आज का पंचांग : परिश्रम के साथ चरित्र का तेज भी आवश्यक है

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.

आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद.

आज चतुर्दशी तिथि 09:36 PM तक उपरांत अमावस्या. नक्षत्र उत्तर फाल्गुनी 09:19 PM तक उपरांत हस्त | ब्रह्म योग 11:20 PM तक, उसके बाद इन्द्र योग. करण विष्टि 09:53 AM तक, बाद शकुनि 09:36 PM तक, बाद चतुष्पद. आज राहु काल का समय 10:46 AM – 12:14 PM है | आज चन्द्रमा कन्या राशि पर संचार करेगा.

परिश्रम के साथ चरित्र का तेज भी आवश्यक है


आजकल के नए बच्चों को देखता हूँ तो मन में आशा जागती है। वे मेहनत कर रहे हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं, अपने सपनों को साकार करने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। लेकिन एक प्रश्न है—क्या केवल मेहनत कर लेने से जीवन महान बन जाता है? क्या योग्यता प्राप्त कर लेने से मनुष्य योग्य भी बन जाता है?


नहीं! परिश्रम आपको आगे ले जा सकता है, शिक्षा आपको ज्ञान दे सकती है और योग्यता आपको अवसर दिला सकती है; लेकिन आपकी दिशा, आपकी पहचान और आपकी वास्तविक ऊँचाई आपके संस्कार और चरित्र ही निर्धारित करते हैं।


अब समय आ गया है कि परिश्रम के साथ शिक्षा, योग्यता और संस्कारों का तेज भी हमारे जीवन में शामिल हो।


क्योंकि जब हम संस्कार अपनाते हैं, तब हम अपने चरित्र पर टिकना सीखते हैं। परिस्थितियाँ बदलती हैं, अवसर बदलते हैं, लोग बदलते हैं, लेकिन जिसका चरित्र मजबूत है, वह अपने मूल्यों से समझौता नहीं करता।

भीतर से जो तेज जागता है, वह चरित्र से जागता है।
बाहर का तेज पद, प्रतिष्ठा, वस्त्र, धन और प्रदर्शन से दिखाई दे सकता है। लेकिन भीतर का तेज सत्य, संयम, ईमानदारी, करुणा और कर्तव्यनिष्ठा से प्रकट होता है। बाहरी चमक आँखों को आकर्षित करती है, जबकि चरित्र का तेज हृदयों में विश्वास जगाता है।


याद रखिए, ऊँची शिक्षा प्राप्त करके भी मनुष्य संस्कारहीन रह सकता है। बड़ी योग्यता अर्जित करके भी वह अहंकारी हो सकता है। अपार धन कमाकर भी वह भीतर से दरिद्र हो सकता है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के मनुष्य को जगाना भी होना चाहिए।


नई पीढ़ी को केवल सफल नहीं, सार्थक बनना है। केवल आगे नहीं निकलना, बल्कि दूसरों के लिए भी रास्ता बनाना है। केवल अपनी पहचान नहीं बनानी, बल्कि अपने चरित्र से समाज का विश्वास जीतना है।


बच्चो! मेहनत खूब करो, ज्ञान खूब अर्जित करो, अपनी योग्यता को शिखर तक ले जाओ; लेकिन अपने संस्कारों को पीछे मत छोड़ देना। जिस दिन सफलता पाने के लिए आपको अपना चरित्र गिरवी रखना पड़े, उस दिन समझ लेना कि आपने सफलता नहीं, अपने पतन का सौदा किया है।

जीवन में सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि दुनिया आपको कितना बड़ा मानती है, बल्कि यह है कि आप अकेले में भी वही बने रहते हैं, जो दुनिया के सामने होने का दावा करते हैं।


यही संस्कार है। यही चरित्र है। और इसी चरित्र से जागता है मनुष्य का वास्तविक तेज।
परिश्रम से प्रगति मिलती है, शिक्षा से विवेक, योग्यता से अवसर और संस्कारों से जीवन को सही दिशा। इन सबका समन्वय ही एक श्रेष्ठ मनुष्य और श्रेष्ठ समाज का निर्माण करता है।