सुप्रभातम : एक अदृश्य ग्रंथ का रहस्य

“जिस पृष्ठ को मने कभी देखा ही नहीं,
संभव है
हमारा पूरा जीवन उसी पर लिखा जा रहा हो।”

कहा जाता है कि सृष्टि के आरंभ से कहीं एक ऐसा अदृश्य ग्रंथ खुला हुआ है, जिसके न पृष्ठ दिखाई देते हैं, न अक्षर पढ़े जा सकते हैं और न उसका कोई ज्ञात लेखक है।

फिर भी उसमें सब कुछ लिखा है।

किसी के लिए बढ़ाया गया करुणा का हाथ, किसी की आँखों से गिरा हुआ आँसू, किसी अजनबी के जीवन में जलाया गया छोटा-सा दीप और वह पीड़ा भी, जिसे मनुष्य संसार से छिपाकर अपने भीतर सह लेता है।

शायद उस ग्रंथ में घटनाएँ नहीं, उनके पीछे छिपे भाव अंकित होते हैं।

मनुष्य केवल वही याद रखता है, जिसे वह महत्वपूर्ण समझता है। प्रकृति के लिए शायद कोई भी भाव इतना छोटा नहीं कि उसे भुला दिया जाए।

हम किसी घटना को समाप्त मानकर आगे बढ़ जाते हैं, जबकि संभव है कि अस्तित्व के किसी अदृश्य स्तर पर उसी क्षण किसी दूसरी यात्रा का आरंभ हो चुका हो।

इसीलिए जीवन में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घटती हैं, जिनका उत्तर वर्तमान में खोजने पर नहीं मिलता।

कोई व्यक्ति अचानक हमारे जीवन में क्यों आता है?
कोई मार्ग ठीक उसी काल में क्यों बंद हो जाता है, जब उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है?
वर्षों से बंद कोई द्वार अचानक क्यों खुल जाता है?
और कभी कोई अनदेखी शक्ति हमें ऐसे संकट से क्यों निकाल लेती है, जहाँ बचने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता?

क्या यह सब केवल संयोग है?

या उस अदृश्य ग्रंथ के किसी पुराने पृष्ठ पर इन घटनाओं की भूमिका बहुत पहले लिखी जा चुकी होती है?

शायद यही कर्म का रहस्य है।

मनुष्य टाइम को बीते हुए और आने वाले क्षणों में बाँटता है; प्रकृति शायद कर्म को उसकी पूर्णता से देखती है। हमारे लिए जो बीत चुका है, वह उसके लिए केवल एक अधूरा अध्याय हो सकता है।

मिट्टी में दबा बीज ऊपर से मृत दिखाई देता है, पर उसके भीतर एक पूरा वृक्ष सोया रहता है। उसे केवल अपनी ऋतु की प्रतीक्षा होती है।

कर्म भी शायद ऐसे ही होते हैं।

कुछ तुरंत फलते हैं, कुछ समय लेते हैं और कुछ इतनी गहराई में उतर जाते हैं कि उनके लौटने के लिए वर्षों की प्रतीक्षा भी कम पड़ जाए।

लेकिन वे नष्ट नहीं होते।

वे अपने समय की प्रतीक्षा करते हैं।

इसलिए किसी के लिए की गई छोटी-सी भलाई को कभी छोटा मत समझना। संभव है तुमने सहायता करके उसे उसी क्षण भूल दिया हो और जिसे सहायता मिली, वह भी तुम्हें कभी याद न रखे।

लेकिन कर्म का मूल्य स्मृति पर निर्भर नहीं होता।

प्रकृति बाहरी आकार से अधिक नीयत की गहराई देखती है।

एक छोटा-सा दीपक भी अंधकार को चुनौती देता है। उसी प्रकार एक निष्काम कर्म, चाहे संसार की दृष्टि में कितना ही छोटा क्यों न हो, किसी जीवन में ऐसी रोशनी छोड़ सकता है जिसकी यात्रा तुम्हारी कल्पना से कहीं आगे तक जाए।

शायद इसी कारण निष्काम कर्म इतना विलक्षण है।

जिस भलाई के पीछे प्रतिफल की इच्छा नहीं होती, वही सबसे निर्मल होती है।

इसलिए अपने पुण्यों का बहीखाता लेकर मत चलो।

जिस क्षण तुम कहते हो—

“मैंने किया।”

उसी क्षण अहंकार उस कर्म पर अपना नाम लिखना शुरू कर देता है।

जबकि सत्य इससे कहीं अधिक सूक्ष्म है।

तुम केवल माध्यम थे।

किसी की सहायता करने की शक्ति मिली—यह भी कृपा थी।
किसी के आँसू पोंछने का अवसर मिला—यह भी सौभाग्य था।
किसी के अंधकार में प्रकाश बनने का अवसर मिला—यह भी किसी बड़े विधान का हिस्सा था।

फिर उस कर्म पर अधिकार कैसा?

