आज का पंचांग : बेहद जरुरी है श्राद्धकर्म, जानिए घर पर ही श्राद्ध और तर्पण करने की विधि

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।

आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, भाद्रपद |आज है महालय श्राद्घ पक्ष और प्रतिपदा श्राद्ध|

आज प्रतिपदा तिथि 09:12 PM तक उपरांत द्वितीया | नक्षत्र पूर्वभाद्रपदा 08:02 PM तक उपरांत उत्तरभाद्रपदा | धृति योग 06:30 AM तक, उसके बाद शूल योग 03:20 AM तक, उसके बाद गण्ड योग | करण बालव 10:28 AM तक, बाद कौलव 09:12 PM तक, बाद तैतिल | आज राहु काल का समय 07:47 AM – 09:19 AM है | आज 02:29 PM तक चन्द्रमा कुंभ उपरांत मीन राशि पर संचार करेगा |

आज (8 सितंबर) पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि है। पितरों को याद करने का ये उत्सव 21 सितंबर (सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या) तक चलेगा। पितृ पक्ष में पितरों के निमित्त श्राद्ध, धूप-ध्यान, पिंडदान, तर्पण आदि धर्म-कर्म करने की परंपरा है।

घर-परिवार के मृत सदस्य होते हैं पितर देव

घर-परिवार के मृत सदस्यों को पितर देव कहा जाता है। पितृ पक्ष में पूरे कुटुंब के मृत सदस्यों को याद करके श्राद्ध कर्म करना चाहिए। श्रीमद् भगवद्गीता के 10वें अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि नागों में शेषनाग और जल-जंतुओं का अधिपति वरुण मैं ही हूं। पितरों में अर्यमा और शासन करने वालों में यमराज मैं ही हूं।

अर्यमा पितरों के राजा का नाम है। अर्यमा ऋषि कश्यप और अदिति के तीसरे पुत्र हैं। यमराज मृत्यु के देवता हैं। पितृ पक्ष में अर्यमा पितर देव की पूजा की जाती है। एक मान्यता ये है कि सबसे पहले ब्रह्मा जी के पीठ से पितर देव उत्पन्न हुए थे।

घर पर ही श्राद्ध और तर्पण करने की विधि

श्राद्ध करने की तिथि पर सुबह जल्दी उठें और नहाने के बाद पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध और दान करने का संकल्प लें।

दोपहर में करीब 12 बजे दक्षिण दिशा में मुंह करके बाएं पैर को मोड़कर, घुटने को जमीन पर टिका कर बैठें।

तांबे के चौड़े बर्तन में जौ, तिल, चावल गाय का कच्चा दूध, गंगाजल, सफेद फूल और पानी डालें।

हाथ में कुशा घास रखें और उस जल को हाथों में भरकर सीधे हाथ के अंगूठे से उसी बर्तन में गिराएं। इस तरह 11 बार पितरों का ध्यान करते हुए तर्पण करें।

गाय के गोबर से बना कंडा जलाएं। कंडों से जब धुआं निकलना बंद हो जाए, तब अंगारों पर गुड़, घी और थोड़ी-थोड़ी खीर-पूरी अर्पित करें।

हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर से पितरों का ध्यान करते हुए जमीन पर अर्पित करें।

इसके बाद देवता, गाय, कुत्ते, कौए और चींटी के लिए अलग से भोजन निकाल लें।

जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं। दान-दक्षिणा दें।

कुतुप काल में करना चाहिए श्राद्ध कर्म

श्राद्ध करने के लिए दोपहर में करीब 12 बजे का समय सबसे अच्छा रहता है, इसे कुतुप काल कहते हैं। सुबह और शाम का समय देवी-देवताओं की पूजा के लिए श्रेष्ठ रहता है।

  1. विक्रम संवत – 2082, सिद्धार्थ
  2. शक सम्वत – 1947, विश्वावसु
  3. पूर्णिमांत – आश्विन
  4. अमांत – भाद्रपद

तिथि

  1. कृष्ण पक्ष प्रतिपदा   – Sep 07 11:38 PM – Sep 08 09:12 PM
  2. कृष्ण पक्ष द्वितीया   – Sep 08 09:12 PM – Sep 09 06:29 PM

नक्षत्र

  1. पूर्वभाद्रपदा – Sep 07 09:41 PM – Sep 08 08:02 PM
  2. उत्तरभाद्रपदा – Sep 08 08:02 PM – Sep 09 06:07 PM

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *