पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
आश्विन कृष्ण पक्ष द्वादशी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद |आज है माघ श्रद्धा.
आज द्वादशी तिथि 11:16 PM तक उपरांत त्रयोदशी. नक्षत्र मघा 09:40 PM तक उपरांत पूर्व फाल्गुनी. शुभ योग 02:51 AM तक, उसके बाद शुक्ल योग. करण कौलव 11:54 AM तक, बाद तैतिल 11:17 PM तक, बाद गर. आज राहु काल का समय 12:14 PM – 01:42 PM है. आज चन्द्रमा सिंह राशि पर संचार करेगा.
कृपा बरस रही है, प्रश्न पात्रता का है
कभी-कभी मन में प्रश्न उठता है—
परमात्मा की कृपा आखिर किस पर होती है?
फिर भीतर से ही कोई उत्तर आता है—
कृपा किसी एक पर नहीं होती।
कृपा तो बरस रही है। हर क्षण बरस रही है।
जैसे आकाश से वर्षा होती है। वर्षा यह नहीं देखती कि कौन बड़ा है, कौन छोटा; कौन योग्य है, कौन अयोग्य। वह सब पर समान रूप से बरसती है। लेकिन वर्षा का जल सबके पास संचित नहीं होता। जिसके पास पात्र है, वह उसे भर लेता है। जिसके पास पात्र नहीं, उसके सामने से वही जल बह जाता है।
शायद परमात्मा की कृपा का रहस्य भी यही है।
कृपा की कमी नहीं है, हमारे पात्र की कमी है।
हम मांगते बहुत हैं—सुख, संपत्ति, सफलता, सम्मान, संबंध, सुविधा। लेकिन कभी-कभी उस एक चीज को मांगना भूल जाते हैं, जिसके बिना बाकी सब अधूरा है—कृपा।
और कृपा मांगने से पहले स्वयं को उसका पात्र बनाना पड़ता है।
समर्पण वह पात्र है।
विनम्रता उसकी गहराई है।
भक्ति उसकी निर्मलता है।
और विश्वास उसका आधार।
काकभुशुंडिजी ने गरुड़ जी से कहा—
“जेहि खोजत जोगीस मुनि, प्रभु प्रसाद कोउ पाव।”
जिस सत्य और भक्ति की खोज योगी और मुनि करते हैं, उसे भी कोई विरला ही प्रभु के प्रसाद से प्राप्त कर पाता है।
तो फिर साधना किसलिए?
शायद साधना परमात्मा को पाने से अधिक अपने भीतर उस पात्र को तैयार करने की प्रक्रिया है, जिसमें परमात्मा की कृपा ठहर सके।
कृपा जब आती है तो हमेशा चमत्कार बनकर नहीं आती। कभी वह विवेक बनकर आती है, कभी किसी सही व्यक्ति के रूप में, कभी किसी अप्रत्याशित अवसर के रूप में और कभी किसी ऐसी परिस्थिति के रूप में, जो हमें भीतर से बदल देती है।
हम उसे पहचान नहीं पाते, क्योंकि हमारी मांग कुछ और होती है।
इसलिए अब जब भी परमात्मा के सामने हाथ उठें, तो थोड़ा ठहरिए।
कहिए—
“प्रभु! मुझे वह मत दीजिए, जो मेरी इच्छा है।
मुझे वह दीजिए, जो मेरे लिए कल्याणकारी है।
और सबसे पहले अपनी कृपा दीजिए,
ताकि जो मिले, उसे संभालने की बुद्धि भी मिले।”
आज संसार में हर चीज की ब्रांडिंग हो रही है। विचारों की, उत्पादों की, उपलब्धियों की। पिछले दिनों कनाडा यात्रा के दौरान एक सज्जन ने कहा कि कनाडा ने अनेक आविष्कार किए, लेकिन अपने आविष्कारों की प्रभावी ब्रांडिंग नहीं कर पाया।
बात छोटी थी, लेकिन भीतर कहीं गहरी उतर गई।
हमारे पास हजारों वर्षों की साधना है। ऋषियों का चिंतन है। उपनिषदों की दृष्टि है। गीता का जीवन-दर्शन है। योग है, ध्यान है, सेवा है, करुणा है, त्याग है।
लेकिन क्या हमने इन्हें केवल अपने तक सीमित तो नहीं कर दिया?
अच्छाई को छिपाना विनम्रता नहीं है।
अच्छाई को अहंकार के बिना समाज तक पहुंचाना भी एक सेवा है।
इसलिए धर्म की प्रतिष्ठा शब्दों के शोर से नहीं, जीवन के आचरण से होनी चाहिए।
हम ऐसा जीवन जिएं कि लोग धर्म के बारे में हमसे सुनने से पहले हमारे भीतर उसे देख सकें।
क्योंकि अंततः परमात्मा की कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण कोई दावा नहीं—
हमारा बदलता हुआ जीवन है।
और शायद एक दिन, जब जीवन की सारी दौड़ थम जाएगी, जब मांगने के लिए कुछ शेष नहीं रहेगा, जब उपलब्धियों और असफलताओं दोनों का शोर पीछे छूट जाएगा—तब भीतर से एक बहुत धीमी-सी आवाज आएगी—
“जिसे तू बाहर खोजता रहा,
वह तो सदा तेरे भीतर बरस रहा था।
तू बस अपने हाथ फैलाना सीख लेता,
तो जान जाता कि आकाश कभी खाली था ही नहीं।”
तब समझ आएगा—
परमात्मा हमसे कभी दूर नहीं था।
दूर था तो केवल हमारा समर्पण।
कृपा आज भी बरस रही है।
कल भी बरसेगी।
शायद जन्मों से बरस रही है।
बस एक बार मन को इतना निर्मल कर लें,
अहंकार को इतना शांत कर दें,
और अपने भीतर इतना स्थान बना दें—
कि जब कृपा उतरे,
तो लौटकर न जाए।
वह हमारे भीतर ठहर जाए।
हमारे जीवन में उतर जाए।
और फिर हमारे जीवन से होकर
किसी और के सूने आकाश पर भी बरसने लगे।
यही कृपा की पूर्णता है।
पाना नहीं—पात्र बनना।
भरना नहीं—फिर बरस जाना।