कर्म तुम्हारे हाथ में था; फल कभी तुम्हारे हाथ में नहीं था।

तुम बीज बो सकते हो, ऋतु नहीं बना सकते।
दीप जला सकते हो, उसकी रोशनी की यात्रा तय नहीं कर सकते।
प्रेम दे सकते हो, उसके लौटने का समय निर्धारित नहीं कर सकते।

फल का विधान प्रकृति के पास सुरक्षित है।

और प्रकृति जल्दबाज़ी नहीं करती।

वह देखती है, सहेजती है और समय आने पर वही लौटाती है, जो कभी हमारे भीतर से निकला था।

कभी किसी व्यक्ति के रूप में।

कभी किसी अवसर के रूप में।

कभी किसी संकट से मिली मुक्ति के रूप में।

और कभी ऐसी शांति के रूप में, जिसका कोई बाहरी कारण दिखाई नहीं देता।

तब मनुष्य चकित होकर पूछता है—

“यह अचानक कैसे हो गया?”

और शायद प्रकृति मौन मुस्कान के साथ उत्तर देती है—

“अचानक नहीं।
तुम्हें केवल आज दिखाई दिया है।
मैं इसे बहुत पहले से सँभालकर रखे हुए थी।”

यही कारण है कि भलाई करो और उसे भूल जाओ।

किसी के जीवन में प्रकाश बनो, पर उस प्रकाश का श्रेय मत माँगो।

किसी का हाथ थामो, पर यह अपेक्षा मत रखो कि वह जीवन भर तुम्हारा नाम याद रखे।

नदी अपना जल देकर आगे बढ़ जाती है। वह यह नहीं पूछती कि उसकी कौन-सी बूँद किस प्यासे तक पहुँची।

यही निष्कामता है—देना और अपने देने की स्मृति से भी मुक्त हो जाना।

मनुष्य अपने कर्मों का लेखा रख सकता है, परिणाम का निर्णय नहीं।

क्योंकि प्रकृति का लेखा मनुष्य के बहीखाते जैसा नहीं, जहाँ पृष्ठ पलटे जा सकें और हिसाब बंद किया जा सके।

वहाँ कुछ मिटता नहीं।

कर्ता भूल सकता है—कर्म नहीं।

इसलिए जब जीवन में कोई अनपेक्षित सुख मिले, तो उसे केवल भाग्य मत कहना।

जब कोई अनजान हाथ कठिन समय में तुम्हारा सहारा बने, तो उसे केवल संयोग मत समझना।

और जब कोई बंद द्वार अचानक खुल जाए, तो एक क्षण ठहरकर उस पुराने कर्म को याद करना, जिसे शायद तुम स्वयं कब का भूल चुके हो।

संभव है वह लौटकर आया हो—

किसी व्यक्ति के रूप में,
किसी अवसर के रूप में,
किसी रक्षा के रूप में,
किसी कृपा के रूप में।

तब शायद तुम्हें उस अदृश्य ग्रंथ का एक पृष्ठ पहली बार दिखाई दे।

उस पर तुम्हारा नाम नहीं होगा।

तुम्हारा कर्म लिखा होगा।

और तब समझ आएगा—

इस संसार में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।

न प्रेम।
न करुणा।
न प्रार्थना।
न निष्काम कर्म।

जो दिया गया है, वह किसी न किसी रूप में अपनी यात्रा पूरी करता है।

और जिसे तुम भूल चुके हो—

प्रकृति ने उसे अब भी सँभालकर रखा है।

क्योंकि उस अदृश्य ग्रंथ का सबसे गहरा नियम शायद यही है—

“मनुष्य कर्ता को भूल सकता है,
प्रकृति कर्म को नहीं।”

प्रकृति सब याद रखती है।