झील के टूटने से आई या हिमानी के टूटने से।लेकिन बादल फटने वाली संभावना बहुत कम है। जबकि कुछ लोग यह भी आशंका जता रहे हैं कि लैंडस्लाइड लेक आउटबर्स्ट फल्ड जैसी कोई बड़ी घटना हुई होगी। ऐसी ही घटना 1978 में कनौलडिया गाड में भी हुई थी जो कि हर्षिल से कुछ किमी पहले है।

प्रो डीएस बागड़ी


प्रो डीएस बागड़ी ने 2013 की केदारनाथ त्रासदी को याद करते हुए कहा कि हमने उससे कोई सबक नहीं लिया। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पहाड़ी इलाकों को सुरक्षित रखने के लिए नदियों और नालों के किनारे फ्लड प्लेन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अतिक्रमण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना चाहिए। भू आकृति विज्ञान की दृष्टि से क्षेत्र अत्यंत असुरक्षित होते हैं। क्योंकि यहां मलबा, धंसाव, भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा हमेशा रहता है।

प्रो डीएस बागड़ी ने कहा कि यह एक सामान्य नियम हैं कि हिमालयी गाढ गदेरे 20-25 साल के अंतराल में अपनी पूर्व अवस्था में आते हैं तो ऐसे हालात में इनके किनारों पर इतने बड़े बड़े निर्माण की स्वीकृति कैसे दी गई, समझ से परे है। धराली में लोकल लोगों को भी कहते सुना गया कि उन्होने अपने बुजुर्गो से सुना कि 70-80 साल पहले भी ऐसी घटना घटी थी।उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पहाड़ी इलाकों को सुरक्षित रखने के लिए नदियों और नालों के किनारे फ्लड प्लेन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अतिक्रमण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना चाहिए। भू आकृति विज्ञान की दृष्टि से क्षेत्र अत्यंत असुरक्षित होते हैं। क्योंकि यहां मलबा, धंसाव, भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। नदी के ऊपरी हिस्से का निर्माण हिमानी जनित मिट्टी से हुआ है जो कि अपेक्षाकृत कम ठोस होता है और पानी के साथ बह जाता है।

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