पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।
महाभारत का युद्ध खत्म हो चुका था। पांडवों ने कोरवों को पराजित कर दिया था। जब पांडवों के परिवार में सबकुछ ठीक हो गया तो, श्रीकृष्ण ने सोचा कि अब मुझे द्वारका लौट जाना चाहिए। श्रीकृष्ण ने पांडवों को बताया तो सभी दुखी हो गए, लेकिन श्रीकृष्ण ने तय कर लिया था और वे अपनी नगरी द्वारका लौट रहे थे।
भगवान का रथ आगे थोड़ा बढ़ा तो रथ के सामने कुंती खड़ी हो गईं। अपनी बुआ को देखकर श्रीकृष्ण रथ से नीचे उतरे और आदरपूर्वक प्रणाम करने लगे, लेकिन कुंती ने उन्हें रोक दिया और स्वयं उन्हें प्रणाम करने लगीं।
श्रीकृष्ण ने मुस्कराकर पूछा, “बुआ, आप ये क्या कर रही हैं? आप तो मेरी माता तुल्य हैं। जब तक मैं यहां रहा, रोज आपको प्रणाम करता रहा। आज आप ये उल्टा क्यों कर रही हैं?”
कुंती गंभीर हो गईं और बोलीं,
“कृष्ण, अब ये बुआ-भतीजे का रिश्ता बहुत हुआ। मैं जानती हूं कि तुम भगवान हो। मेरे बच्चों ने बचपन से तुम्हारी कहानियां भगवान के रूप में सुनी हैं। अब जीवन के अंतिम पड़ाव पर हूं।
तुम भगवान हो, इसलिए मैं कुछ मांग सकती हूं?”
श्रीकृष्ण बोले,
“आप मांगीजिए बुआ। आज मैं भगवान, आप भक्त। जो भी चाहें, मांग लीजिए।”
कुंती ने कहा
“मेरे जीवन में दुख आते रहें।”
यह सुनकर श्रीकृष्ण चौंक गए।
“बुआ, ये क्या मांग लिया आपने? आपके जीवन में तो पहले ही बहुत दुख आए हैं, पति को खोया, वनवास झेला, पुत्रों की पीड़ा देखी। अब और दुख क्यों?”
कुंती की आंखों में भगवान के लिए प्रेम था। वे बोलीं-“कृष्ण, जब-जब मेरे जीवन में दुख आया, तुम मेरे सबसे करीब रहे। तुमने मार्गदर्शन दिया, मेरी आत्मा को सहारा दिया। लेकिन जब सुख आया, तुम्हारी याद कम हो गई। मैं नहीं चाहती कि मैं तुम्हें कभी भूलूं। दुख मेरे लिए साधना है, क्योंकि दुख में मैं तुम्हारे निकट आ जाती हूं। हर पल तुम्हारा ध्यान करती हूं, भक्ति करती हूं।”
श्रीकृष्ण थोड़ी देर मौन रहे, फिर उनके चेहरे पर मुस्कान
लौट आई। उन्होंने कहा
“जैसी आपकी मर्जी बुआ।”
आज का भगवद् चिन्तन
जन्मोत्सव की मंगल बधाई
भगवान श्रीकृष्ण जैसा व्यक्तित्व युगों-युगों में एक बार प्रकट हो पाता है। इस माँ भारती की कोख से यूँ तो अनेक महापुरुषों का अवतरण हुआ लेकिन भगवान श्रीकृष्ण जैसा विराट व्यक्तित्व कोई अन्य नहीं हुआ है। बंधन में पैदा हुए पर बंधनों को स्वीकार नहीं किया और मुक्त होकर जिये। जीवन जैसा था वैसा ही स्वीकार किया, किसी के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं और कोई अस्वीकारोक्ति भी नहीं। जैसी भी परिस्थिति हो, मुस्कुराने और पूरे मनोयोग से उसका सामना करने की सीख श्रीकृष्ण के जीवन ने हम सबको प्रदान की।
लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण जैसा प्रज्ञा पुरुष, ज्ञानवान, गायक, संगीतज्ञ, योद्धा, योगी, राजा, मित्र, प्रेमी, पुत्र कोई दूसरा नहीं हो पाया। जब तक गोकुल-वृंदावन में रहे, ग्वाल बाल बनकर रहे, आनंद व प्रसन्नता के साथ जिये और जब द्वारिकाधीश बनकर द्वारिका की सत्ता पर विराजमान हुए तो उसी आनंद-प्रसन्नता और सहजता के साथ जिये। विषाद से प्रसाद तक की यात्रा का संदेश भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हम सबको प्रदान करता है।
भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, श्रावण | आज है कालाष्टमी
आज अष्टमी तिथि 09:34 PM तक उपरांत नवमी | नक्षत्र कृत्तिका 04:38 AM तक उपरांत रोहिणी | वृद्धि योग 07:21 AM तक, उसके बाद ध्रुव योग 04:28 AM तक, उसके बाद व्याघात योग | करण बालव 10:42 AM तक, बाद कौलव 09:35 PM तक, बाद तैतिल | आज राहु काल का समय 09:19 AM – 10:55 AM है | आज 11:43 AM तक चन्द्रमा मेष उपरांत वृषभ राशि पर संचार करेगा |