पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
भाद्रपद शुक्ल पक्ष त्रयोदशी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद. आज है प्रदोष व्रत.
आज त्रयोदशी तिथि 11:18 PM तक उपरांत चतुर्दशी. नक्षत्र धनिष्ठा 10:35 AM तक उपरांत शतभिषा. धृति योग 03:54 PM तक, उसके बाद शूल योग. करण कौलव 11:09 AM तक, बाद तैतिल 11:18 PM तक, बाद गर. आज राहु काल का समय 01:48 PM – 03:18 PM है. आज चन्द्रमा कुंभ राशि पर संचार करेगा.
भक्ति का वह स्वाद, जो दिखाई नहीं देता
कभी आपने सोचा है—मनुष्य के भीतर जो अच्छा है, वह अचानक कम क्यों होने लगता है?
जिस सुख के लिए उसने वर्षों तप किया, वही एक दिन हाथ से रेत की तरह फिसल जाता है। जिस गुण पर उसे गर्व था, उसी गुण के पीछे कभी अहंकार खड़ा हो जाता है। और कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि सद्गुणों से भरा जीवन बाहर से वैसा ही दिखाई देता रहता है, लेकिन भीतर से उसका स्वाद कहीं खो चुका होता है।
शायद इसलिए कि गुणों को भी एक अदृश्य आधार चाहिए और सुखों को भी एक अदृश्य स्वाद।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस रहस्य को बहुत सहज शब्दों में कह दिया—
“भगति हीन गुन सब सुख ऐसे।
लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥”
भक्ति से रहित गुण और सुख उस भोजन के समान हैं, जिसमें व्यंजनों की कमी नहीं, लेकिन नमक नहीं है।
नमक दिखाई नहीं देता।
फिर भी उसके बिना स्वाद अधूरा है।
यही तो भक्ति का रहस्य है।
भक्ति दिखाई नहीं देती, लेकिन जीवन का स्वाद बदल देती है।
धन दिखाई देता है, पद दिखाई देता है, प्रतिष्ठा दिखाई देती है, ज्ञान दिखाई देता है, उपलब्धियां दिखाई देती हैं; लेकिन इनके भीतर जो संतोष है, जो करुणा है, जो विनम्रता है—वह दिखाई नहीं देती। शायद वही भक्ति का स्पर्श है।
और जिस दिन भक्ति प्रदर्शन बन जाती है, उसी दिन उसके भीतर का रहस्य टूटने लगता है।
फिर हम परमात्मा से जुड़ने के लिए नहीं, दूसरों को अपना परमात्मा से जुड़ना दिखाने के लिए भक्ति करने लगते हैं। पूजा बढ़ती जाती है, लेकिन भीतर की शांति घटती जाती है। कर्मकांड बढ़ता है, लेकिन करुणा कम होती जाती है।
इसलिए भक्ति को थोड़ा रहस्य ही रहने दीजिए।
हर प्रार्थना को बताने की आवश्यकता नहीं।
हर दान को दिखाने की आवश्यकता नहीं।
हर साधना को घोषित करने की आवश्यकता नहीं।
कुछ बातें मनुष्य और परमात्मा के बीच रहने दीजिए।
क्योंकि जिस प्रेम को प्रमाण की आवश्यकता पड़ जाए, उसके भीतर अभी कुछ दूरी बाकी है।
सच्ची भक्ति शायद वहीं से शुरू होती है, जहाँ प्रदर्शन समाप्त होता है।
और तब एक और रहस्य खुलता है—
परमात्मा ने आपको जो दिया है, वह केवल आपके लिए नहीं दिया।
आपके पास ज्ञान है तो किसी के अंधकार में थोड़ा प्रकाश रखिए।
आपके पास सुख है तो किसी दुखी के जीवन में थोड़ा सुख बाँटिए।
आपके पास सामर्थ्य है तो किसी निर्बल का हाथ थामिए।
आपके पास धन है तो किसी आवश्यकता को पूरा कीजिए।
आपके पास समय है तो किसी अकेले मनुष्य को अपना समय दीजिए।
इसे दान मत समझिए।
यह तो उस अदृश्य कृपा का प्रवाह है, जो आपके भीतर से होकर किसी और तक पहुँच रही है।
शायद इसी को भक्ति कहते हैं।
भक्ति मंदिर में सिर झुकाने से शुरू हो सकती है, लेकिन उसकी पूर्णता तब होती है जब वही झुका हुआ सिर किसी मनुष्य के दुःख के सामने भी विनम्र हो जाए।
तब गुण केवल गुण नहीं रहते—उनमें करुणा का स्वाद आ जाता है।
तब सुख केवल सुख नहीं रहता—उसमें संतोष का स्वाद आ जाता है।
और तब जीवन केवल जीवन नहीं रहता—वह प्रसाद बन जाता है।
इसलिए अपने सुखों की रक्षा कीजिए, अपने गुणों की रक्षा कीजिए; लेकिन उनसे भी अधिक अपनी भक्ति की रक्षा कीजिए।
क्योंकि हो सकता है कि कल आपके पास वही सुख न रहे, वही पद न रहे, वही यश न रहे, वही सामर्थ्य न रहे।
लेकिन यदि भीतर भक्ति बची रही, तो जो चला गया उसका शोक कम होगा और जो बचा है उसका स्वाद बना रहेगा।
शायद जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यही है—
परमात्मा हमें बहुत कुछ देकर भी दिखाई नहीं देता,
और हम जो कुछ दूसरों को देकर लौटते हैं,
वहीं कहीं वह दिखाई देने लगता है।