भारतीय सनातन परंपरा में पंचांग का महत्व अति प्राचीन काल से ही रहा है। यह केवल तिथि और वार जानने का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय कालगणना, ज्योतिष और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में पंचांग को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि इसके माध्यम से तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण जैसे पंच अंगों का ज्ञान होता है.
इसी प्राचीन ज्ञान-परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘हिमशिखर खबर’ प्रतिदिन आपके लिए पंचांग प्रस्तुत करता है—ताकि आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच हमारी कालगणना, संस्कृति और सनातन परंपराओं से हमारा जुड़ाव बना रहे.
पंडित उदय शंकर भट्ट
भाद्रपद कृष्ण पक्ष सप्तमी, सिद्धार्थि संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, श्रावण |
आज सप्तमी तिथि 02:25 AM तक उपरांत अष्टमी | नक्षत्र कृत्तिका 12:29 AM तक उपरांत रोहिणी | व्याघात योग 06:32 PM तक, उसके बाद हर्षण योग. करण विष्टि 03:27 PM तक, बाद बव 02:25 AM तक, बाद बालव. आज राहु काल का समय 01:59 PM – 03:32 PM है | आज 07:25 AM तक चन्द्रमा मेष उपरांत वृषभ राशि पर संचार करेगा.
जब अर्जुन भ्रमित हुए, तब कृष्ण ने उनका भ्रम दूर किया
कुरुक्षेत्र का मैदान तैयार था। दोनों ओर सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। एक ओर कौरवों की विशाल सेना थी और दूसरी ओर पांडवों की सेना। संख्या में पांडव कम थे, लेकिन उनके बीच एक ऐसा योद्धा खड़ा था, जिसे संसार महान धनुर्धर अर्जुन के नाम से जानता है। अर्जुन के रथ की सारथी स्वयं श्रीकृष्ण थे।
युद्ध आरंभ होने से पहले अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा—
“मेरा रथ कौरवों की सेना के सामने ले चलिए। मैं देखना चाहता हूं कि मेरे साथ युद्ध करने के लिए कौन-कौन खड़ा है। मैं पितामह भीष्म को देखना चाहता हूं, द्रोणाचार्य को देखना चाहता हूं, दुर्योधन, अश्वत्थामा और कर्ण को देखना चाहता हूं।”
श्रीकृष्ण ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने रथ आगे बढ़ाया और दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कर दिया।
लेकिन सामने का दृश्य देखते ही अर्जुन के भीतर कुछ बदल गया।
जिन हाथों में गांडीव था, उन्हीं हाथों की शक्ति जैसे अचानक समाप्त हो गई। जिन आंखों में युद्ध का संकल्प था, उन्हीं आंखों के सामने अब अपने ही लोग दिखाई देने लगे। सामने गुरु थे, पितामह थे, संबंधी थे और अपने थे।
अचानक धड़ाम की आवाज हुई।
श्रीकृष्ण ने पलटकर देखा।
अर्जुन ने अपना गांडीव नीचे रख दिया था और वे रथ में बैठ गए थे।
अर्जुन बोले—
“मैं यह युद्ध नहीं करूंगा।”
श्रीकृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा। उन्होंने अर्जुन की स्थिति को समझ लिया। उन्हें लगा कि अर्जुन केवल भयभीत नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक गहरे संकट में है।
अर्जुन भ्रमित था।
अर्जुन कहने लगे—
“मेरे शरीर के अंग शिथिल हो रहे हैं। मेरा मुख सूख रहा है। मेरा शरीर कांप रहा है। मैं खड़ा नहीं हो पा रहा हूं और मेरा गांडीव मेरे हाथ से गिर रहा है।”
श्रीकृष्ण ने उसकी बात सुनी। उन्होंने अर्जुन की इस अवस्था को असामान्य नहीं माना। युद्धभूमि में ऐसी स्थिति किसी भी मनुष्य के सामने आ सकती है। लेकिन श्रीकृष्ण जानते थे कि अर्जुन की वास्तविक समस्या शरीर का कांपना नहीं है।
समस्या उसके मन का भ्रम है।
अर्जुन ने अंततः अपने भीतर की बात कह दी—
“मेरा मन भ्रमित हो गया है। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मुझे क्या करना चाहिए। मैं युद्ध करूं या न करूं?”
यहीं से एक योद्धा और उसके सारथी के बीच वह संवाद शुरू हुआ, जिसने केवल अर्जुन का भ्रम दूर नहीं किया, बल्कि आने वाले युगों के लिए मनुष्य को जीवन का मार्ग दिखा दिया।
क्योंकि कई बार मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उसकी कमजोरी नहीं होती।
उसकी सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि उसे यह पता ही नहीं होता कि उसे करना क्या है।
और जब मनुष्य कर्तव्य, मोह और भावनाओं के बीच उलझ जाता है, तब उसे केवल शक्ति की नहीं, बल्कि सही दृष्टि की आवश्यकता होती है।
यहीं से श्रीकृष्ण ने अर्जुन के भ्रम को दूर करने की शुरुआत की। उन्होंने अर्जुन को समझाया कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, केवल भावनाओं और मोह में आकर अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए। पहले सत्य को समझो, अपने कर्तव्य को पहचानो और फिर दृढ़ होकर निर्णय लो।
कृष्ण का यह संवाद केवल उस समय के अर्जुन के लिए नहीं था। आज भी जीवन के कुरुक्षेत्र में हम सभी कभी न कभी अर्जुन की तरह खड़े होते हैं। सामने परिस्थितियां होती हैं, मन में उलझन होती है और समझ नहीं आता कि किस दिशा में कदम बढ़ाया जाए।
ऐसे समय में हमें याद रखना चाहिए कि भ्रमित मन सबसे बड़ी बाधा है। जब तक मन में स्पष्टता नहीं होगी, तब तक हमारे पास शक्ति होते हुए भी हम उसका सही उपयोग नहीं कर पाएंगे।
इसलिए जीवन में जब भी कोई कठिन निर्णय सामने आए, रुकिए, सोचिए, सही और गलत को समझिए और अपने कर्तव्य को पहचानिए। निर्णय लेने के बाद पूरे विश्वास और मजबूती के साथ आगे बढ़िए।
क्योंकि जीवन में हार हमेशा कमजोर होने से नहीं होती, कई बार हम केवल इसलिए हार जाते हैं क्योंकि हम समय पर निर्णय नहीं ले पाते।
इसलिए अपने भीतर के भ्रम को दूर कीजिए, अपने कर्तव्य को पहचानिए और फिर पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़िए। यही श्रीकृष्ण का संदेश था और यही आज के जीवन की भी सबसे बड़ी सीख है।





