विदेश की हक़ीकत : जब रिश्ते भी मुद्रा में तौले जाने लगें

प्रो. पुष्पिता अवस्थी

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समृद्धि की चमक के पीछे अकेलेपन का अंधेरा

विदेश की चमचमाती सड़कों, ऊंची इमारतों, व्यवस्थित यातायात और मजबूत अर्थव्यवस्था को देखकर अक्सर हमें लगता है कि वहां जीवन हमसे कहीं अधिक सुखी और सम्पन्न है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यूरोप और पश्चिम के अनेक देशों ने विज्ञान, तकनीक, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और नागरिक सुविधाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन किसी समाज का मूल्यांकन केवल उसकी आर्थिक समृद्धि से नहीं किया जा सकता। असली सवाल यह है कि विकास की इस दौड़ में मनुष्य कितना मनुष्य बचा है?

आधुनिक पश्चिमी समाज की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता के साथ-साथ परिवार और सामुदायिक जीवन की पारंपरिक संरचनाएं कमजोर हुई हैं। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवारों ने ली, बच्चों का जीवन माता-पिता से अलग हुआ और वृद्धावस्था में अकेलापन अनेक समाजों की गंभीर सामाजिक चुनौती बन गया। इसका अर्थ यह नहीं कि वहां प्रेम, परिवार या मानवीय संवेदना समाप्त हो गई है। बल्कि प्रश्न यह है कि व्यक्तिवाद और सुविधा की संस्कृति के बीच रिश्तों को बचाए रखने की चुनौती कितनी बड़ी हो गई है।

यही वह जगह है जहां भारतीय समाज की पारंपरिक जीवन-दृष्टि हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देती है।

भारत में परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं रहा, वह भावनात्मक सुरक्षा का भी आधार रहा है। यहां मां-बाप, भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी, पड़ोसी और समुदाय—सभी मिलकर व्यक्ति के जीवन का सामाजिक संसार बनाते रहे हैं। संकट में रिश्तेदार का घर खुल जाना और दुख में पड़ोसी का साथ खड़ा हो जाना हमारी सामाजिक पूंजी रही है।

लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि इस विरासत पर गर्व करना पर्याप्त नहीं है। भारत में भी तेजी से बदलती जीवनशैली, महानगरीयकरण और आर्थिक प्रतिस्पर्धा रिश्तों को प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए विदेशों की आलोचना करने से पहले हमें अपने घर के दरवाजे पर भी दस्तक देनी होगी।

आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा संकट केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि भावनात्मक अकेलापन भी है। मनुष्य के पास साधन बढ़ रहे हैं, लेकिन संवाद घट रहा है। घर बड़े हो रहे हैं, परिवार छोटे। संपर्कों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन आत्मीयता कम हो रही है। मोबाइल में सैकड़ों संपर्क हैं, मगर संकट की घड़ी में हाथ पकड़ने वाले कितने हैं—यह अधिक महत्वपूर्ण सवाल है।

इसी अकेलेपन के बीच पश्चिमी देशों में पालतू पशुओं के प्रति बढ़ता लगाव भी सामाजिक बदलाव का एक संकेत है। कुत्ता या बिल्ली केवल पालतू पशु नहीं, अनेक लोगों के लिए साथी और भावनात्मक सहारा भी बन चुके हैं। इसे केवल रिश्तों की समाप्ति के रूप में देखना उचित नहीं होगा। बल्कि यह उस मनुष्य की जरूरत को दर्शाता है जिसे स्नेह, संगति और अपनापन चाहिए।

असल चिंता कहीं और है—जब हर संबंध को सुविधा, समय और आर्थिक मूल्य के तराजू पर तौला जाने लगे।

जब मुलाकात के लिए समय तय करना पड़े, जब बुजुर्गों का जीवन संस्थागत देखभाल पर निर्भर हो जाए और जब सेवा भी एक पेशेवर व्यवस्था में बदल जाए, तब हमें विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार करना चाहिए। अस्पताल, वृद्धाश्रम और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक हैं, लेकिन वे परिवार और समाज की आत्मीयता का विकल्प नहीं हो सकते।

