मूलाधार चक्र : जीवन का आधार, जानिए कैसे जाग्रत करें मूलाधार

योगाचार्य जीवन चंद उप्रेती

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जैसे किसी इमारत की बुनियाद सबसे महत्वपूर्ण होता है, उसी तरह मूलाधार सबसे महत्वपूर्ण चक्र होता है। मूलाधार चक्र, जिसे मूल चक्र भी कहा जाता है, हमारे शरीर का सबसे निचला चक्र है. यह चक्र हमारे अस्तित्व की नींव है और यह हमारे शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है.

मूलाधार चक्र के निचले भाग में सुषुम्ना नाड़ी का मुख होता है। उसके बिल्कुल पास ही एक गुप्त शिवलिंग है। एक महा सर्पिणी जिसे कुण्डलिनी आदिशक्ति कहते हैं, वह साढ़े तीन चक्कर लगाकर उस गुप्त शिवलिंग के साथ लिपटकर नीचे की ओर मुख करके सुप्तावस्था में उपस्थित है। यह चक्र कितनी ही उच्चकोटि की शक्ति रखता है। यह रीढ़ की हड्डी का सबसे निचला स्थान है। मूलाधार चक्र पर ध्यान का फल है- आरोग्यता, आनंद, वाक्य दक्षता। यह भूलोक है।

मूलाधार चक्र को जगाने का हमारे जीवन में बहुत महत्व है. इससे व्यक्ति में जीवन शक्ति बढ़ती है. वह अधिक ऊर्जावान और सक्रिय महसूस करता है. अगर कोई भी व्यक्ति अपने मूलचक्र को जागृत करता है को उसमें आत्मविश्वास बढ़ता है और वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अधिक दृढ़ निश्चयी हो जाता है. भौतिक सुरक्षा और स्थिरता मिलती है, हमें जमीन से जोड़ता है और हमें स्थिरता प्रदान करता है. इसे जगाने से पाचन, रक्त परिसंचरण और प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होते हैं और साथ ही भावनात्मक संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है.

बुनियादी चक्र है सबसे महत्वपूर्ण

मूलाधार चक्र शरीर की बुनियाद है। जैसे किसी इमारत की बुनियाद सबसे महत्वपूर्ण होती है, उसी तरह मूलाधार सबसे महत्वपूर्ण चक्र होता है। जब हम योग करते हैं, तो हम किसी और चीज से अधिक मूलाधार पर ध्यान देते हैं। क्योंकि अगर आपने इसे सुदृढ़ और स्थिर कर लिया, तो बाकियों का निर्माण आसान हो जाता है। अगर हम कमजोर नींव पर भवन खड़ा करने की कोशिश करें, तो वह एक सर्कस की तरह हो जाएगा।

शरीर में इसका काम क्यों बुनियादी है

यह पेरिनियम में, रीढ़ के बिल्कुल नीचे, कॉक्सिक्स के पास माना गया है। चार पंखुड़ी, लाल रंग, पृथ्वी तत्व।

शारीरिक स्तर पर
पैर, तलवे, हड्डियां, दांत, नाखून, बड़ी आंत और मल विसर्जन
पेल्विक फ्लोर की टोन
एड्रेनल ग्रंथियां, यानी लड़ो या भागो प्रतिक्रिया
गंध का ज्ञान, गहरी नींद, रोग प्रतिरोध की बुनियाद

जड़ मजबूत हो तो नींद पूरी होती है, पाचन नियमित रहता है, पैर गरम रहते हैं, कमर में लगातार जकड़न नहीं रहती।

मानसिक स्तर पर
बुनियादी भरोसा
घर, परिवार, जगह से जुड़ाव
पैसा, भोजन, छत को लेकर स्थिरता
काम पूरा करने की क्षमता, बोरियत सहने की ताकत

ऊर्जा के स्तर पर
यहीं कुंडलिनी सोई हुई कही गई है
यहीं से सुषुम्ना का मुंह खुलता है
आधार ढीला हो तो ऊर्जा ऊपर टिकती नहीं, चक्कर, बेचैनी, या भावनात्मक उथल-पुथल आती है

कमजोर मूलाधार में डर, पैसे की घबराहट, बार-बार बीमार पड़ना, कब्ज, ठंडे हाथ पैर दिखते हैं। ज्यादा जकड़ा हुआ हो तो जिद, जमा करने की आदत, मोटापा, हर बदलाव से चिड़चिड़ापन आता है।

मंत्र: लं

हर चक्र का एक बीज ध्वनि है। मूलाधार का बीज है लं।

संस्कृत में लं। इसे लम नहीं, लम् बोलते हैं, जैसे अंग्रेजी fun में u की आवाज। ल जीभ को तालु से लगाता है, अ गले को खोलता है, म् होंठ बंद करके नाक में गूंजता है।

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यह आवाज सीधे पेरिनियम और रीढ़ के आधार में कंपन देती है। भारी, नीची, नीचे की ओर जाने वाली ध्वनि, बिल्कुल पृथ्वी जैसी।

लं का जप कैसे करें

बिना तैयारी के माला पकड़ने की जरूरत नहीं।

जमीन पर बैठो, सिद्धासन या वज्रासन में, रीढ़ सीधी, बैठने की हड्डियां नीचे दबी हुई
तीन बार धीरे-धीरे पेट तक सांस लो
सांस छोड़ते हुए हल्का मूल बंध लगाओ, पेरिनियम को भीतर ऊपर की ओर हल्का खींचो, जोर मत लगाओ
उसी छोड़ती सांस पर लं बोलो, म् को 3 से 4 सेकंड खींचो, कंपन नीचे महसूस हो
11 बार करो, फिर एक मिनट आंख बंद करके पैरों का वजन देखो

सबसे अच्छा समय सुबह खाली पेट और सूर्यास्त के आसपास। नंगे पांव जमीन पर बैठोगे तो असर तेज होता है।

परंपरा में 108 बार रोज 40 दिन तक कहा गया है। शुरुआत में 27 बार भी काफी है, अगर सांस और ध्यान साथ हो।

लं के साथ क्या जोड़ें:
जप के बाद धीरे चलना
ताड़ासन, मालासन, वीरभद्रासन
उस दिन गरम, पका हुआ, जड़ वाली सब्जियों का भोजन
खस, देवदार या मिट्टी की गंध

लेटकर हेडफोन में लं सुनते हुए स्क्रॉल करना अभ्यास नहीं, शोर है।

याद रखने की एक लाइन

अगर पैर जमीन पर नहीं टिकते, तो रास्ता भरोसे लायक नहीं लगता। मूलाधार तुम्हें पैर देता है।

लं उसी का सबसे छोटा रिमाइंडर है। एक अक्षर, एक कंपन, और शरीर को याद आ जाता है कि शुरुआत कहाँ से करनी है

नोट : कुंडलिनी की साधना किसी योग्य गुरु के निर्देशन में करें.

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