इस साल जन्माष्टमी की तारीख को लेकर मतभेद है, कुछ लोग इसे 15 अगस्त तो कुछ 16 अगस्त को बता रहे हैं. आइए जानते हैं इस बार जन्माष्टमी किस दिन मनाई जाएगी……
जन्म जन्मान्तरों के पुण्य संचय से जुड़ा है श्री कृष्ण जन्माष्टमी का सुयोग
15/16 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत
कलियुग की आयु का प्रमाण इस समय 5126 वर्ष पूर्ण कर 5127 वां प्रवेश हो रखा है। श्रीकृष्ण भगवान ने इस धरा धाम पर 125 वर्ष व्यतीत किए और उनके गोलोक गमन के समय ही द्वापर का समापन होकर कलियुग का प्रारम्भ हुआ। भगवान के प्रादुर्भाव भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र रात्रि ठीक बारह बजे अर्थात् अर्ध रात्रि को हुआ। इससे स्वाभाविक है कि चन्द्रमा वृष राशि का और सूर्य सिंह राशि का होगा। इन छः योगों के समय भगवान का प्रकट होना अनुपम था, अद्भुत था। तब से या कलियुग के प्रारम्भ से भारतीय जनमानस प्रति वर्ष जन्माष्टमी मनाता आ रहा है।
यह आवश्यक नहीं है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन छः योग होंगे ही होंगे। पर अधिकांशतः ये योग मिलते हैं। संयोग से इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 15 अगस्त को रात्रि ग्यारह बजकर 50 मिनट से है जो दूसरे दिन 16 अगस्त रात्रि नौ बजकर 35 मिनट तक रहेगी, ऐसा संयोग प्राय: कम ही होता है कि अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र न हो पर इस बार रोहिणी नक्षत्र नहीं है, तो कभी बुधवार या सोमवार नहीं होता है, कभी सौर भाद्रपद नहीं होता है तो कभी अर्ध रात्रि व्यापिनी तिथि नहीं होती है।
प्राय: दो दिन अष्टमी तिथि होने से ऊहापोह रहता है। इससे पहले यदि सम्यक् विचार किया जाय तो गत वर्ष 2024 को 26 अगस्त को, व 2013 को 28 अगस्त को प्रायः सभी योग थे, बुधवार के दिन एक ही दिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी थी। इससे पहले भी वर्ष 2001 को 12 अगस्त को एक ही दिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी थी पर सौर श्रावणमास, रविवार व कृतिका नक्षत्र था। ग्यारह सितम्बर 2010 को दो दिन अष्टमी तिथि थी पर पहले दिन रोहिणी नक्षत्र, बुधवार व अर्द्ध रात्रि व्यापिनी अष्टमी तिथि थी।
ऐसा योग मिलना बहुत शुभ है, इस बार छः तत्वों में से एक तत्व केवल अष्टमी तिथि 15 अगस्त रात्रि को है। इन योगों का नामकरण भी किया गया है अर्थात् जब रोहिणी नक्षत्र से युक्त अष्टमी तिथि होती है तो वह “जयन्ती” कहलाती है, और जब रोहिणी नक्षत्र के बिना अष्टमी तिथि होती है तो उसे “केवला” कहा जाता है। “रोहिणी गुण विशिष्टा जयन्ती” अनेक फल देने वाली जन्माष्टमी मनुष्यों को अभीष्ट सन्तान देने वाली भी है अतः सन्तति के इच्छुक व्यक्तियों को सन्तान गोपाल मंत्र या हरिवंश पुराण का पाठ करना चाहिए।
भले ही इस बार अधिक सुयोग नहीं मिल पा रहे हैं पर स्मार्तों को 15 अगस्त रात्रि को व्रत उपवास रख कर जन्म के बाद व्रत पारणा करना श्रेयस्कर होगा, यदि रात के बारह बजे तक 15 अगस्त को न रह सकें तो 16 अगस्त को व्रत उपवास किया जा सकता है।
यह व्रत कब करना चाहिए —
यदि दो दिन अष्टमी तिथि है और दोनों दिन अर्द्ध रात्रि व्यापिनी नहीं है तो इस पर व्रत निर्णायक धर्म ग्रन्थों, पुराणों में यह व्यवस्था की गई है कि स्मार्तों का व्रत सप्तमी विद्धा होगा व वैष्णवों का व्रत नवमी विद्धा होगा, इसकी पूर्ण जानकारी न होने के कारण हम संशय में रहते हैं। निश्चित तो यह है कि अष्टमी अर्द्ध रात्रि व्यापिनी जब हो उसी दिन यह व्रत करना चाहिए, चाहे योग हों या न हों। विशेष रोहिणी नक्षत्र को देखा जाता है, इस बार ऐसा नहीं है।
जन्माष्टमी व्रत का कर्म काल अर्द्ध रात्रि ही है अतः जन्माष्टमी व्रत के लिए अर्द्ध रात्रि में अष्टमी तिथि का होना अनिवार्य है, इस बार यह संशय नहीं है। शायद इस पर अधिकांश विद्वत समुदाय ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचार व्यक्त किए हों। अतः अधिक कहना पिष्ट पेषण होगा जो लाभकार नहीं है। इतना अवश्य है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी विद्वत्ता से यह सब कुछ खोजा है, जो हमारा मार्गदर्शन कर रहा है। ऐसे मनीषियों को एक बार नमन करते हुए आप सब को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित कर रहा हूं व भगवान श्री कृष्ण से विश्व कल्याण की प्रार्थना भी करता हूं। “
