पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है
आज (शुक्रवार, 19 दिसंबर) पौष मास की अमावस्या है। शुक्रवार को पूरे दिन ये तिथि होने से अमावस्या से जुड़े धर्म-कर्म आज ही किए जाएंगे। पौष अमावस्या पर पूजा-पाठ, पितृ तर्पण, स्नान-दान, ग्रह शांति जैसे शुभकाम जरूर करना चाहिए।
अमावस्या तिथि का संबंध मुख्य रूप से पितरों से है। घर-परिवार के मृत सदस्यों को पितर माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य से कुटुंब के पितर देवताओं को तृप्ति मिलती है। जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष है, उन्हें अमावस्या तिथि पर पितरों के लिए धर्म-कर्म करने की सलाह दी जाती है।
पौष अमावस्या पर गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, शिप्रा जैसी पवित्र नदी में स्नान करने से जाने-अनजाने में किए गए पाप कर्मों के फल नष्ट होते हैं। यदि नदी में स्नान करना संभव न हो, तो घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। स्नान करते समय सभी पवित्र नदियों का और तीर्थों का ध्यान करना चाहिए।
ज्योतिष में अमावस्या तिथि का संबंध सूर्य और चंद्रमा से है। इस दिन ये दोनों ग्रह एक ही राशि में होते हैं। इस समय चंद्र और सूर्य धनु राशि में स्थित हैं। अमावस्या पर चंद्रमा पूर्ण रूप से अदृश्य हो जाता है, चंद्र की इस कला को अमा कहते हैं। मान्यता है कि अमा कला में चंद्र की सभी 16 कलाओं की शक्तियां होती हैं, इसलिए अमावस्या तिथि पर चंद्रदेव की विशेष पूजा करनी चाहिए। चंद्र देव की प्रतिमा न हो तो शिवलिंग पर स्थापित चंद्रदेव की पूजा की जा सकती है।
चंद्रमा मन, भावनाओं और माता का कारक ग्रह है। अमावस्या पर चंद्र की पूजा करने से मन शांत होता है, हमारी भावनाएं नियंत्रित रहती हैं और माता से सुख प्राप्त होता है। इस दिन सूर्यदेव की भी पूजा करनी चाहिए। सूर्य पूजा से आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होती है और मान-सम्मान मिलता है। पौष अमावस्या पर किए गए दान-पुण्य, तप, जप और सेवा से पितरों के साथ ही सूर्यदेव और चंद्रदेव की कृपा भी मिलती है।
पौष अमावस्या पर करें ये शुभ काम
इस दिन स्नान के बाद जरूरतमंद लोगों को काले तिल, कंबल, वस्त्र, अन्न, चावल, गेहूं, गुड़, तेल, लोहे की वस्तुएं खासतौर पर दान करना चाहिए।
पितरों के लिए जल, तिल और कुशा से तर्पण करना चाहिए। दोपहर में कंडे जलाकर पितरों का ध्यान करते हुए गुड़-घी अर्पित करें। इस तरह धूप-ध्यान करने से पितर देव तृप्त होते हैं।
इस तिथि पर कई साधक मौन व्रत रखते हैं या कम बोलने का संकल्प लेते हैं। ऐसा करने से मन की चंचलता शांत होती है। नकारात्मक विचार दूर होते हैं और सोचने-समझने की शक्ति बढ़ती है।
आज का भगवद् चिंतन
सहयोग की भावना
परस्पर सहयोग की भावना ही जीवन यात्रा को सुगम एवं सुखद बनाती है। जो हाथ दूसरों के सहयोग के लिए आगे नहीं बढ़ते हैं, समय आने पर उनके सहयोग के लिए दूसरों के कदम भी पीछे हट जाते हैं। सहयोग देने की भावना ही किसी को सहयोग लेने का अधिकारी भी बनाती है। जीवन का एक साधारण सा नियम यह भी है, कि जो सहयोगी नहीं, वह उपयोगी भी नहीं। जो सहयोगी बनता है, उसी का जीवन उपयोगी भी बन जाता है।
जीवन में सब कुछ एक निवेश की तरह ही होता है। प्रेम, समय, साथ, खुशी, सम्मान और अपमान। जितना-जितना हम ये सब दूसरों को देते जायेंगे, समय आने पर एक दिन वह अवश्य ही हमें भी व्याज सहित वापस मिलने वाला है। देवी द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण को एक बार एक छोटे से चीर का दान किया था और आवश्यकता पड़ने पर विधि द्वारा वही चीर देवी द्रौपदी को साड़ियों के भंडार के रूप में लौटाया गया।