आज का पंचांग : विवेक जागे तो वाणी भी बदल जाती है

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.

आश्विन कृष्ण पक्ष एकादशी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद |आज है इंदिरा एकादशी.

आज एकादशी तिथि 12:34 AM तक उपरांत द्वादशी | नक्षत्र आश्लेषा 10:17 PM तक उपरांत मघा | सिद्ध योग 07:20 AM तक, उसके बाद साध्य योग 04:59 AM तक, उसके बाद शुभ योग | करण बव 01:19 PM तक, बाद बालव 12:35 AM तक, बाद कौलव | आज राहु काल का समय 03:10 PM – 04:38 PM है | आज 10:17 PM तक चन्द्रमा कर्क उपरांत सिंह राशि पर संचार करेगा.

विवेक जागे तो वाणी भी बदल जाती है

यदि भीतर विवेक जाग जाए, तो मनुष्य की वाणी अपने आप सुखदायक, गंभीर और कोमल हो जाती है। उसे अपनी बात कहने के लिए कठोर शब्दों का सहारा नहीं लेना पड़ता।

काकभुशुंडि जी ने भगवान राम की वाणी का वर्णन करते हुए कहा है—

“सुनि सप्रेम मम बानी, देखि दीन निज दास।
बचन सुखद गंभीर मृदु, बोले रमानिवास॥”

अर्थात मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर और अपने दास को दीन देखकर रमानिवास भगवान राम ने ऐसे वचन कहे, जो सुख देने वाले, गंभीर और कोमल थे।

राम बहुत कम बोलते थे, लेकिन जब बोलते थे तो उनके शब्दों में गहराई होती थी। उनकी वाणी में न अनावश्यक विस्तार था, न कटुता और न ही अहंकार। उनके शब्द कम होते थे, लेकिन अर्थ बहुत बड़ा होता था।

यह केवल बोलने की कला नहीं थी। इसके पीछे जाग्रत विवेक था।

विवेक जागता है तो मनुष्य यह समझने लगता है कि क्या बोलना है, कितना बोलना है, कब बोलना है और किस भाव से बोलना है। यही समझ वाणी को मधुर भी बनाती है और प्रभावशाली भी।

संयोग से गणेशोत्सव का पावन समय भी हमें इसी दिशा में सोचने का अवसर देता है। सरस्वती ज्ञान और बुद्धि की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं, जबकि गणेश जी विवेक, बुद्धि और शुभारंभ के प्रतीक हैं। इसलिए अपने भीतर विवेक जगाना भी एक प्रकार की साधना है।

इसके लिए बहुत कठिन साधना की आवश्यकता नहीं।

सबसे पहले अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने की ईमानदारी चाहिए।

अपनी खूबियों को बताने में हम जितने सहज रहते हैं, अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने में भी उतने ही सहज हो जाएं।

दूसरों से अपने बारे में ईमानदार और खुला फीडबैक लें। जो व्यक्ति हमें हमारी कमियां बताता है, वह हमेशा हमारा आलोचक नहीं होता; कई बार वह हमारे व्यक्तित्व का आईना होता है।

फिर उन कमियों को सुधारने के लिए निरंतर प्रयास करें।

हम जितनी ईमानदारी से अपने बारे में सुनेंगे, उतनी ही संभावना होगी कि हम अपने भीतर आवश्यक परिवर्तन कर सकें। और जब व्यक्ति अपने दोषों को देखने और सुधारने की क्षमता विकसित कर लेता है, तभी उसका विवेक धीरे-धीरे जागृत होने लगता है।

विवेक का अर्थ केवल सही और गलत को जानना नहीं है; विवेक का अर्थ है—सही को जीवन में उतारने की क्षमता विकसित करना।

फिर वही विवेक हमारी वाणी में उतरता है, हमारे व्यवहार में दिखाई देता है और धीरे-धीरे हमारे पूरे व्यक्तित्व को बदल देता है।

शायद यही कारण है कि भगवान राम की वाणी आज भी हमें आकर्षित करती है—
कम शब्द, गहरा अर्थ, कोमल भाव और लोकमंगल की दृष्टि।

हम भी यदि अपने भीतर के गणेश को जागृत कर सकें, अपनी कमियों को स्वीकार कर सकें और उन्हें सुधारने का साहस जुटा सकें, तो हमारी वाणी को बदलने के लिए किसी विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होगी। विवेक भीतर जागेगा तो शब्द अपने आप सुधर जाएंगे।

और जब शब्द सुधरते हैं, तो केवल संवाद नहीं सुधरता—सम्बंध सुधरते हैं, व्यक्तित्व सुधरता है और अंततः जीवन की दिशा सुधर जाती है।