पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
आश्विन कृष्ण पक्ष दशमी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद.
आज दशमी तिथि 02:07 AM तक उपरांत एकादशी. नक्षत्र पुष्य 11:09 PM तक उपरांत आश्लेषा. शिव योग 09:51 AM तक, उसके बाद सिद्ध योग. करण वणिज 02:59 PM तक, बाद विष्टि 02:08 AM तक, बाद बव. आज राहु काल का समय 07:51 AM – 09:19 AM है. आज चन्द्रमा कर्क राशि पर संचार करेगा.
प्रशंसा पर भी लगाइए टोल टैक्स
प्रशंसा जीवन में आए तो उसका स्वागत जरूर कीजिए, लेकिन उसे बिना जांचे-परखे अपने भीतर प्रवेश मत करने दीजिए। अपनी प्रशंसा पर भी टोल टैक्स लगाइए।
क्योंकि जब हमारी प्रशंसा होती है और हम उसे सहज ही भीतर उतरने देते हैं, तो उसके साथ धीरे-धीरे अहंकार भी प्रवेश कर सकता है। यहीं से प्रशंसा महंगी पड़ने लगती है। जो प्रशंसा हमें प्रेरणा देनी चाहिए, वही धीरे-धीरे हमारा दुर्गुण बन सकती है।
जब लोकप्रियता बढ़ती है, लोग तारीफ करने लगते हैं और हमारे लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द और संबोधन भी बड़े होते जाते हैं। यहीं सबसे अधिक सावधानी की जरूरत है। बाहर से मिलने वाला सम्मान यदि विवेक के बिना भीतर उतर गया, तो वह व्यक्ति को ऊंचा उठाने के बजाय उसके भीतर अहंकार को बढ़ा सकता है।
हम टोल टैक्स पर फास्टैग रखते हैं या नकद भुगतान करते हैं। उसी तरह जब जीवन में प्रशंसा आए, तो उसके साथ भी एक जागरूकता का भुगतान होना चाहिए।
उसका सबसे अच्छा माध्यम है—स्व-मूल्यांकन।
जब कोई आपकी प्रशंसा करे, तो स्वयं से पूछिए—
क्या मैं वास्तव में वही हूं, जो लोग मेरे बारे में कह रहे हैं?
क्या मेरे आचरण में भी वही गुण हैं, जिनकी प्रशंसा हो रही है?
मेरे भीतर अभी क्या सुधार बाकी है?
बिना अपना मूल्यांकन किए प्रशंसा को भीतर मत उतारिए।
रामचरितमानस के अयोध्याकांड के आरंभ में राजा दशरथ का प्रसंग इस दृष्टि से प्रेरक है। सभा में जब उनकी प्रशंसा और जय-जयकार हो रही थी, तब उन्होंने दर्पण में स्वयं को देखा। इसे केवल बाहरी रूप देखने की घटना न मानकर आत्म-परीक्षण के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है—बाहर से मिल रहे सम्मान के बीच भीतर स्वयं को देखने का प्रयास।
यही जीवन की बड़ी साधना है।
निंदा हमें सुधारने का अवसर देती है, लेकिन प्रशंसा हमें स्वयं को परखने की चुनौती देती है।
इसलिए अगली बार जब कोई आपकी बहुत प्रशंसा करे, तो तुरंत उसे अपने भीतर मत बसाइए।
थोड़ा रुकिए।
दर्पण देखिए।
अपने भीतर झांकिए।
और स्वयं से पूछिए—
“क्या मैं सचमुच उतना ही अच्छा हूं, जितना लोग मुझे बता रहे हैं?”
यदि प्रशंसा के बाद यह प्रश्न जीवित रहता है, तो प्रशंसा अहंकार नहीं, विनम्रता का कारण बन सकती है।