आज का पंचांग : अपरा एकादशी पर अवश्य पढ़ें ये व्रत कथा, भगवान विष्णु हो सकते हैं प्रसन्न

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है

आज का विचार

वरदान, खुशी, आशीर्वाद तीनो एक साथ मिल सकता है। जब कोई बुजुर्ग निःशब्द तुम्हारे झुके हुए सिर पर अपनी कांपती हुई उँगलियाँ फेर दे.!

आज का भगवद् चिंतन
स्वयं का पुरुषार्थ

स्वयं के पुरुषार्थ के बिना जीवन में उन्नति एवं उत्थान के द्वार भी स्वतः बंद हो जाते हैं। दूसरे आपको केवल सलाह दे सकते हैं, लेकिन उस पर चलना आपके स्वयं के हाथों में ही है। केवल आप ही इस दुनिया में स्वयं अपनी तकदीर बदल सकते हैं। केवल आप ही स्वयं के चेहरे पर मुस्कुराहट ला सकते हैं एवं केवल आप ही स्वयं अपने जीवन को सुखी और आनंदमय बना सकते हैं। आपका स्वयं का पुरुषार्थ ही आपकी सफलता एवं प्रसन्नता का आधार है।

आपकी किसी भी समस्या का श्रेष्ठ हल आपके सिवा किसी और के पास नहीं हो सकता है। केवल आप स्वयं ही अपनी प्रत्येक समस्या का हल ढूँढ सकते हैं एवं अपने जीवन को एक आदर्श जीवन बना सकते हैं। गहराई से मनोमंथन करने पर आप पाओगे कि आपके सिवा कोई और नहीं जो आपके जीवन को सुखमय एवं आनंदमय बना सकता है क्योंकि दूसरे केवल मार्ग दिखा पायेंगे, चलना स्वयं को ही पड़ेगा।

अपरा एकादशी-व्रत

कथा माहात्म्य:-

युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन! ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का क्या नाम है तथा उसका माहात्म्य क्या है सो कृपा कर कहिए?

भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! यह एकादशी ‘अचला’ तथा’ अपरा दो नामों से जानी जाती है। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी है, क्योंकि यह अपार धन देने वाली है। जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, वे संसार में प्रसिद्ध हो जाते हैं।

इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है। अपरा एकादशी का व्रत करने से मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करते हैं फिर उनकी निंदा करते हैं वे अवश्य नरक में पड़ते हैं। मगर अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी इस पाप से मुक्त हो जाते हैं।

जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है, वही अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। मकर के सूर्य में प्रयागराज के स्नान से, शिवरात्रि का व्रत करने से, सिंह राशि के बृहस्पति में गोमती नदी के स्नान से, कुंभ में केदारनाथ के दर्शन या बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र के स्नान से, स्वर्णदान करने से अथवा गौदान से जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है।

यह व्रत पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए ‍अग्नि, पापरूपी अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान, मृगों को मारने के लिए सिंह के समान है। अत: मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान का पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर विष्णु लोक को जाता है।

कथा:-

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा।

एक दिन अचानक धौम्य नामक ॠषि उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा। ॠषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया।

दयालु ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया।

हे राजन! यह अपरा एकादशी की कथा मैंने लोकहित के लिए कही है। इसे पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य को पापों मुक्ति मिलती है।

आज का पंचांग

सूर्योदय एवं चन्द्रोदय
सूर्योदय05:44 ए एमसूर्यास्त07:13 पी एम
चन्द्रोदय03:36 ए एम, मई 14चन्द्रास्त03:30 पी एम
पञ्चाङ्ग
तिथिएकादशी – 01:29 पी एम तकनक्षत्रउत्तर भाद्रपद – 12:17 ए एम, मई 14 तक
द्वादशीरेवती
योगविष्कम्भ – 08:55 पी एम तककरणबालव – 01:29 पी एम तक
प्रीतिकौलव – 12:30 ए एम, मई 14 तक
वारबुधवारतैतिल
पक्षकृष्ण पक्ष  
चन्द्र मास, सम्वत एवं बृहस्पति संवत्सर विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल
विक्रम सम्वत2083 सिद्धार्थीबृहस्पति संवत्सरसिद्धार्थी – 03:53 पी एम, अप्रैल 21, 2026 तक
शक सम्वत1948 पराभवरौद्र
गुजराती सम्वत2082 पिङ्गलचन्द्रमासज्येष्ठ – पूर्णिमान्त
प्रविष्टे/गते30वैशाख – अमान्त
राजागुरु – शासन व्यवस्था के स्वामीसेनाधिपतिचन्द्र – रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
मन्त्रीमंगल – नीतियों एवं प्रशासन के स्वामीधान्याधिपतिबुध – रबी की फसलों के स्वामी
सस्याधिपतिगुरु – खरीफ की फसलों के स्वामीमेघाधिपतिचन्द्र – मेघ एवं वर्षा के स्वामी
धनाधिपतिगुरु – धन एवं कोष के स्वामीनीरसाधिपतिगुरु – धातु, खनिज आदि के स्वामी
रसाधिपतिशनि – रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामीफलाधिपतिचन्द्र – फल-पुष्पादि के स्वामी
राशि तथा नक्षत्र
चन्द्र राशिमीननक्षत्र पदउत्तर भाद्रपद – 07:07 ए एम तक
सूर्य राशिमेषउत्तर भाद्रपद – 12:53 पी एम तक
सूर्य नक्षत्रकृत्तिकाउत्तर भाद्रपद – 06:37 पी एम तक
सूर्य नक्षत्र पदकृत्तिकाउत्तर भाद्रपद – 12:17 ए एम, मई 14 तक
  रेवती
ऋतु तथा अयन
द्रिक ऋतुग्रीष्मदिनमान13 घण्टे 28 मिनट्स 33 सेकण्ड्स
वैदिक ऋतुवसन्तरात्रिमान10 घण्टे 30 मिनट्स 51 सेकण्ड्स
द्रिक अयनउत्तरायणमध्याह्न12:29 पी एम
वैदिक अयनउत्तरायण  
शुभ समय
ब्रह्म मुहूर्त04:20 ए एम से 05:02 ए एमप्रातः सन्ध्या04:41 ए एम से 05:44 ए एम
अभिजित मुहूर्तकोई नहींविजय मुहूर्त02:43 पी एम से 03:37 पी एम
गोधूलि मुहूर्त07:12 पी एम से 07:33 पी एमसायाह्न सन्ध्या07:13 पी एम से 08:16 पी एम
अमृत काल07:41 पी एम से 09:13 पी एमनिशिता मुहूर्त12:07 ए एम, मई 14 से 12:49 ए एम, मई 14

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