आज का पंचांग : माँ कूष्मांडा नमोऽस्तुते

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है। नवरात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के स्वरुप मां कूष्मांडा की पूजी की जाती है। मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं। मां कुष्मांडा को परमेश्वरी का रुप माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा के इस स्वरुप मां कुष्मांडा की पूजा करने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। साथ ही काम में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं। देवी पुराण के अनुसार, विद्यार्थियों के लिए मां कुष्मांडा की पूजा करने से उनकी बुद्धि का विकास होता है और ज्ञान की प्राप्ति होती है।

देवी का नाम कूष्मांडा कैसे पड़ा
देवी कूष्मांडा दुर्गा मां का चौथा स्वरुप है। देवी भागवत पुराण में उनकी महिला का वर्णन है। माना जाता है कि कूष्मांडा देवी की हंसी से ही सृष्टि के आरंभ में अंधकार था, जिसे मां ने अपनी हंसी से दूर किया था। उनमें सूर्य की गर्मी सहने से शक्ति है।

कैसा है मां कूष्मांडा का स्वरुप
मां कूष्मांडा शेर की सवारी करती हैं। उनकी आठ भुजाएं हैं। उनकी आठ भुजाओं में अस्त्र हैं। उनकी भुजाओं में कमल, कलश, कमंडल, और सुदर्शन चक्र पकड़ा हुआ है। मां का यह स्वरुर उन्हें जीवन दान देती हैं। मां कुष्मांडा का रुप बहुत ही आलौकिक और दिव्य है।

मां कूष्मांडा के पूजा मंत्र

मां कूष्‍मांडा का मंत्र : ऊं कुष्माण्डायै नम:
मां कूष्‍मांडा का बीज मंत्र: कुष्मांडा: ऐं ह्री देव्यै नम:
मां कुष्‍मांडा का ध्यान मंत्र: या देवी सर्वभू‍तेषु मां कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मां कूष्मांडा का भोग
मां कूष्मांडा को पीले रंग के मीठाइयों का भोग लगाया जाता है। जैसे केसर वाला पेठा और मां कुष्मांडा को बताशे का भोग भी लगाया जााता है। इसी के साथ मां कूष्मांडा को मालपुए का भोग भी लगा सकते हैं। साथ ही इस सफेद पेठे की बलि भी देते हैं।

आज का विचार

आग को आग नहीं बुझाती पानी बुझाता है। वैसे ही प्रेम से दुनिया को तो क्या, दुनिया बनाने वाले तक को जीता जा सकता है। पशु -पक्षी भी प्रेम की भाषा समझते है। तुम प्रेम बाटों, इसकी खुशबू कभी ख़तम नहीं होती.!

आज का भगवद् चिन्तन

माँ कूष्मांडा नमोऽस्तुते

केवल सामर्थ्यवान होना पर्याप्त नहीं है अपितु उस सामर्थ्य को लोक मंगल एवं लोक कल्याण में लगाना ही जीवन की परम श्रेष्ठता एवं सार्थकता है। केवल शक्ति सम्पन्न होने मात्र से भी किसी का जीवन वंदनीय नहीं बन जाता है अपितु उस शक्ति का सही व समय पर प्रयोग करने वालों को ही युगों-युगों तक स्मरण रखा जाता है।

अथाह शक्ति सम्पन्न होने पर भी माँ दुर्गा ने अपनी सामर्थ्य का प्रयोग कभी भी किसी निर्दोष को दण्डित करने हेतु नहीं किया अपितु केवल और केवल आसुरी वृत्तियों के नाश के लिए ही किया। शक्ति का गलत दिशा में प्रयोग ही तो पाप है।

साधन शक्ति सम्पन्न हो जाने पर कायर बनकर चुप बैठ जाना यह भी एक प्रकार से असुरत्व को बढ़ाने जैसा ही है। अपनी समस्त शक्ति व साधनों को मानवता की रक्षा में लगाने की प्रेरणा हमें माँ जग जननी भगवती से लेनी होगी तभी हम माँ के पुत्र कहलाने योग्य होंगे। नवरात्रि के चतुर्थ दिवस में माँ के “कूष्मांडा” स्वरुप का पूजन व वंदन किया जाता है।

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