प्रकृति भी मनुष्य के चरित्र और संस्कृति को गढ़ती है। जिस समाज का संबंध मिट्टी, जल, जंगल, पशु-पक्षियों और ऋतुओं से मजबूत होता है, उसकी जीवन-दृष्टि में प्रकृति के प्रति संवेदना विकसित होती है। भारत की सांस्कृतिक स्मृति में पीपल, बरगद, नीम, तुलसी, गंगा, पर्वत, नदियां और गाय केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं; वे हमारी सभ्यता के प्रतीक हैं।

इसीलिए भारत की परंपरा में प्रकृति को जीतने की नहीं, उसके साथ जीने की भावना दिखाई देती है।

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लेकिन यहां भी आत्ममुग्ध होने का कोई कारण नहीं है। जिस भारत ने वृक्षों को देवत्व दिया, वही भारत आज जंगल काटता है, नदियों को प्रदूषित करता है और शहरों को कंक्रीट में बदलता है। इसलिए पश्चिम से सीखने योग्य विज्ञान और व्यवस्था को ग्रहण करते हुए अपनी प्रकृति-केंद्रित जीवन-दृष्टि को बचाना हमारी जिम्मेदारी है।

और इस पूरी बहस के केंद्र में है—भाषा।

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं। वह किसी समाज की स्मृति, संस्कृति, संवेदना और सामूहिक चेतना की वाहक होती है। किसी समाज के शब्दों में उसके जीवन का दर्शन छिपा होता है। मां, मातृभूमि, ममता, करुणा, सेवा, त्याग, सहजीवन और लोकमंगल जैसे शब्द केवल शब्द नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की हजारों वर्षों की अनुभूति हैं।

इसलिए कहा गया—“शब्द ब्रह्म है।”

शब्द विचार बनाते हैं, विचार व्यवहार बनाते हैं और व्यवहार से संस्कृति निर्मित होती है। यदि हमारी भाषा से करुणा चली जाएगी तो समाज से करुणा भी धीरे-धीरे कम होगी। यदि हमारे शब्दों में परिवार, प्रकृति और समाज के लिए सम्मान बचा रहेगा तो हमारी संस्कृति भी जीवित रहेगी।

आज दुनिया को केवल अधिक धनवान मनुष्य की जरूरत नहीं है। उसे अधिक संवेदनशील मनुष्य चाहिए।

हमें ऐसा विकास चाहिए जिसमें अस्पताल आधुनिक हों, लेकिन घरों में बुजुर्ग अकेले न हों। तकनीक अत्याधुनिक हो, लेकिन बातचीत खत्म न हो। शहर विकसित हों, लेकिन पक्षियों के लिए पेड़ भी बचें। व्यक्ति स्वतंत्र हो, लेकिन समाज से उसका रिश्ता न टूटे। पैसा जरूरी हो, लेकिन हर संबंध की कीमत पैसा तय न करे।

विदेशों से हमें विज्ञान, अनुशासन, नागरिक व्यवस्था और संस्थागत दक्षता सीखनी चाहिए; वहीं अपनी सभ्यता से परिवार, सहजीवन, प्रकृति-सम्मान, करुणा और लोकमंगल की भावना को बचाए रखना चाहिए।

क्योंकि सभ्यता की पहचान इस बात से नहीं होती कि उसके पास कितना धन है, बल्कि इस बात से होती है कि उसके पास अपने मनुष्य के लिए कितना समय, कितनी करुणा और कितना अपनापन बचा है।

आज आवश्यकता पश्चिम और पूर्व में श्रेष्ठता खोजने की नहीं, बल्कि दोनों की अच्छी बातों को जोड़कर एक ऐसा भविष्य बनाने की है जिसमें समृद्धि भी हो और संवेदना भी; स्वतंत्रता भी हो और परिवार भी; तकनीक भी हो और प्रकृति भी; विकास भी हो और मनुष्यता भी।

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यही वास्तविक वैश्विक प्रगति होगी—जहां मनुष्य मुद्रा से बड़ा हो और रिश्ता बाजार से।