पूर्व सचिव भारत सरकार भाई कमलानंद ने दी 14 लाख करोड़ के वाइबल इन्वेस्टमेंट प्लानिंग की दी जानकारी

पूर्व सचिव भारत सरकार भाई कमलानंद (डॉक्टर कमल टावरी) ने बताया भारत के खाली पड़े हुए निष्प्रयोज्य हाईवे, जंगल, उसर भूमि, खाली पड़े हुए गांव, भूतिया गांवों को लेकर 14 लाख करोड़ का वाइबल इन्वेस्टमेंट प्लानिंग

प्रस्तावना: भारत एक ऐसा देश है, जिसका नियोजन का पूरा ढांचा सरकार आधारित या सरकार से फंडेड, ग्रांट, रिबेट, सब्सिडी या लोनिंग के अंतर्गत या कुछ धार्मिक संस्थाओं द्वारा प्रेरित रहा है। इसमें मुख्य रूप से संगठित रूप से जो सरकारी डिपार्टमेंट हैं, उनके द्वारा बनाए गए प्रोजेक्टस के माध्यम से लगभग 500 ज्वाइंट सेक्रेटरी के द्वारा प्रस्ताव बनाया जाता है। जिन्हें वित्त विभाग, एक्सपेंडिचर विभाग, प्लानिंग विभाग, राज्य सरकारें, भारत सरकार के विभाग लोकल बोडीज के संस्थान, ग्राम सभा आदि के माध्यम से इस्तेमाल किया जाता है, जो अधिकतम रूप से सामान्य जनता को भागीदार के रूप में नहीं लेता है। और ये नियोजक सरकार आधारित सोच के माध्यम से होने के कारण लॉन्ग टर्म में असफल हो जाता है। अपने उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर पाता है। उदाहरण के लिए जो योजनाएं फूड प्रोसेसिंग में, खादी कमीशन में या अन्य विभागों के द्वारा विकास के नाम पर चलाई गई, वो संतुलित मिश्रित, वाइबल, और ग्रांट आधारित होने के कारण लॉन्ग समय में अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सकती है। ऐसे समय में एक नई सोच नया नियोजन, लोक आधारित लोगों की भागीदारी से स्थानीय आवश्यकताओं को देखकर पर्यावरणीय चुनौति को झेलने वाली संतुलित स्वचालित, स्वदेशी, नियोजन की अत्यंत आवश्यकता है। इसको कौन चलाएगा, अब तक कि योजनाएं सरकारी वित पोषित या एनजीओ या कॉपोरेट सेक्टर से सीएसआर द्वारा चलाया जाता है। मुख्य रूप से लोगों की भागीदारी और विकेंद्रित सशक्तिकरण, स्वाभिमान, स्वावलंबन उपेक्षित हो जाता है। यह अत्यंत आवश्यक है कि जनांदोलन के रूप में पीपुल्ल्स इंटी, नियोजन, अनुसरण, वित पोषण, स्थानीयकरण, लोकल मार्केट, लोकल स्किल, लोकल मांग और पूर्ति की संभावनाओं को देखते हुए पूंजी निवेश कैसे कराया जाए, जिससे लॉकल लोगों की लोकल स्कूल कालेजों की, लोकल ग्राम सभाओं की लोकल जातियों की पूरी भागीदारी इसे गतिशीलता और संपूर्णता दे। ये कौन से सेक्टर हैं जिनमें ये संभावनाएं हैं। हम इन सेक्टर को दो तरीकों से देखते हैं। एरिया वाइज, जैसे ग्राम सभा, वार्डस, लोकल बॉडिज, रोडस, खाली पड़ी जमीनें, चाहे वो किसी की विभाग की हों। राजमार्ग या रेलवे लाइन की जमींने हों। यह तो एरिया वाइज हो गया। अब दूसरा नंबर सेक्टर वाइज का आता है। जैसे वृक्षारोपण का आता है। जिसमें पौधों की सभी जातियों का मिश्रित वन है। संसाधनों में कोल्ड स्टोरेज, गोडाउन, स्कूल, गुरुकुल के साथ ट्रेनिंग एक्सटेंशन सेंटर, जिसमें खाली पड़े स्थानों को लोकल संसाधनों द्वारा चलाया जाएगा। जिससे कम से कम खर्चे में यह संस्थान यूज में आ सकें। हाईवे के दोनों ओर खाली पडी जमीनों में पौधारोपण किया जा सकता है।

ग्रामोद्योग के कलस्टर रूरल इंवेस्टमेंट के अंतर्गत अच्छी लोकल पुरानी स्किल, गांव का वन प्रॉडक्ट वन स्पेशलिटी में चाहे वह प्शु धन के क्षेत्र में हो, घास के क्षेत्र में हो, सब्जियों के क्षेत्र में हो, बीज के क्षेत्र में हो, भाषा के क्षेत्र में हो, नर्सरी के क्षेत्र में हो।

पुरानी जो परंपरागत स्क्लिस हैं, उदाहरण के लिए जातियां बहुत बड़ी स्किलस देने वाली संस्थाएं थी। वो न केवल सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक शारीरिक, अपनी रिक्लस बढाने वाली जातियां, उसको गर्व, स्वाभिमान, और रोजगार के साथ हर तरह की सुरक्षा देती रही हो। असको अ-सरकारी असरकारी ढंग से इस्तेमाल करना।

स्वदेशी के अंतर्गत लोकलाइज प्लानिंग में लोकल संसाधनों को, लोकल प्रोडक्टस, तथा ज्ञानवर्द्धक प्रवृतियों को इंवेस्टमेंट के एंगिल से पब्लिक, प्राईवेट, प्रोफिटेबल, पंचायत, प्रोगेसिव, पार्टनरशिप, या इनोवेटिव, इंप्लीमेटेबल, इन्वेशटिव, इन्क्लूजिव, इन्वेस्टमेंट, इन.

