सेवा में,
श्री पुष्कर सिंह धामी जी,
मुख्यमंत्री, उत्तराखंड सरकार
आपको भाई कमलानंद (डा. कमल टावरी) पूर्व सचिव भारत सरकार का प्रणाम. मैं पंचगव्य विद्यापीठम का कुलपति लगभग 80 साल का हो गया हूं. पूरे भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व का ही समय-समय पर भ्रमण करता रहता हूं. हम लोग बिना किसी सरकारी मदद के समाज कैसे समृद्ध हो, सभी स्वस्थ और आनंदित हो एवं उनगलियों की मुठी बनाकर अधूरे सपने पूरे करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं.
भारत को विश्व गुरु बनाने में उत्तराखंड ‘देवभूमि’ के रूप में आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक केंद्र की अनूठी भूमिका निभा रहा है. यह राज्य योग-आयुर्वेद की वैश्विक राजधानी, प्रमुख तीर्थस्थल, हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षक, और सामरिक सीमा सुरक्षा के स्तंभ के रूप में भारत की सॉफ्ट पावर और आत्मनिर्भरता को सशक्त कर रहा है.
उत्तराखंड राज्य को बने हुए 25 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन राज्य के गांवों से पलायन एक बड़ी समस्या बना हुआ है.पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. यहाँ पलायन का सिलसिला लगातार जारी है. यहाँ कई गांवों में से) ऐसी जगहों में तब्दील हो गए जिन्हें ”भुतहा गांव’’ कहते हैं, जहां शायद ही कोई बचा रह गया हो.
उतराखण्ड राज्य की परम्परा में ही पशुधन रहा है, जिसमें बद्री गाय महत्त्वपूर्ण थीं. बद्री गाय का पालन परिवार में कुशलता एवं सम्पन्नता का परिचायक थी. जैसे-जैसे लोग शहरों की तरफ प्रवासी बनते गए वैसे-वैसे गाँव से और परिवारों से बद्री गाय लुप्तप्राय होती गई. यही नहीं बद्री गाय के लुप्त होने से राज्य में कई तरह की समस्या खड़ी हो गई. एक तो पशुधन समाप्त हो रहा दूसरा राज्य में कृषि के उत्पादन में कमी आ रही.
जिस कारण पलायन का स्पष्ट चेहरा सामने आया और स्वरोजगार के साधनों पर संकट मँडराने लग गया. यदि फिर से पहाड़ में बद्री गाय पालन आरम्भ होता है तो निश्चित तौर पर पहाड़ की पुरानी रौनक वापस लौट सकती है। इसके लिए यह अपील की जाती है –
उत्तराखण्ड में भी कई गांव पलायन के कारण खाली हो चुके हैं। वहां पर खाली गांवों में बद्री गाय के गांव बनाए जा सकते हैं. वहां पर अपना दूध, अपनी सब्जी, अपना भोजन होंगे, जो ग्राम स्वराज के भाग होंगे. रूरल इन्वेस्टमेंट के भाग होंगे. क्षमता है, लेकिन सदुपयोग करने की जरूरत है.
साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में अपने प्रयासों से उल्लेखनीय कार्य करने वाले अपवादियों का अभिनंदन करना शुरू कर दीजिए. रिटायर्ड लोगों का सदुपयोग किया जाए. जितने भी ट्रेनिंग सेंटर है, उनको पीपीपी मोड में करवाकर कोओपरेटिव के माध्यम से संचालित करवाइए. सरकारी खर्चा कम करवाइए. खाली पडी जमीनों में नया प्लान बनाइए. हमारे परंपरागत बीज का संरक्षण होना चाहिए. चकबंदी को स्वयंसेवक के रूप में करवाइए और उनको इंसेटिव दिलवाइए. स्वाभिमानी स्वावलंबी स्वतंत्रता की सलाहकार सेवा का सदुपयोग कीजिए. मिश्रित जंगल बढाइए, इससे फारेस्ट कवर बढ़ेगा. केवल जगल कम होगी. फारेस्ट और हॉर्टिकल्चर को एक कराइए। लोकल प्लानिंग कराइए और इसके लिए ग्राम सभा को मजबूत कराइए.