आज का पंचांग : ईश्वर को नकारना नहीं, स्वयं को नकारना है…

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.

ईश्वर को नकारना नहीं, स्वयं को नकारना है…

मनुष्य जब अपने जीवन के लक्ष्य को खो देता है, तब केवल उसकी दिशा नहीं खोती—उसके भीतर का दीपक बुझने लगता है।

कोई व्यक्ति अचानक नास्तिक नहीं हो जाता।
नास्तिकता पहले उसके शब्दों में नहीं आती, उसके जीवन से उद्देश्य चला जाता है।

जब मनुष्य यह मान लेता है कि खाने, कमाने, भोगने, पद पाने और संसार में अपनी पहचान बनाने के अतिरिक्त जीवन में कुछ भी खोजने योग्य नहीं है, तभी भीतर एक गहरी रिक्तता जन्म लेती है।

और फिर वह उस रिक्तता को भरने के लिए संसार की ओर दौड़ता है।

लेकिन संसार कितना भी मिल जाए,
जिसे अपने भीतर खोजना था, उसकी कमी बनी रहती है।

ईश्वर की खोज का अर्थ किसी मंदिर में जाकर किसी अदृश्य सत्ता को पकड़ लेना नहीं है।
ईश्वर की खोज तो उस प्रश्न को जीवित रखना है—

“मैं वास्तव में कौन हूँ?”

मैं यह शरीर हूँ?
मैं यह नाम हूँ?
मैं यह पद हूँ?
मैं यह धन हूँ?
मैं यह संबंध हूँ?
या इन सबके पीछे कोई ऐसा “मैं” भी है, जिसे मैंने अभी तक जाना ही नहीं?

यहीं से अध्यात्म शुरू होता है।

और जिस दिन मनुष्य इन प्रश्नों से भागना शुरू कर देता है, उसी दिन उसके भीतर की यात्रा रुकने लगती है।

इसलिए मैं कहता हूँ—
नास्तिकता केवल ईश्वर को न मानना नहीं है;
नास्तिकता अपने भीतर की संभावना को नकार देना भी है।

जिस मनुष्य ने यह मान लिया कि मेरे जीवन का कोई परम उद्देश्य नहीं, उसके लिए जीवन धीरे-धीरे केवल घटनाओं की श्रृंखला बन जाता है—जन्म, संघर्ष, सफलता, असफलता और अंत।

लेकिन जिसने यह प्रश्न पूछ लिया कि “मुझे मनुष्य जीवन क्यों मिला?”, उसके लिए वही जीवन साधना बन जाता है।

ईश्वर की खोज इसलिए आवश्यक नहीं कि ईश्वर को हमारी आवश्यकता है।

ईश्वर की खोज इसलिए आवश्यक है क्योंकि हमें अपनी आवश्यकता है।

हमें स्वयं को जानना है।
हमें अपने भीतर के भय से मुक्त होना है।
हमें इच्छाओं की भीड़ से निकलना है।
हमें उस शांति तक पहुँचना है, जिसे संसार की कोई उपलब्धि स्थायी रूप से नहीं दे सकती।

और शायद सबसे बड़ी विडंबना यही है कि—

मनुष्य ईश्वर को खोजने के लिए दूर-दूर भटकता है,
जबकि ईश्वर की ओर जाने वाला दरवाजा उसी के भीतर खुलता है।

बस शर्त एक है—

खोज सच्ची होनी चाहिए।

क्योंकि जहाँ खोज सच्ची होती है, वहाँ प्रश्न धीरे-धीरे प्रार्थना बन जाता है,
प्रार्थना साधना बन जाती है,
साधना मौन बन जाती है,
और उस मौन में कभी-कभी वह सुनाई देता है,
जिसे हम जीवन भर बाहर खोजते रहे।

ईश्वर को मत खोजिए केवल इसलिए कि आपको कुछ मिल जाए।
ईश्वर को खोजिए ताकि अंततः आपको यह पता चल सके कि आप वास्तव में कौन हैं।

यही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी यात्रा है।