यह सब क्यों जरूरी है: जैसा कि सब जानते हैं कि ग्लोबलाइजेशन ने बहुत नुकसा किया है। हालांकि उसके कुछ फायदे भी हैं। अब समय आ गया है कि विकेंद्रिकरण को पूरी शक्ति दी जाए। इसके लिए भारत में संवैधानिक रूप् से गांव को नगर पालिकाओं, पंचायतों को, जिला परिषद, महानगरपालिका को बहुत पावर दी गई हैं। लेकिर उनका सदुपयोग नहीं कर पाते हैं। क्योंकि ब्यूरोक्रेसी का उन पर बहुत ज्यादा पकड़ है। जो चुनकर आते हैं, वे भ्रष्टाचार से चुनकर आते हैं। इसलिए उनका ध्यान ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने पर रहता है। ऐसी स्थिति में जो स्थानीय प्रतिभाएं हैं, खाली पड़ी हुई संसाधनों पर कोई भी गंभीरता से ध्यान नहीं देता है। कैसे भारत की विविधताएं, संस्कृति हैं, को लेकर वैकल्पिक अ-सरकारी असरकारी ढंग से सबको साथ में लेकर इन्कलूजिव, मॉनिटरिंग, प्लानिंग, एक्शन पर ध्यान दें।

पैसा कहाँ से आएगा?

यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। सरकारें, बैंक, बडे-बडे प्रोगाम्स में ज्यादा रुचि लेती है। जो छोटे-छोटे प्रोगाम्स हैं, जैसे प्रतिगांव 3 करोड का प्लान, 4 करोड का प्लान, जिसमें गांव में इंवेस्टमेंट, गांव में धंधे बढाने का धंधा, गांव में स्वावलंबन, स्वदेशी, स्वरोजगार की शुद्धता, और पशुधन पर आधारित विशेषकर देशी गायों पर, देशी तकनीकियों पर, देशी स्वभाव आधारित उद्यमिता के कल्चर बढाना।

महिलाओं तथा लोकल युवाओं के साथ जो स्कूल, कालेज आईआईटी, केवीके, डायट आदि हैं, इनका इस्तेमाल लोकल ब्लाक लेवल या वार्ड लेबल पर उद्यमिता के साथ करके मोटिवेशन, अल्टरनेटिव, प्लान आफ एक्शन को टर्न की कंस्लटेंसी में यूज करना।

यह काम कौन करेगा सीधी बात यह है कि यह जो एक्सटेंशन का कार्य है, जो अब तक सरकारी खर्चे से सरकारी कर्मचारियों द्वारा किया जाता है, जो ग्रांट, रिबेट, सब्सिडी के अंतर्गत चुनाव तथा अन्य सेंसर के कार्यों में भार के कारण ईमानदारी से अपना कार्य विकास का न होकर विनाश को रहा है. फिर नीतियां विकास की, भागीदारी की स्वाभिमान को बढ़ाने वाली न होकर परावलंबी, भिखारी, पंगु बना दिया है। फिर ऊपर से फोकट का कल्चर की परंपरा चल पड़ी है। फिर सरकारों ने कईयों के बैंक कर्जे माफ कर कर के गलत आदत सी लगा दी है। फिर कई कोओपरेटिव सोसाइटीज ने लोगों का पैसा डुबो दिया है। उससे भी लोगों विश्वास उठ रहा है। इसी तरह लोगों के हाथ में कय शक्ति आई है, जमीनों के भाव बढे हैं। सरकारी कर्मचारियों पेंशनर्स को पेंशन काफी मिलने लगी है। ऐसी दशा में समय है कि एक जनांदोलन का रूप जो ढर्रे से हटकर होगा और लोगों की भागीदारी से चलेगा। इसमें शत प्रतिशत पारदर्शिता, स्थानीय ज्ञान, तनकीक और मार्केट को लिया जाएगा, जिसमें वाइबेल इंवेस्टमेंट का अवसर होगा। इसमें कंवर्जन होगा। जिसमें कम से कम एडिशनल इंवेस्टमेंट में खाली पड़े संसाधनों में एक विकल्प का जनांदोलन आधारित ढांचा बनाया जाए।

पर्यावरणीय विकास की आवश्यकताएं, अनिवार्यताएं और इंवेस्टमेंट का क्या नया स्वरूप होगा?

क्या इसके लिए फंड उपलब्ध है अगर हम पूरा इंवेस्टमेंट बैंकों में को–ओपरेटिव में देखें तो उसमें 14 लाख करोड रूप्ए कुछ भी नहीं हैं। हम जिलों का सीडी रेसियो देखें तो कई जिले में केवल 40 प्रतिशत ही केवल खर्च हुआ है। इसके अलावा सहकारिता के माध्यम से समृद्धि के अंतर्गत भारत सरकार के सहकारिता विभाग में कई योजनाएं है। यह सही समय है जब सहकारिता के माध्यम से समृद्धि

वाइबल इंवेस्टमेंट ऑर्योचुनिटी और पर्यावरणपूरक धंधे डाले जाएं।

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