भारतीय सनातन परंपरा में पंचांग का महत्व अति प्राचीन काल से ही रहा है। यह केवल तिथि और वार जानने का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय कालगणना, ज्योतिष और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में पंचांग को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि इसके माध्यम से तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण जैसे पंच अंगों का ज्ञान होता है.
इसी प्राचीन ज्ञान-परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘हिमशिखर खबर’ प्रतिदिन आपके लिए पंचांग प्रस्तुत करता है—ताकि आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच हमारी कालगणना, संस्कृति और सनातन परंपराओं से हमारा जुड़ाव बना रहे.
पंडित उदय शंकर भट्ट
भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948. आज है षष्ठी.
आज षष्ठी तिथि 04:26 AM तक उपरांत सप्तमी | नक्षत्र भरणी 01:43 AM तक उपरांत कृत्तिका | ध्रुव योग 09:11 PM तक, उसके बाद व्याघात योग | करण गर 05:21 PM तक, बाद वणिज 04:26 AM तक, बाद विष्टि | आज राहु काल का समय 12:26 PM – 01:59 PM है | आज चन्द्रमा मेष राशि पर संचार करेगा.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आपका आज का दिन मंगलमयी, सुखद और शुभ हो। ‘हिमशिखर खबर’ हर दिन की तरह आज भी आपके लिए लेकर आया है आज का पंचांग—जिसमें तिथि, वार, नक्षत्र, शुभ मुहूर्त और दिन के धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व की महत्वपूर्ण जानकारी शामिल है.
दुःखालय संसार में सुख की तलाश
मनुष्य आखिर है क्या—क्या वह केवल जन्म और मृत्यु के बीच सांस लेता हुआ यह नश्वर शरीर है, या इस देह के भीतर कोई ऐसी शाश्वत चेतना भी है, जो इस समस्त जीवन-यात्रा की साक्षी है; और यदि जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है, तो फिर जिस सुख, धन, प्रतिष्ठा और संबंधों को अपना समझकर वह जीवन भर संजोता रहता है, क्या वे वास्तव में उसके हैं, या संसार की नश्वरता को स्थायी मान लेने वाला उसका मोह ही उसके समस्त दुःखों का मूल कारण है?
मनुष्य के सामने यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उसका उत्तर उतना ही गहरा है। इस प्रश्न से मनुष्य जितना बाहर भागता है, उतना ही अपने भीतर के सत्य से दूर होता चला जाता है। शायद इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने संसार को केवल भोग की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे आत्मबोध की भूमि माना—एक ऐसी भूमि, जहां मनुष्य जीवन के सुख-दुःख को अनुभव करते हुए अंततः स्वयं को पहचान सके।
चौरासी लाख योनियों में मानव योनि को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसका कारण केवल यह नहीं कि मनुष्य अन्य जीवों की अपेक्षा अधिक सुख-सुविधाएं प्राप्त कर सकता है। मनुष्य की वास्तविक श्रेष्ठता उसके विवेक और आत्मचिंतन की क्षमता में है। वह अपने दुःख को देख सकता है, उसके कारण पर विचार कर सकता है और उस मार्ग की खोज कर सकता है जो उसे दुःख से परे ले जाए।
लेकिन विडंबना देखिए—जिस मानव जीवन को आत्मबोध का साधन बनाया जा सकता था, वही जीवन प्रायः संसार की वस्तुओं को अपना बनाने में बीत जाता है।
मनुष्य जन्म लेता है और उसके साथ ही सुख की तलाश आरंभ हो जाती है। बाल्यावस्था में खिलौने सुख का कारण बनते हैं, युवावस्था में प्रेम, सफलता, धन और प्रतिष्ठा; गृहस्थ जीवन में परिवार और संपत्ति; और वृद्धावस्था में वही मनुष्य अपने बीते हुए जीवन की स्मृतियों में शांति खोजने लगता है।
लेकिन जिस सुख को वह जीवन भर पकड़कर रखना चाहता है, वह उसके हाथों में कभी स्थायी नहीं रहता।
सुख आता है, ठहरता है और चला जाता है; दुःख आता है, ठहरता है और वह भी चला जाता है।
फिर भी मनुष्य सुख को स्थायी और दुःख को अस्थायी मानकर जीवन जीता है। यही उसके मोह का आरंभ है।
हमारे शास्त्रों ने इस संसार को ‘दुःखालय’ कहा है—दुःख का घर। इस शब्द का अर्थ यह नहीं कि संसार में सुख का कोई अस्तित्व ही नहीं है। संसार में सुख भी है, प्रेम भी है, सौंदर्य भी है और आनंद के असंख्य क्षण भी हैं। लेकिन इन सबकी एक सीमा है—वे स्थायी नहीं हैं।
जिसका मिलना निश्चित है, उसका बिछुड़ना भी निश्चित है।
जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है।
जो आज अपना है, वह कल किसी और का हो सकता है।
यही परिवर्तनशीलता संसार का स्वभाव है।





