पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, ‘हिमशिखर खबर‘ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अष्टमी, रोद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, ज्येष्ठ |आज है दुर्गाष्टमी व्रत, धूमावती जयंती|
आज अष्टमी तिथि 03:40 PM तक उपरांत नवमी | नक्षत्र उत्तर फाल्गुनी 10:22 AM तक उपरांत हस्त | व्यातीपात योग 10:30 AM तक, उसके बाद वरीयान योग | करण बव 03:40 PM तक, बाद बालव 04:05 AM तक, बाद कौलव | आज राहु काल का समय 07:26 AM – 09:07 AM है | आज चन्द्रमा कन्या राशि पर संचार करेगा |
हमारे देश में भोजन के लिए दो प्रतिनिधि शब्द हैं-दाल-रोटी। इसमें समूचा भोजन समा जाता है। कहते हैं पाचन के लिए सबसे सुविधाजनक भोजन यही है। बाकी डिश तो फिर इनका विस्तार हैं। पाचन शक्ति अच्छी होनी भी चाहिए। अब हम एक भोजन और करने लगे हैं आजकल, और वह है क्रोध।
कम लोग जानते हैं कि क्रोध का असर मन ही नहीं, पाचन स्तर पर भी होता है। क्रोध से न्यूरो-हार्मोनल सिस्टम तो आहत होता ही है, पेट भी खराब हो सकता है। जब कभी क्रोध आए तो विचार करना इसके पीछे अनुशासन है या अहंकार। क्रोध को लेकर अपनी इमेज-मेकिंग न करें।
कभी-कभी क्रोध करने वाले को लगता है मेरी ऊंचाई अधिक होगी, लोग मुझे पहचानेंगे, मैं अलग चरित्र बन जाऊंगा। ऐसा न किया जाए। क्रोध पूरे जीवन को आहत करता है और जीवन से बड़ा कुछ होता नहीं है। क्रोध गिराना हो तो डाइजेशन सिस्टम अच्छा रखें। भोजन के रूप में क्षमा दाल है और धैर्य रोटी है। यह दाल-रोटी खाते रहें तो क्रोध हाजमा नहीं बिगाड़ेगा।
जीवन बहुत कम समय की यात्रा है, इसे उन्ही लोगो के साथ जीना जो आपकी परवाह करे , आपका ख्याल रखें , आपका सदा हित चाहें, आपको ग़लतियाँ करने से रोकने का प्रयास करें ,, आपको सुख भी दें और सम्मान भी।
आज का भगवद् चिन्तन
विवेकी बनें
किसी भी वस्तु अथवा पदार्थ के उपयोग में विवेक की अहम भूमिका होती है। विष की अल्प मात्रा भी दवा का काम करती है और दवा की अत्यधिक मात्रा भी विष बन जाती है। विवेक से, संयम से जगत का भोग किया जाये तो कहीं समस्या नहीं है। पदार्थों में समस्या नहीं है, हमारे उपयोग करने में समस्या है। संसार का विरोध करके कोई इससे मुक्त नहीं हुआ, बोध से ही इससे ज्ञानीजनों ने पार पाया है।
संसार को छोड़ना नहीं, बस समझना है। परमात्मा ने पेड़-पौधे, फल-फूल, नदी – वन, पर्वत – झरने और न जाने क्या-क्या हमारे लिए बनाया है। अस्तित्व में निरर्थक कुछ भी नहीं है। यहाँ प्रत्येक वस्तु का अपना महत्व है बस कब, कैसे, कहाँ, क्यों और किस निमित्त उसका उपयोग करना है, इतना विवेक जागृत हो जाए। विवेकपूर्वक भोग करना ही संसार के अनेक रोगों से बच जाना भी है।