आज का पंचांग : विवेक द्वारा स्वयं को जानना है

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.

आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, ज्येष्ठ.

आज द्वादशी तिथि 02:04 AM तक उपरांत त्रयोदशी. नक्षत्र कृत्तिका 11:03 AM तक उपरांत रोहिणी. गण्ड योग 12:05 AM तक, उसके बाद वृद्धि योग. करण कौलव 03:46 PM तक, बाद तैतिल 02:04 AM तक, बाद गर. आज राहु काल का समय 09:12 AM – 10:52 AM है. आज चन्द्रमा वृषभ राशि पर संचार करेगा.

विवेक द्वारा स्वयं को जानना है


मनुष्यों को जानने, मानने और करने की तीन शक्तियाँ मिली हुई है। मानने की शक्ति भगवान् को मानने में, जानने की शक्ति स्वयं को और संसार को जानने में और करने की शक्ति संसार की सेवा में करने में लगानी है। जिसके बारे में कुछ नहीं जानते, वह मानने का विषय होता है, तो ईश्वर मानने का विषय है, भगवान् को जान नहीं सकते, मानना ही पड़ता है। संसार के बारे में जानते तो हैं, लेकिन ठीक नहीं जानते हैं, शरीर-संसार है अलग तरह का और मानते अलग तरह का है, तो संसार जानने का विषय है। ऐसे ही स्वयं के बारे में भी पूरा नहीं जानते हैं, तो स्वयं (स्वरूप) भी जानने का विषय है। मैं शरीर हूँ, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ हूँ, बदलने वाला हूँ अथवा नहीं बदलने वाला हूँ, शरीर के साथ मेरी एकता है, या स्वयं प्रकृति से अतीत हूँ— ऐसे गहरे उतर कर स्वयं को जानना चाहिए।


छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥’ पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश— इन पाँच तत्त्वों से बना हुआ संसार है और अपना कहलाने वाला शरीर भी पंचभौतिक है, तो शरीर की एकता संसार के साथ है और स्वयं की एकता परमात्मा के साथ है। मैं जो बालकपन में था, वही मैं आज हूँ, लेकिन शरीर पहले वाला नहीं रहा, शरीर तो पूरा ही बदल गया, तो बदलने वाले शरीर की एकता बदलने वाले संसार के साथ है और नहीं बदलने वाले स्वयं की एकता, कभी नहीं बदलने वाले परमात्मा के साथ है, शरीर के साथ मेरी एकता कैसे हो सकती है— यह जानने का विषय है। मेरा है तो पूरा संसार ही मेरा है और मेरा नहीं है तो शरीर भी मेरा नहीं है— यह खास जानने की बात है।

शरीर को हम जैसा चाहें, वैसा रख नहीं सकते हैं, जितने दिन रखना चाहें, उतने दिन नहीं रख सकते, तो शरीर पर अपना अधिपत्य नहीं करें। दूसरी भूल यह होती है कि संसार मेरे काम आ जाय, मेरा आदर हो, मेरी प्रशंसा हो, मेरे को आराम मिले, वस्तुएं भी मुझे मिले, मेरा लाभ हो जाय— ऐसे संसार से लेने-ही लेने का भाव रहेगा, तो बन्धन कभी मिटेगा ही नहीं और शरीर को संसार की सेवा में लगा दिया, तो बन्धन रह सकेगा नहीं। संसार शरीर के लिए नहीं है, शरीर संसार के लिए है। भारतवर्ष की संस्कृति तो स्पष्टत: ऐसा मानती है कि शरीर के मरने पर भी शरीर वाला रहता है, इसीलिए हम अपने पितरों को पिण्ड-पानी इत्यादि देते हैं।


हमारे पास जो भी रुपये- पैसे, बल-बुद्धि, योग्यता आदि हैं, ये सब संसार से मिले हैं और संसार के ही काम आते हैं। एक मार्मिक बात है कि शरीर हमारे कुछ भी काम नहीं आता है, शरीर में अहंता-ममता का त्याग ही हमारे काम आता है; शरीर के आश्रय के त्याग के लिए यह बात बहुत श्रेष्ठ है। संसार सागर है, यहाँ लेने की इच्छा रही, तो डूब जाएंगे और देते-ही-देते रहे तो तर जाएंगे। भगवान् की चीज भगवान् को दे दी और संसार की चीज संसार को दे दी, तो आनन्द हो जाएगा; सत्संग में स्वभाव ही बदलना है। किसी को बुरा नहीं समझना, बुरा नहीं सोचना और बुरा नहीं करना— तो मनुष्य जन्म सफल हो जाएगा।


प्रभात चिंतन

आकारश्छाद्यमानोऽपि
न शक्यो विनिगूहितुम्।
बलाद्धि विवृणोत्येव
भावमन्तर्गतं नृणाम्।।
(वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड – १७/६४)

