पर्यावरण का भारतीय विकल्प

भाई कमलानंद (डॉ कमल टावरी)
पूर्व सचिव भारत सरकार

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पर्यावरण के कुछ ज्यादा महत्व, चिंताएं, खतरे बोलने की जरूरत नहीं है. क्योंकि इस पर समय-समय पर बहुत अध्ययन हो चुका है और आपदा के खतरों को पर्यावरण से जोड़कर दूर करने के कई प्रयास किए गए हैं. पर्यावरण के लिए राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय स्तरों पर बहुत प्रयास हो रहे हैं, जो कि बहुत अभिनंदनीय हैं.

  1. प्रश्न यह है कि इन सारे प्रयासों के बाद क्या पर्यावरण की चिंताएं बढ़ रही हैं. यूनाइटेड नेशंस का जो प्रयास रहा है, वह नितांत असफल रहा है. नाटक पर नाटक और नए-नए शिगुफे पर चल रहे हैं. ऐसी दशा में क्या हम लोग स्थानीयकरण से पर्यावरणीय समस्याओं के विकल्प पर सोच सकते हैं

3 कुछ पर्यावरण की महत्वपूर्ण घटनाओं में अगर हम विकल्प बेचने का धंधा, ऐसा करें कि विकल्प वह हो, जो लोक आधारित हो, जनाधारित हो, अफॉर्डेबल हो और वर्ल्ड की समस्याएं दूर करने वाला हो. ऐसी दशा में पेड़ लगाना चुनौती जैसा हो गया है. क्या हम पेड़ लगाने के लिए इंडियन नर्सरीमेन एसोसिएशन वाई.पी. सिंह जी से काफी कुछ सीख सकते हैं. उन्होंने सरकार से कुछ भी आर्थिक मदद नहीं ली और लाखों करोड़ों पेड़ लगा रहे हैं. जनता के साथ स्वरोजगारियों के माध्यम से विकेंद्रित नर्सरी के माध्यम से. इसी तरह हमारे जंगली जी ने बहुत बड़ा कार्य किया है. अपने पैसों से डेढ़-दो लाख पेड़ अपने गांव में लगाए हैं. इसी तरह से कई अपवाद है.
क्या हम विकल्प का मार्केटिंग के अंतर्गत अपवादियो से सीख सकते हैं. क्या यह अपवादी हमारे लिए एक बहुत बड़ा व्यवसायिक शुभ लाभी स्वार्थ का विकेंद्रीकरण का, ग्राम स्वराज का विकल्प दे सकते हैं. इसी तरह यमुना में बराबर गंदगी जा रही है. देखा जाए तो सभी नदियों में गंदगी जा रही है. बहरहाल गंगा जमुना हमारे लिए बहुत बड़ा चैलेंज है. दिल्ली में यमुना नदी को लेते हुए विकेंद्रित ढंग से जहां-जहां पर नदी ज्यादा प्रदूषित हो रही है, जैसे फैक्ट्री के कचरे से, लोगों के घरों से निकल रहे कचरे से. क्या उसका रिफाईनमेंट वहीं पर गोमूत्र के माध्यम से हो सकता है? जब तक हम विकेंद्रित व्यवस्था नहीं लाएंगे, तब तक गंगा जमुना को साफ करना बहुत मुश्किल है. उसकी जो जड़ है, जहां से नदियों का उद्गम स्थल है वहीं से गंदगी को दूर करना होगा. ऐसी दशा में वार्ड का जो प्लानिंग है, इसके लिए वार्ड की नेतृत्वशाला पर काम करें. जो अपने वार्ड को प्रदूषण मुक्त, गंदगी मुक्त, भ्रष्टाचार मुक्त करे. यह बहुत बड़ी चुनौती है.

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इसके लिए हम यह काम कर सकते हैं. पर्यावरणीय नेतृत्वशाला, जो विकेंद्रीकृत हो. जिसका मूल आधार अन्ना हजारे जी ने लोक आंदोलन के रूप में कहा है. अंत में हम चाहते हैं कि यह गाय और स्वाभिमान, स्वरोजगार, वृक्षारोपण का ठीक से मार्केटिंग नहीं हुआ है. एक नई दिशा, शुभ लाभ स्वार्थी संगठन. इसमें बिजनेस एंगल लाना होगा. इसमें तार्किक वैज्ञानिक सोच जरूर चाहिए. लेकिन अगर जैविक नहीं रहा, पर्यावरण नहीं रहा तो कुछ भी नहीं बचेगा. मेरा सभी से अनुरोध है कि विकल्प का आधार ढूंढ़ीये. अपवादियों से सीखिए कि कैसे व्यवस्था को सुधारे.

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