पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है
पौष शुक्ल पक्ष द्वितीया, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, पौष | आज है सोमवार व्रत|
आज द्वितीया तिथि 10:52 AM तक उपरांत तृतीया | नक्षत्र उत्तराषाढ़ा 05:32 AM तक उपरांत श्रवण | ध्रुव योग 04:40 PM तक, उसके बाद व्याघात योग | करण कौलव 10:52 AM तक, बाद तैतिल 11:35 PM तक, बाद गर | आज राहु काल का समय 08:27 AM – 09:46 AM है | आज 10:06 AM तक चन्द्रमा धनु उपरांत मकर राशि पर संचार करेगा |
महाभारत का संदेश है कि सफलता और ज्ञान के साथ अगर अहंकार जुड़ जाए, तो व्यक्ति का पतन निश्चित हो जाता है। ऐसा ही एक प्रेरक प्रसंग अर्जुन और कर्ण के युद्ध से जुड़ा है, जिसमें श्रीकृष्ण ने अहंकार के बारे में बताया है।
युद्ध में अर्जुन और कर्ण आमने-सामने आ गए थे। दोनों ही धनुर्धर पराक्रमी थे। अर्जुन के बाण जब कर्ण के रथ पर लगते, तो उसका रथ 20-25 हाथ पीछे खिसक जाता था, जबकि कर्ण के बाण जब अर्जुन के रथ से टकराते, तो अर्जुन का रथ बहुत थोड़ा हिलता था।
जब भी कर्ण का बाण अर्जुन के रथ पर लगता, श्रीकृष्ण उसकी प्रशंसा कर रहे थे, लेकिन जब अर्जुन के बाण कर्ण के रथ को पीछे धकेलते, तब श्रीकृष्ण मौन रहते। ये देखकर अर्जुन के मन में अहंकार और भ्रम दोनों पैदा हो गए।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण से प्रश्न किया कि हे केशव, मेरे बाणों से कर्ण का रथ बहुत पीछे चला जाता है, जबकि उसके बाणों से मेरा रथ थोड़ा सा ही हिलता है। फिर भी आप उसके पराक्रम की प्रशंसा कर रहे हैं, क्या उसके बाण मेरे बाणों से अधिक शक्तिशाली हैं?
श्रीकृष्ण बोले कि अर्जुन, तुम्हारे रथ पर मैं स्वयं बैठा हूं। ध्वज पर हनुमान जी विराजमान हैं और रथ के पहियों को शेषनाग थामे हुए हैं। इतनी शक्तियों के बावजूद यदि कर्ण के बाण से ये रथ थोड़ा भी हिलता है, तो सोचो कर्ण का पराक्रम कितना महान है, तुम्हारे साथ दैवीय शक्तियां हैं, जबकि कर्ण केवल अपने पुरुषार्थ के बल पर युद्ध कर रहा है।
ये सुनते ही अर्जुन का अहंकार टूट गया। उसे समझ आ गया कि किसी की बाहरी स्थिति देखकर उसे कमजोर समझना सबसे बड़ी भूल है।
श्रीकृष्ण की सीख
अहंकार सफलता का सबसे बड़ा शत्रु है
जब हम अपनी उपलब्धियों को केवल अपनी क्षमता मानने लगते हैं, तब अहंकार जन्म लेता है। ये कहानी सिखाती है कि सफलता में कई अदृश्य सहायक शक्तियां हमारे साथ होती हैं, जैसे परिवार, गुरु, परिस्थितियां और ईश्वर। इसलिए कभी भी सफल होने के बाद अहंकार नहीं करना चाहिए।
शत्रु या प्रतिस्पर्धी को कभी छोटा न समझें
कर्ण को कमजोर समझना अर्जुन की भूल थी। जीवन में भी जो लोग शांत या संसाधनों से कम दिखते हैं, वे भीतर से अत्यंत मजबूत हो सकते हैं। इसलिए कभी भी शत्रु को छोटा न समझें।
विनम्रता नेतृत्व की पहचान है
श्रीकृष्ण स्वयं सर्वशक्तिमान होकर भी विनम्र थे। जीवन में सच्चा नेता वही होता है, जो दूसरों की क्षमता को पहचानता और सम्मान देता है। अगर हम शक्तिशाली हैं तो हमें और ज्यादा विनम्र होना चाहिए।
आत्ममंथन की आदत विकसित करें
अर्जुन ने प्रश्न किया और उत्तर स्वीकार किया। जीवन में जब कोई हमें सत्यता बताता है, तो उसे अस्वीकार नहीं, बल्कि स्वीकार करें और उसे अपने स्वभाव में उतारें।