भावार्थ:- कोई अपने आकार को कितना भी छिपाए, उसके भीतर का भाव कभी छिप नहीं सकता। बाहर का आकार पुरुषों के आन्तरिक भाव को बलात् प्रकट कर देता है।

योगिनी एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर ने पूछा : वासुदेव ! आषाढ़ के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है? कृपया उसका वर्णन कीजिये।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : नृपश्रेष्ठ ! आषाढ़ माह के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘योगिनी’ है। यह बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है। संसारसागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए यह सनातन नौका के समान है।

अलकापुरी के राजाधिराज कुबेर सदा भगवान शिव की भक्ति में तत्पर रहनेवाले हैं। उनका ‘हेममाली’ नामक एक यक्ष सेवक था, जो पूजा के लिए फूल लाया करता था। हेममाली की पत्नी का नाम ‘विशालाक्षी’था।

वह यक्ष कामपाश में आबद्ध होकर सदा अपनी पत्नी में आसक्त रहता था। एक दिन हेममाली मानसरोवर से फूल लाकर अपने घर में ही ठहर गया और पत्नी के प्रेमपाश में खोया रह गया, अत: कुबेर के भवन में न जा सका।

इधर कुबेर मन्दिर में बैठकर शिव का पूजन कर रहे थे। उन्होंने दोपहर तक फूल आने की प्रतीक्षा की। जब पूजा का समय व्यतीत हो गया तो यक्षराज ने कुपित होकर सेवकों से कहा ‘यक्षों ! दुरात्मा हेममाली क्यों नहीं आ रहा है ?

यक्षों ने कहा: राजन् ! वह तो पत्नी की कामना में आसक्त हो घर में ही रमण कर रहा है।

 यह सुनकर कुबेर क्रोध से भर गये और तुरन्त ही हेममाली को बुलवाया। वह आकर कुबेर के सामने खड़ा हो गया। उसे देखकर कुबेर बोले : ‘ओ पापी ! अरे दुष्ट ! ओ दुराचारी ! तूने भगवान की अवहेलना की है, अत: कोढ़ से युक्त और अपनी उस प्रियतमा से वियुक्त होकर इस स्थान से भ्रष्ट होकर अन्यत्र चला जा।

कुबेर के ऐसा कहने पर वह उस स्थान से नीचे गिर गया। कोढ़ से सारा शरीर पीड़ित था परन्तु शिव पूजा के प्रभाव से उसकी स्मरणशक्ति लुप्त नहीं हुई। तदनन्तर वह पर्वतों में श्रेष्ठ मेरुगिरि के शिखर पर गया। वहाँ पर मुनिवर मार्कण्डेयजी का उसे दर्शन हुआ। पापकर्मा यक्ष ने मुनि के चरणों में प्रणाम किया। मुनिवर मार्कण्डेय ने उसे भय से काँपते देख कहा : ‘तुझे कोढ़ के रोग ने कैसे दबा लिया ?

यक्ष बोला : मुने ! मैं कुबेर का अनुचर हेममाली हूँ। मैं प्रतिदिन मानसरोवर से फूल लाकर शिव पूजा के समय कुबेर को दिया करता था। एक दिन पत्नी सहवास के सुख में फँस जाने के कारण मुझे समय का ज्ञान ही नहीं रहा, अत: राजाधिराज कुबेर ने कुपित होकर मुझे शाप दे दिया, जिससे मैं कोढ़ से आक्रान्त होकर अपनी प्रियतमा से बिछुड़ गया।

मुनिश्रेष्ठ ! संतों का चित्त स्वभावत: परोपकार में लगा रहता है, यह जानकर मुझ अपराधी को कर्त्तव्य का उपदेश दीजिये।

मार्कण्डेयजी ने कहा: तुमने यहाँ सच्ची बात कही है, इसलिए मैं तुम्हें कल्याणप्रद व्रत का उपदेश करता हूँ। तुम आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से तुम्हारा कोढ़ निश्चय ही दूर हो जायेगा।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: राजन् ! मार्कण्डेयजी के उपदेश से उसने ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत किया, जिससे उसके शरीर को कोढ़ दूर हो गया। उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान करने पर वह पूर्ण सुखी हो गया।

नृपश्रेष्ठ ! यह ‘योगिनी’ का व्रत ऐसा पुण्यशाली है कि अठ्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल मिलता है, वही फल ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत करनेवाले मनुष्य को मिलता है।

*‘योगिनी’ महान पापों को शान्त करनेवाली और महान पुण्य फल देनेवाली है। इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

एकादशी महारानी की जय

आज का विचार

जीवन में सपनों के लिए कभी अपनों से दूर नहीं होना। क्योंकि, जीवन मे अपनों के बिना सपनों का कोई मोल नहीं होता.!