आज का पंचांग : अध्यात्म की आवश्यकता क्यों है

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है

अध्यात्म – अधि व आत्मन् शब्द से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है- आत्मा का अध्ययन एवं उत्थान। आत्मा अर्थात स्व या अपना समग्र अस्तित्व। इस तरह अध्यात्म जीवन को अपनी समग्रता में जानने का प्रयास है। इसका शुभारंभ स्वयं से होता है, जब अपना अस्तित्व ही सबसे बड़ी पहेली बन जाए और समाधान माँगे; यथा- मैं क्या हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरा लक्ष्य क्या है, धरती पर मेरा प्रयोजन क्या है, क्या रोज काल-कवलित हो रहे अनगिनत लोगों, प्राणियों एवं आत्मीय जनों की भाँति मेरा भी ऐसा ही अवसान होगा-जिसका कोई निष्कर्ष नहीं।

इन प्रश्नों की गहरी खोज व्यक्ति को जाने-अनजाने में आध्यात्मिक पथ का राही बना देती है। जहाँ खड़े हों, वहीं से अस्तित्व को मथते प्रश्नों के उत्तर की खोज प्रारंभहो जाती है। कोई आध्यात्मिक पुस्तक या इसके पन्ने या लेख हाथ लग जाएँ, इन्हीं को पढ़ते-पढ़ते समाधान की दिशा में कदम बढ़ चलते हैं। आध्यात्मिक ग्रंथों का पाठ-पारायण प्रारंभ हो जाता है। इनका पारायण करते-करते कुछ समाधान मिलते हैं, जीवन की कुछ बुनियादी बातें समझ आना शुरू होती हैं, लेकिन किसी प्रकाशित आध्यात्मिक व्यक्ति या गुरु की आवश्यकता अनुभव होती है, जहाँ प्रत्यक्ष आध्यात्मिक सत्य की एक झलक एवं मार्गदर्शन मिल सके।

अध्यात्म की आवश्यकता सामान्यतया समझ नहीं आती। जब सब ठीक चल रहा होता है, परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं या जीवन एक बेहोशी भरे प्रवाह के संग बह रहा होता है तो ऐसे में अस्तित्व के प्रश्न भी सोए अलसाए होते हैं; यदि कुछ होते भी हैं तो वे उस गहराई से नहीं कौंधते, जहाँ से अध्यात्म तत्त्व जीवन में प्रविष्ट होता हो, लेकिन जीवन को है झकझोरते अनुभवों के बीच जब वर्तमान से घोर असंतोष पनपता है, जीवन व अस्तित्व को नए सिरे से परिभाषित एवं निर्धारित करने की आवश्यकता अनुभव होती है, तो अध्यात्म का प्राकट्य होता है जिसके केंद्र में हमारा अस्तित्व महाप्रश्न बनकर खड़ा होता है, जो अपना समाधान माँगता है।

आज तो मनोवैज्ञानिक भी अध्यात्म को जीवन की व एक आवश्यकता घोषित कर चुके हैं। उनके अनुसार अध्यात्म जीवन की एक मेटा नीड है, जिसके बिना जीवन का चरम विकास एवं उत्कर्ष अधूरा है। व्यक्ति संसार एवं समाज में कितनी ही बड़ी सफलता एवं उपलब्धि क्यों न पा ले; यदि वह स्वयं को नहीं जान पाया तो भीतर एक गहरा खालीपन, अधूरापन कचोटता रहेगा। इस खालीपन को आध्यात्मिक इच्छा को पूरा कर ही पाया जा सकता है। इस तरह समग्र रूप में व्यक्तित्व के उत्कर्ष को आधुनिक मनोविज्ञान सेल्फ एक्चुअलाइजेशन के रूप में जीवनलक्ष्य घोषित करता है। अध्यात्म के जीवन में महत्त्व को निम्न रूप में समझा जा सकता है-

(1) जब जीवन एकतरफे भौतिक विकास की चकाचौंध में उलझा हो तो इसे अध्यात्म ही संतुलन देता है, पूर्णता देता है अन्यथा एकतरफे विकास से भौतिकता के शिखर तक तो पहुँचा जा सकता है, लेकिन इसे कैसे सँभालें, इसका सही नियोजन कैसे हो, यह दृढ़ता एवं सूझ अध्यात्म ही देता है।

(2) बिना अध्यात्म के जीवन अचेतन मन के अँधेरे में खो जाता है, इसके कीचड़ में ही लथपथ होकर जीवन कके अर्थ की तलाश करता है। अध्यात्म अचेतन के पार न सुपरचेतन अर्थात जीवन की दिव्य संभावनाओं से व्यक्ति । का परिचय कराता है व उस ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त । करता है और जीवन को समग्रता से समझने व जीने का आधार देता है।

(3) व्यक्तित्व की समग्र समझ के साथ जीवन की द समग्र समझ हमें अध्यात्म ही देता है; क्योंकि जीवन के तार ने इस जन्म तक सीमित नहीं होते। जीवन अनंत प्रवाह का नाम है, जिसका एक अध्याय इस जीवन के रूप में दृश्यमान है। व अध्यात्म जन्म-जन्मांतर के कर्म जखीरे के साथ बढ़ रही न जीवनयात्रा की समझ देता है और अनंत धैर्य के साथ इसके पार निकलने की राह सुझाता है।

