पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है
माघ कृष्ण पक्ष द्वादशी, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, पौष |
आज द्वादशी तिथि 08:16 PM तक उपरांत त्रयोदशी | नक्षत्र ज्येष्ठा 05:47 AM तक उपरांत मूल | वृद्धि योग 08:37 PM तक, उसके बाद ध्रुव योग | करण तैतिल 08:17 PM तक, बाद गर | आज राहु काल का समय 01:56 PM – 03:17 PM है | आज 05:47 AM तक चन्द्रमा वृश्चिक उपरांत धनु राशि पर संचार करेगा |
पर्वतों को ठीक से देख लेने पर माया, मोह, शोक चला जाता है
पहले पर्वतों के भी पंख हुआ करते थे। उनकी उड़ान देखकर हर कहीं उनका टिकना इंद्र को पसंद नहीं आया। इंद्र ने पंख काट दिए और पहाड़ एक जगह स्थिर हो गए। पहाड़ों को अगर ध्यान से सुना जाए तो वो कहते हैं कि हमारी स्थिरता ही हमारी यात्रा है।
मनुष्य के जीवन में पहाड़ बहुत बड़ा संदेश देते हैं। जैसे नदियां भी बहुत कुछ समझाती हैं। योगी लोग एक प्रयोग बताते हैं। सुबह उठने के बाद आंख बंद करके किसी नदी, विशेषकर गंगा का स्मरण करें। और रात को सोने के पहले किसी पहाड़- वो हिमालय भी हो सकता है-उसका स्मरण करें।
शंकर जी के कहने पर पक्षीराज गरुड़ काकभुशुण्डि जी के पास पहुंचे तो वहां उन्हें एक पर्वत दिखा। तुलसी लिखते हैं- देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ, माया मोह सोच सब गयऊ। उस पर्वत को देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और सब माया, मोह और सोच जाता रहा। अगर ठीक से पर्वतों को देख लिया जाए तो माया यानी इल्यूजन, मोह यानी फैसिनेशन, सोच (शोक) यानी ग्रीफ चला जाता है। पाषाण में भी प्राण हैं!
आज का भगवद् चिन्तन
पात्र की स्वच्छता
जीव प्रभु का अंश है इसलिए अव्यक्त रूप से बहुत गुण भी उसके भीतर छिपे हैं। इस प्रकृति में कोई भी जीवन अपात्र एवं मूल्यहीन नहीं है। उस प्रभु के अंशरूप होने के कारण हम सभी पात्र ही हैं पर पात्र की भी समय-समय पर सफाई अवश्य होनी चाहिए। गंदे पात्र में अमृत भी विष बन जायेगा। जीवन के इस पात्र में दुर्गुण, दुराचार एवं अनाचार रूपी कंकड़-पत्थर भरे हों तो सद्गुण एवं सदाचार रूपी रत्न का उसमें प्रवेश संभव नहीं है।
प्रभु कथा, सत्संग एवं सदग्रंथों के आश्रय में मन की नित्य सफाई करते रहो, ताकि हमारे मन के पात्र में गंदगी इकट्ठी न हो सके। सदैव निष्कपट, निर्दोष, निर्वैर और सहज बने रहने का प्रयास करते हुए सर्व हिताय का चिन्तन रखो। जिस मन से प्राणी मात्र के मंगल की भावनाएं उठती हैं, मन रुपी वो पात्र स्वच्छ ही समझना चाहिए। पात्र की स्वच्छता ही हमारी पात्रता विकसित करता है।