(4) अध्यात्म व्यक्ति को स्वतःस्फूर्त रूप में नैतिक बनाता है। यहाँ नैतिकता ओढ़ी हुई नहीं होती, बल्कि अपने विवेक के आधार पर तय होती है। किसी भी गुण के प्रति यहाँ कट्टरता का भाव नहीं रहता, बल्कि ऐसे में व्यक्ति न परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को समायोजित करता हुआ अंतर्निहित मानवीय एवं दिव्य संभावनाओं को अभिव्यक्त एवं विकसित करता है।

(5) अध्यात्म व्यक्ति को धार्मिक हठवादिता व कट्टरवादिता से बचाता है। व्यक्ति को धर्म के मर्म की समझ देकर, उसे सच्चा धार्मिक बनाता है। कर्मकांडों के महत्त्व को वह समझता है व इनकी सीमाओं को भी। इस तरह अध्यात्म – धर्म एवं नैतिकता को सम्यक रूप में अपनाता है व व्यक्ति को एक उपयोगी नागरिक बनाकर अपने पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करना सिखाता है।

(6) अध्यात्म व्यक्ति को परिवेश एवं प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाता है। इनके साथ तालमेल एवं सामंजस्य के साथ रहना सिखाता है। प्रकृति के हर घटक में वह आत्मतत्त्व को देखता है, ईश्वरीय प्रवाह को झरता हुआ अनुभव करता है। अतः प्रकृति के शोषण एवं प्रदूषण की बात तो दूर, वह इसको व इसके घटकों को किसी भी रूप में क्षति पहुँचाने की नहीं सोच सकता।

इस तरह अध्यात्म व्यक्ति को जीवन के व्यापकतम एवं गहनतम रूप में जीने की समझ देता है, जीने की कला सिखाता है। समाज, राष्ट्र एवं विश्व के एक उपयोगी घटक के रूप में अपनी भूमिका को निभाने के योग्य बनाता है। सार रूप में अध्यात्म व्यक्ति को अपनी संपूर्णता में जीने की राह दिखाता है।

पञ्चाङ्ग
तिथित्रयोदशी – 07:09 पी एम तकनक्षत्रपुष्य – 08:34 ए एम तक
चतुर्दशीअश्लेशा
योगशोभन – 02:33 पी एम तककरणकौलव – 07:54 ए एम तक
अतिगण्डतैतिल – 07:09 पी एम तक
वाररविवारगर – 06:29 ए एम, मार्च 02 तक
पक्षशुक्ल पक्षवणिज
चन्द्र मास, सम्वत एवं बृहस्पति संवत्सर
विक्रम सम्वत2082 कालयुक्तबृहस्पति संवत्सरकालयुक्त – 03:07 पी एम, अप्रैल 25, 2025 तक
शक सम्वत1947 विश्वावसुसिद्धार्थी
गुजराती सम्वत2082 पिङ्गलचन्द्रमासफाल्गुन – पूर्णिमान्त
प्रविष्टे/गते17फाल्गुन – अमान्त
राशि तथा नक्षत्र
चन्द्र राशिकर्कनक्षत्र पदपुष्य – 08:34 ए एम तक
सूर्य राशिकुम्भअश्लेशा – 02:21 पी एम तक
सूर्य नक्षत्रशतभिषाअश्लेशा – 08:10 पी एम तक
सूर्य नक्षत्र पदशतभिषा – 05:11 पी एम तकअश्लेशा – 02:00 ए एम, मार्च 02 तक
शतभिषाअश्लेशा
ऋतु तथा अयन
द्रिक ऋतुवसन्तदिनमान11 घण्टे 35 मिनट्स 35 सेकण्ड्स
वैदिक ऋतुशिशिररात्रिमान12 घण्टे 23 मिनट्स 23 सेकण्ड्स
द्रिक अयनउत्तरायणमध्याह्न12:45 पी एम
वैदिक अयनउत्तरायण  
शुभ समय
ब्रह्म मुहूर्त05:18 ए एम से 06:07 ए एमप्रातः सन्ध्या05:42 ए एम से 06:57 ए एम
अभिजित मुहूर्त12:21 पी एम से 01:08 पी एमविजय मुहूर्त02:41 पी एम से 03:27 पी एम
गोधूलि मुहूर्त06:30 पी एम से 06:55 पी एमसायाह्न सन्ध्या06:32 पी एम से 07:47 पी एम
अमृत काल06:18 ए एम, मार्च 02 से 07:51 ए एम, मार्च 02निशिता मुहूर्त12:19 ए एम, मार्च 02 से 01:09 ए एम, मार्च 02
रवि पुष्य योग06:57 ए एम से 08:34 ए एमसर्वार्थ सिद्धि योग06:57 ए एम से 08:34 ए एम
रवि योग08:34 ए एम से 06:56 ए एम, मार्च 02 

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